संस्कृत श्लोक

अथ गत्वा पुनर्गङ्गां तीर्थे स्नात्वा विधानतः । उपस्पृश्य विशुद्धात्मा जपञ्श्लोकं स्मरन्मुहुः ॥

हिंदी अनुवाद

फिर वे पुनः गंगा में जाकर विधिपूर्वक तीर्थ में स्नान कर, आचमन कर, विशुद्धात्मा हो, श्लोक का जप और स्मरण करते हुए (रहे)।

अर्थ / व्याख्या

ब्रह्मा के चले जाने के बाद वाल्मीकि गंगा जाकर स्नान-ध्यान करते हैं और उस दिव्य श्लोक का जप-स्मरण करते हैं।

टिप्पणी

यह श्लोक ब्रह्मा के अन्तर्धान के बाद वाल्मीकि की साधना का वर्णन करता है। वे पुनः गंगा जाते हैं, विधिपूर्वक स्नान-ध्यान करते हैं और उस श्लोक का जप-स्मरण करते हैं जो ब्रह्मा ने प्रमाणित किया था। "विशुद्धात्मा" कहना उनकी आन्तरिक पवित्रता और तत्परता को दर्शाता है। "जपन् स्मरन् मुहुः" – बार-बार जपना और स्मरण करना इस बात का सूचक है कि वे उस श्लोक को अपने हृदय में उतार रहे हैं, जो आगे रामायण के रूप में विस्तार पाएगा।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक ३० ॥

अथ गत्वा पुनर्गङ्गां तीर्थे स्नात्वा विधानतः ।
उपस्पृश्य विशुद्धात्मा जपञ्श्लोकं स्मरन्मुहुः ॥
atha gatvā punargaṅgāṃ tīrthe snātvā vidhānataḥ |
upaspṛśya viśuddhātmā japañślokaṃ smaranmuhuḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : फिर वे पुनः गंगा में जाकर विधिपूर्वक तीर्थ में स्नान कर, आचमन कर, विशुद्धात्मा हो, श्लोक का जप और स्मरण करते हुए (रहे)।

🔹 English Translation : Then, having gone again to the Ganga, bathing at the sacred place according to rites, sipping water, with purified soul, chanting and remembering the verse repeatedly.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
अथअव्ययफिर, तदनन्तर
गत्वाल्यबन्त अव्यय (गम् धातु)जाकर
पुनःअव्ययफिर से
गङ्गाम्संज्ञा, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनगंगा को
तीर्थेसंज्ञा, नपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचनतीर्थ में
स्नात्वाल्यबन्त अव्यय (स्ना धातु)स्नान करके
विधानतःअव्ययविधिपूर्वक, नियमानुसार
उपस्पृश्यल्यबन्त अव्यय (उप + स्पृश् धातु)आचमन कर, जल स्पर्श कर
विशुद्धात्माविशेषण (विशुद्ध + आत्मन्), पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनविशुद्ध आत्मा वाले
जपन्वर्तमान कृदंत (जप् धातु), पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनजप करते हुए
श्लोकम्संज्ञा, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनश्लोक का
स्मरन्वर्तमान कृदंत (स्मृ धातु), पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनस्मरण करते हुए
मुहुःअव्ययबार-बार, पुनः पुनः

📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी

यह श्लोक वाल्मीकि की आध्यात्मिक साधना का चित्रण करता है। ब्रह्मा के दिव्य वरदान और आदेश के बाद भी वे सांसारिक आचार-विचार का पालन करते हैं – गंगा स्नान, आचमन, जप, स्मरण। यह दर्शाता है कि वे कितने अनुशासित और समर्पित ऋषि हैं। "विशुद्धात्मा" उनकी आन्तरिक पवित्रता को दर्शाता है। श्लोक का बार-बार जप और स्मरण इस बात का सूचक है कि वे उस करुणा-श्लोक को हृदयंगम कर रहे हैं, जो आगे चलकर रामायण के रूप में विस्तृत होगा।

यह श्लोक रामायण के दूसरे सर्ग का समापन करता है और तीसरे सर्ग में रामकथा के विस्तार का मार्ग प्रशस्त करता है।