रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
ततो गते ब्रह्मणि स महामतिः । विधाय काव्यं गुणवत्समाहितः । चकार रामस्य पवित्रमद्भुतं । तच्चारित्रं श्लोकमयं महात्मनः ॥
हिंदी अनुवाद
उसके बाद ब्रह्मा के चले जाने पर वे महामति, एकाग्रचित्त होकर गुणवान काव्य की रचना करने लगे और उन्होंने महात्मा राम के पवित्र, अद्भुत चरित्र को श्लोकमय बना डाला।
अर्थ / व्याख्या
ब्रह्मा के जाने के बाद वाल्मीकि ने एकाग्रचित्त होकर राम के पवित्र चरित्र को श्लोकों में रचा।
टिप्पणी
यह श्लोक रामायण के रचना-काल का सूचक है। ब्रह्मा के अन्तर्धान होने के पश्चात् वाल्मीकि ने समाहित चित्त से (एकाग्र होकर) गुणसम्पन्न काव्य की रचना आरम्भ की। "महामतिः" विशेषण उनकी बुद्धि की महानता को दर्शाता है। उन्होंने महात्मा राम के पवित्र एवं अद्भुत चरित्र को श्लोकमय बना दिया – अर्थात् सम्पूर्ण रामकथा को श्लोकबद्ध किया। यहीं से रामायण का सृजन हुआ।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक ३१ ॥
विधाय काव्यं गुणवत्समाहितः ।
चकार रामस्य पवित्रमद्भुतं ।
तच्चारित्रं श्लोकमयं महात्मनः ॥
vidhāya kāvyaṃ guṇavatsamāhitaḥ |
cakāra rāmasya pavitramadbhutaṃ |
taccāritraṃ ślokamayaṃ mahātmanaḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : उसके बाद ब्रह्मा के चले जाने पर वे महामति, एकाग्रचित्त होकर गुणवान काव्य की रचना करने लगे और उन्होंने महात्मा राम के पवित्र, अद्भुत चरित्र को श्लोकमय बना डाला।
🔹 English Translation : Then, after Brahma departed, that great-minded one, composed with concentration a virtuous poetry, and made the pure, wonderful character of the great-souled Rama into a metrical composition (full of verses).
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| ततः | अव्यय | तब, उसके बाद |
| गते | भूतकालिक कृदंत, पुल्लिंग, सप्तमी एकवचन (गम् धातु) | चले जाने पर |
| ब्रह्मणि | संज्ञा, पुल्लिंग, सप्तमी एकवचन | ब्रह्मा के |
| सः | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वे (वाल्मीकि) |
| महामतिः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | महान बुद्धि वाले |
| विधाय | ल्यबन्त अव्यय (विधा धातु) | रचना करके |
| काव्यम् | संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | काव्य |
| गुणवत् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | गुणों से युक्त |
| समाहितः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | एकाग्रचित्त, समाधिस्थ |
| चकार | क्रिया, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (कृ धातु) | किया, रचा |
| रामस्य | संज्ञा, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | राम के |
| पवित्रम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | पवित्र |
| अद्भुतम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | अद्भुत |
| तत् | सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | उस (चरित्र) को |
| चारित्रम् | संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | चरित्र |
| श्लोकमयम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | श्लोकों से निर्मित |
| महात्मनः | विशेषण, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | महात्मा के |
📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी
इस श्लोक में वाल्मीकि द्वारा रामायण की रचना का सूत्रपात वर्णित है। ब्रह्मा के निर्देशानुसार वे एकाग्रचित्त होकर गुणसम्पन्न काव्य की रचना करते हैं। "गुणवत्" का अर्थ है – जो रस, अलंकार, छन्द आदि काव्यगुणों से परिपूर्ण हो। "पवित्रम्" और "अद्भुतम्" विशेषण राम के चरित्र की दिव्यता और लोकोत्तरता को बताते हैं। "श्लोकमयम्" – यहाँ श्लोक का अर्थ केवल छन्द नहीं, बल्कि वही प्रारम्भिक श्लोक भी हो सकता है, जो ब्रह्मा ने प्रमाणित किया था, और उसी शैली में सम्पूर्ण चरित्र गढ़ा गया।
यह श्लोक रामायण के रचनाकार के रूप में वाल्मीकि की सिद्धहस्तता को स्थापित करता है और इस महाकाव्य के निर्माण की दिव्य पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है।