रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
इत्युक्त्वा भगवान्ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत । शिष्याः शुश्रूषवस्तस्य सर्व एवाभ्यपूजयन् ॥
हिंदी अनुवाद
इस प्रकार कहकर भगवान् ब्रह्मा वहीं अन्तर्धान हो गए। उनके सभी सेवा में तत्पर शिष्यों ने (मुनि की) पूजा की।
अर्थ / व्याख्या
ब्रह्मा के अन्तर्धान होने के बाद शिष्य वाल्मीकि की पूजा करते हैं, जो गुरु-भक्ति का प्रतीक है।
टिप्पणी
ब्रह्मा के अपने लोक चले जाने के बाद, वाल्मीकि के शिष्य, जो सदा सेवा में तत्पर रहते थे, उन्होंने गुरु की पूजा की। यह श्लोक गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श को दर्शाता है। शिष्य न केवल सेवा में लगे रहते हैं, बल्कि गुरु के दिव्य साक्षात्कार के बाद उनका सम्मान भी करते हैं। "अभ्यपूजयन्" पूजा की क्रिया को दर्शाता है, जो सम्भवतः फूल-चन्दन आदि अर्पित करके की गई होगी।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक २९ ॥
शिष्याः शुश्रूषवस्तस्य सर्व एवाभ्यपूजयन् ॥
śiṣyāḥ śuśrūṣavastasya sarva evābhyapūjayan ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : इस प्रकार कहकर भगवान् ब्रह्मा वहीं अन्तर्धान हो गए। उनके सभी सेवा में तत्पर शिष्यों ने (मुनि की) पूजा की।
🔹 English Translation : Having spoken thus, Lord Brahma disappeared right there. All the disciples, who were eager to serve, worshipped him (the sage).
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| इति | अव्यय | इस प्रकार |
| उक्त्वा | ल्यबन्त अव्यय (वच् धातु) | कहकर |
| भगवान् | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | भगवान् (पूज्य) |
| ब्रह्मा | संज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | ब्रह्मा |
| तत्रैव | अव्यय (तत्र + एव) | वहीं |
| अन्तरधीयत | क्रिया, कर्मणि लङ्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (अन्तर् + धा धातु) | अन्तर्धान हो गए, लुप्त हो गए |
| शिष्याः | संज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | शिष्य |
| शुश्रूषवः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (शुश्रूषा इच्छा रखने वाले) | सेवा में तत्पर, सेवा की इच्छा रखने वाले |
| तस्य | सर्वनाम, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | उनके (वाल्मीकि के) |
| सर्वे | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | सभी |
| एव | अव्यय | ही |
| अभ्यपूजयन् | क्रिया, लङ्लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन (अभि + पूज् धातु) | पूजा की, सम्मान किया |
📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी
ब्रह्मा के अन्तर्धान होने का वर्णन बताता है कि दिव्य दर्शन क्षणिक होते हैं, किन्तु उनका प्रभाव स्थायी रहता है। "शुश्रूषवः" शब्द शिष्यों की सेवाभावना को प्रदर्शित करता है – वे निरन्तर गुरु की सेवा में लगे रहते हैं। ब्रह्मा के जाने के बाद भी वे गुरु की पूजा करके उनके प्रति अपनी भक्ति और आभार प्रकट करते हैं। यह श्लोक आश्रम के जीवन और गुरु-शिष्य सम्बन्ध की मार्मिक झाँकी प्रस्तुत करता है।
यहाँ "अभ्यपूजयन्" क्रिया बताती है कि शिष्यों ने गुरु की पूजा सम्भवतः मानसिक या क्रियात्मक रूप से की होगी, जैसे चरण वन्दन, पुष्पांजलि आदि।