🔊 शब्द का रहस्य
गर्दै सब्द को मूल, बंद सिंध में मिलि रहे ।
सब्द माहिं अस्थूल, बीज बृच्छ बिस्तार भो ॥
🌊 प्रस्तावना: शब्द का मूल और बंद सिंध
प्रस्तुत पंक्तियाँ आध्यात्मिक साधना के सर्वोच्च रहस्य – शब्द (सत शब्द) – को उद्घाटित करती हैं। “गर्दै सब्द को मूल, बंद सिंध में मिलि रहे” – शब्द का मूल उस बंद (बंदीगृह) सिंध (समुद्र) में मिलता है, जहाँ सारी सृष्टि समाई हुई है। यह रचना शब्द के बीज रूप, उसके विस्तार, सुरत (ध्यान) को शब्द में समाने की विधि, और अंततः हंस (मुक्त आत्मा) के मानसरोवर पहुँचने की यात्रा का वर्णन करती है।
यह गुरुवाणी हमें बताती है कि कैसे शब्द ही सगुण-निर्गुण का विस्तार है, कैसे सुरत को शब्द में लीन करने से निद्रा-भूख जैसी शारीरिक वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं, और कैसे सतगुरु की कृपा से साधक हंस बनकर देह की दशा से परे सुखसागर में स्थित हो जाता है।
📖 मूल पाठ एवं सरल अर्थ (Text & Simple Meaning)
"गर्दै सब्द को मूल, बंद सिंध में मिलि रहे ।
सब्द माहिं अस्थूल, बीज बृच्छ बिस्तार भो ॥"
अर्थ: शब्द का मूल ढूँढ़ो – वह बंद (बंदीगृह) सिंध (समुद्र) में मिलता है। शब्द के भीतर ही अस्थूल (सूक्ष्म) है; (वह) बीज है और वृक्ष (उसी का) विस्तार है।
"लख सोई अलक्ख जो होई । सब्द सुरत सम राख समोई ॥"
अर्थ: उस अलख (अगोचर) को देखो जो (शब्द के रूप में) है। सुरत (ध्यान) को शब्द के साथ एक समान रखते हुए समा जाओ।
"सब्द सनेही राखे चीन्हा । निसि दिन रहे सब्द में लीना ॥"
अर्थ: जो शब्द का स्नेही (प्रेमी) है, वह (उसकी) पहचान रखता है। दिन-रात वह शब्द में लीन रहता है।
"निर्गुन सर्गुन तासु पसारा । आप आपना रूप निहारा ॥"
अर्थ: निर्गुण और सगुण – यह उसी (शब्द) का विस्तार है। वह अपना ही रूप निहार रहा है।
"तेहि सब दृष्टि रहे अनुरागी । आस्त्रम माहिं होय बैरागी ॥"
अर्थ: उस (शब्द) में सबकी दृष्टि अनुरागी रहती है। (वह) आसुर (अस्त्र-शस्त्र) के भीतर भी बैरागी हो जाता है।
"ऐसी सुरति रहे लो लाई । निद्रा भूख सहज ही जाई ॥"
अर्थ: ऐसी सुरति (ध्यान-स्थिति) जब लो-लाई (लगन) से रहती है, तो नींद और भूख सहज ही समाप्त हो जाती है।
"पारब्रह्म की महिमा भाखे । विषय तजै अमृत रस चावै ॥"
अर्थ: (साधक) परब्रह्म की महिमा का वर्णन करता है, विषयों (भोगों) को त्यागता है और अमृत रस का आस्वादन करता है।
"मन थक ब्रह्म होय जो वाके । देखे सुन्य मार्ग फिर ताके ॥"
अर्थ: जिसका मन थक (समाप्त) हो जाता है, वह ब्रह्म हो जाता है। वह शून्य मार्ग (सुषुम्ना/शून्यता का मार्ग) देखता है, फिर उसी में विचरण करता है।
दोहा
"पृथ्वी अप और तेज नहिं, नहीं वायु आकास ।
अललपच्छ तह होइ रहो, सत्त सब्द बिस्वास ॥"
अर्थ: वहाँ (उस अवस्था में) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश – ये पाँच तत्व नहीं होते। अलल-पच्छ (अवर्णनीय) वहाँ हो जाओ। सत शब्द पर विश्वास रखो।
चौपाई 33
"सो त हंख रावरा होई। मानसरोवर पहुँचे सोई ॥"
अर्थ: वह (साधक) हंस (हंस) ही होता है। वही मानसरोवर (ज्ञान के सरोवर) तक पहुँचता है।
"काया पलट होय आवन । तब पावे सतगुरु की सैना ॥"
अर्थ: काया का पलट (परिवर्तन) होता है, (जीव) आवन-जावन से मुक्त होता है। तब वह सतगुरु की सेना (शरण/संगति) पाता है।
"देह दसा विसरै जेहि केरी । काटै करम भरम को बेरी ॥"
अर्थ: जिसकी देह की दशा (शरीर का भान) विसर जाता है, वह कर्म और भ्रम की बेरी (बाड़/बंधन) काट देता है।
"फिर देही नाहीं घर लेही । सुख बासा सुखसागर रहही ॥"
अर्थ: फिर वह (देही) घर नहीं लेता (पुनः शरीर धारण नहीं करता)। वह सुख-बासा (सुख के निवास) सुखसागर में रहता है।
"हंसन के संग करें जहीरा । पाँच तच को रहे सरीरा ॥"
अर्थ: (वह) हंसों के साथ जहीरा (विहार) करता है। (फिर भी) पाँच तत्वों का शरीर (उसके पास) रहता है (पर वह उससे लिप्त नहीं)।
