संस्कृत श्लोक

स रामचरितं कृत्स्नं कृतवान् पुण्यसंयुतम् । विचित्रार्थपदं सम्यग्वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः ॥

हिंदी अनुवाद

उस मुनिपुङ्गव वाल्मीकि ने पुण्यमय, विचित्र अर्थ और पदों वाले सम्पूर्ण रामचरित का सम्यक् निर्माण किया।

अर्थ / व्याख्या

वाल्मीकि ने सम्पूर्ण रामचरित का सुन्दर एवं पुण्यमय काव्य रचा।

टिप्पणी

यह श्लोक रामायण की रचना की पूर्णता और उसकी विशेषताओं का वर्णन करता है। "कृत्स्नम्" का अर्थ है सम्पूर्ण – राम के जीवन की समस्त घटनाओं का वर्णन। "पुण्यसंयुतम्" – यह काव्य पवित्रता और धार्मिक फल देने वाला है। "विचित्रार्थपदम्" – इसमें अर्थ और शब्द दोनों ही अद्भुत एवं विविधता से परिपूर्ण हैं। "सम्यक्" – उचित क्रम और शैली में। "मुनिपुङ्गवः" – वाल्मीकि को मुनियों में श्रेष्ठ कहा गया है।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक ३२ ॥

स रामचरितं कृत्स्नं कृतवान् पुण्यसंयुतम् ।
विचित्रार्थपदं सम्यग्वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः ॥
sa rāmacaritaṃ kṛtsnaṃ kṛtavān puṇyasaṃyutam |
vicitrārthapadaṃ samyagvālmīkirmunipuṅgavaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उस मुनिपुङ्गव वाल्मीकि ने पुण्यमय, विचित्र अर्थ और पदों वाले सम्पूर्ण रामचरित का सम्यक् निर्माण किया।

🔹 English Translation : That foremost sage Valmiki properly composed the entire story of Rama, endowed with holiness, having wonderful meanings and words.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
सःसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनउन (वाल्मीकि)
रामचरितम्संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनराम के चरित्र को
कृत्स्नम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनसम्पूर्ण
कृतवान्क्रिया (परोक्षभूत), प्रथमपुरुष एकवचन (कृ धातु)किया, रचा
पुण्यसंयुतम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनपुण्य से युक्त, पवित्र
विचित्रार्थपदम्विशेषण (विचित्र + अर्थ + पद), नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनविचित्र अर्थ और पदों वाला
सम्यक्अव्ययसम्यक् रूप से, उचित प्रकार
वाल्मीकिःसंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनवाल्मीकि
मुनिपुङ्गवःविशेषण (मुनि + पुङ्गव), पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनमुनियों में श्रेष्ठ (पुङ्गव = श्रेष्ठ)

📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी

इस श्लोक में रामायण की रचना के सम्पन्न होने का उल्लेख है। "रामचरितं कृत्स्नम्" से पता चलता है कि वाल्मीकि ने राम के सम्पूर्ण जीवन-चरित को श्लोकबद्ध किया। "पुण्यसंयुतम्" इस तथ्य को रेखांकित करता है कि यह काव्य केवल साहित्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का साधन भी है। "विचित्रार्थपदम्" – इसमें अनेक अर्थों और शब्दों की चमत्कारपूर्ण योजना है, जो पाठक को मोहित करती है। "सम्यक्" कहकर रचना की शास्त्रीय शुद्धता की ओर संकेत किया गया है।