रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
यावद्रामकथा चेयं प्रवर्तिष्यति मेदिनीम् । तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मल्लोके वत्स्यसे ध्रुवम् ॥
हिंदी अनुवाद
जब तक यह रामकथा पृथ्वी पर प्रचलित रहेगी, तब तक तुम ऊपर और नीचे मेरे लोक में निश्चित रूप से निवास करोगे।
अर्थ / व्याख्या
ब्रह्मा वाल्मीकि को यह वरदान देते हैं कि जब तक रामकथा पृथ्वी पर रहेगी, वे ब्रह्मलोक में निवास करेंगे – यह रामायण के रचयिता के प्रति अनन्त सम्मान का प्रतीक है।
टिप्पणी
यह श्लोक वाल्मीकि की अमरता और उनके दिव्य स्थान की घोषणा करता है। ब्रह्मा जी वचन देते हैं कि जब तक रामकथा पृथ्वी पर प्रचलित है, तब तक वाल्मीकि ब्रह्मलोक में (ऊर्ध्व और अधः – सम्पूर्ण लोक में) निवास करेंगे। यह रामायण के रचयिता के प्रति ब्रह्मा का आशीर्वाद है। "ध्रुवम्" कहकर इसकी निश्चितता बताई गई है।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक २८ ॥
तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मल्लोके वत्स्यसे ध्रुवम् ॥
tāvadūrdhvamadhaśca tvaṃ malloke vatsyase dhruvam ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : जब तक यह रामकथा पृथ्वी पर प्रचलित रहेगी, तब तक तुम ऊपर और नीचे मेरे लोक में निश्चित रूप से निवास करोगे।
🔹 English Translation : As long as this story of Rama continues to circulate on the earth, so long will you certainly dwell in my world, both above and below.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| यावत् | अव्यय | जब तक |
| रामकथा | संज्ञा, स्त्रीलिंग, प्रथमा एकवचन | राम की कथा |
| च | अव्यय | और |
| इयम् | सर्वनाम, स्त्रीलिंग, प्रथमा एकवचन | यह |
| प्रवर्तिष्यति | क्रिया, लृट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (प्र + वृत् धातु) | प्रचलित रहेगी, चलती रहेगी |
| मेदिनीम् | संज्ञा, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | पृथ्वी को (अधिकरण के अर्थ में द्वितीया) |
| तावत् | अव्यय | तब तक |
| ऊर्ध्वम् | अव्यय | ऊपर |
| अधः | अव्यय | नीचे |
| च | अव्यय | और |
| त्वम् | सर्वनाम, मध्यमपुरुष, प्रथमा एकवचन | तुम |
| मल्लोके | संज्ञा (मत् + लोक), पुल्लिंग, सप्तमी एकवचन | मेरे लोक में |
| वत्स्यसे | क्रिया, लृट्लकार, मध्यमपुरुष एकवचन (वस् धातु) | निवास करोगे |
| ध्रुवम् | अव्यय | निश्चित रूप से |
📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी
यह श्लोक वाल्मीकि की अमरता का वरदान है। ब्रह्मा उन्हें आश्वासन देते हैं कि जब तक रामकथा पृथ्वी पर गाई-सुनी जाती रहेगी, तब तक वे ब्रह्मलोक में स्थान पाएँगे। "ऊर्ध्वमधश्च" का अर्थ है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में – उच्च लोक और निम्न लोक सभी में। यह वरदान वाल्मीकि के काव्य की महिमा को स्थापित करता है और यह भी दर्शाता है कि सच्चे कवि को दैवी पुरस्कार मिलता है।
आज भी वाल्मीकि रामायण के रचयिता के रूप में अमर हैं, और उनकी कीर्ति सम्पूर्ण विश्व में फैली है।