रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
प्रकाश्यतां महत्पुण्यमिदं रामायणं त्वया । गुणवत्कार्मुकं कृत्वा यथेन्द्रस्य यशस्विनः ॥
हिंदी अनुवाद
यह महान् पुण्यमय रामायण तुम्हारे द्वारा यशस्वी इन्द्र के सुन्दर धनुष के समान गुणों से युक्त होकर प्रकाशित किया जाए।
अर्थ / व्याख्या
ब्रह्मा वाल्मीकि से कहते हैं कि वे रामायण को ऐसे रचें जैसे इन्द्र का धनुष गुणों (प्रत्यंचा आदि) से युक्त होकर शोभायमान होता है।
टिप्पणी
इस श्लोक में ब्रह्मा वाल्मीकि को रामायण को "गुणवत्" बनाने का निर्देश देते हैं, जैसे इन्द्र का धनुष गुणों (प्रत्यंचा, दिव्यता, आदि) से युक्त होता है। यहाँ "कार्मुक" (धनुष) का दृष्टान्त इसलिए दिया गया है कि जिस प्रकार धनुष अपनी डोरी (गुण) के कारण ही प्रभावशाली होता है, उसी प्रकार रामायण भी रस, अलंकार, गुण आदि से युक्त होकर प्रभावशाली बने। "महत्पुण्यम्" कहकर रामायण की पवित्रता और धार्मिक महत्त्व बताया गया है।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक २७ ॥
गुणवत्कार्मुकं कृत्वा यथेन्द्रस्य यशस्विनः ॥
guṇavatkārmukaṃ kṛtvā yathendrasya yaśasvinaḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : यह महान् पुण्यमय रामायण तुम्हारे द्वारा यशस्वी इन्द्र के सुन्दर धनुष के समान गुणों से युक्त होकर प्रकाशित किया जाए।
🔹 English Translation : May this great and sacred Ramayana be manifested by you, making it endowed with qualities, like the glorious Indra's excellent bow.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| प्रकाश्यताम् | क्रिया, आशीर्लिङ्लकार (प्रार्थना), प्रथमपुरुष एकवचन | प्रकाशित किया जाए, प्रकट हो |
| महत्पुण्यम् | विशेषण (महत् + पुण्य), नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन | महान पुण्यमय |
| इदम् | सर्वनाम, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन | यह |
| रामायणम् | संज्ञा, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन | रामायण |
| त्वया | सर्वनाम, मध्यमपुरुष, तृतीया एकवचन | तुम्हारे द्वारा |
| गुणवत् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | गुणों से युक्त |
| कार्मुकम् | संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | धनुष को |
| कृत्वा | ल्यबन्त अव्यय | बनाकर, करके |
| यथा | अव्यय | जैसे |
| इन्द्रस्य | संज्ञा, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | इन्द्र के |
| यशस्विनः | विशेषण, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | यशस्वी, कीर्तिवान |
📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी
इस श्लोक में ब्रह्मा वाल्मीकि को काव्य-रचना के सिद्धान्त का उपदेश देते हैं। "गुणवत्" शब्द से उनका तात्पर्य काव्य के सभी गुणों (माधुर्य, ओज, प्रसाद, आदि) से है। इन्द्र के धनुष का दृष्टान्त अत्यन्त सटीक है – इन्द्र का धनुष (इन्द्रधनुष) जैसे अनेक रंगों (गुणों) से युक्त होकर आकाश में शोभा पाता है, वैसे ही रामायण भी विभिन्न रसों, अलंकारों और गुणों से युक्त होकर साहित्य-आकाश में देदीप्यमान होगा। साथ ही "महत्पुण्यम्" कहकर रामायण की धार्मिक एवं नैतिक उच्चता को भी स्थापित किया गया है।
वाल्मीकि ने इस निर्देश का पालन करते हुए रामायण को अत्यन्त गुणसम्पन्न महाकाव्य के रूप में रचा, जो आज भी संस्कृत साहित्य का शिरोमणि है।