"विमल होय हंसा की देही । सदा रहे जो सब्द सनेही ॥"
अर्थ: हंस की देह विमल (शुद्ध) हो जाती है। जो शब्द का स्नेही है, वह सदा (ऐसा ही) रहता है।
"मिटै विदेस की आसा जबही । पहुँचे जाय देस में तबही ॥"
अर्थ: जब विदेश (संसार) की आशा मिट जाती है, तब वह अपने देश (सतलोक) में पहुँच जाता है।
दोहा
"हंस होय सत जीव जो, करै देस की आस ।
जिन प्रतीत है सब्द की, करिहै सो सुख बास ॥"
अर्थ: जो जीव हंस होता है (सच्चा हंस), वह देश (सतलोक) की आशा करता है। जिसे शब्द पर प्रतीति (विश्वास) है, वही सुख का निवास (प्राप्त) करेगा।
महिमा अगम – सोरठा
"अपार, ताहि अगोचर जानिये ।
सार, जो सतगुरू दया करें ॥"
अर्थ: (शब्द) अपार है, उसे अगोचर (इंद्रियों से परे) जानना चाहिए। सार (तत्व) वह है, जो सतगुरु दया करके (बताते हैं)।
🔍 शब्द का मूल – बंद सिंध का रहस्य
"गर्दै सब्द को मूल, बंद सिंध में मिलि रहे" – यह पंक्ति अत्यंत गूढ़ है। “बंद सिंध” का अर्थ है वह समुद्र जहाँ सब कुछ बंद (संग्रहीत) है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह दसवें द्वार (दशम द्वार) या सहस्रार के परे का स्थान है, जहाँ से शब्द की ध्वनि निकलती है। यह मूलाधार से लेकर सहस्रार तक की यात्रा का सार है।
बीज और वृक्ष का रूपक
"सब्द माहिं अस्थूल, बीज बृच्छ बिस्तार भो" – शब्द ही बीज है, शब्द ही वृक्ष, और शब्द ही सृष्टि का विस्तार। यह उसी परमतत्त्व की अभिव्यक्ति है जो एक से अनेक रूपों में प्रकट होता है।
- बीज: अव्यक्त, निर्गुण रूप
- वृक्ष: व्यक्त, सगुण रूप – सम्पूर्ण सृष्टि
- बिस्तार: विस्तार – नाम-रूप का प्रपंच
🔑 साधना का मर्म: साधक को उस मूल बीज (शब्द) को पहचानना है, जो सबका आधार है। जैसे बीज में वृक्ष समाया होता है, वैसे ही शब्द में सम्पूर्ण सृष्टि समाई है।
🧘 सुरत-शब्द का सम्मिलन – साधना का मूल
"लख सोई अलक्ख जो होई । सब्द सुरत सम राख समोई ॥" – यह साधना का सूत्र है। अलक्ख (अलख) का अर्थ है जो इंद्रियों से परे, अगोचर है। उस अलख को देखना (लखना) है – जो शब्द के रूप में है।
सुरत
ध्यान, चेतना की एकाग्रता, भीतर की सुनने की शक्ति
शब्द
अनाहत नाद, सत शब्द, ब्रह्मांडीय ध्वनि
"सब्द सुरत सम राख समोई" – जब सुरत और शब्द एक समान हो जाते हैं, अर्थात सुरत पूरी तरह शब्द में लीन हो जाती है, तब साधक समोई (समाधि) की अवस्था में पहुँच जाता है। यही योग का सच्चा स्वरूप है।
🌀 निर्गुन-सगुन का विस्तार – शब्द ही सर्वस्व
"निर्गुन सर्गुन तासु पसारा । आप आपना रूप निहारा ॥" – यह अद्वैत दर्शन का सार है। निर्गुण और सगुण – दोनों उसी एक शब्द का विस्तार हैं। जैसे सूर्य और उसकी किरणें अलग-अलग प्रतीत होते हुए भी एक ही हैं।
निर्गुन पक्ष
अव्यक्त, अगोचर, बीज रूप, शब्द का मूल
सगुण पक्ष
व्यक्त, साकार, वृक्ष रूप, शब्द का विस्तार
"तेहि सब दृष्टि रहे अनुरागी । आस्त्रम माहिं होय बैरागी ॥" – यह गहन रहस्य है। “आस्त्रम” का अर्थ है अस्त्र-शस्त्र अर्थात संसार के भोग-विलास और युद्ध-द्वंद्व। ऐसा साधक जो शब्द में अनुरागी है, वह संसार के भीतर रहते हुए भी पूर्ण बैरागी होता है। उसे कोई भी वस्तु बाँध नहीं सकती।
🔑 सिद्धावस्था: “ऐसी सुरति रहे लो लाई । निद्रा भूख सहज ही जाई” – जब यह सुरति (ध्यान-स्थिति) लगन (प्रेम) से स्थिर हो जाती है, तो नींद और भूख जैसी शारीरिक आवश्यकताएँ सहज ही समाप्त या नियंत्रित हो जाती हैं। यह किसी बलात्कार से नहीं, बल्कि उच्च चेतना के उदय से स्वतः घटित होता है।
🌌 परब्रह्म की महिमा और शून्य मार्ग
"पारब्रह्म की महिमा भाखे । विषय तजै अमृत रस चावै ॥" – शब्द में लीन साधक परब्रह्म (परमात्मा) की महिमा का वर्णन करता है, अर्थात वह स्वयं उस अनुभूति में विलीन हो जाता है। वह विषयों (भोग-विलास) को त्याग देता है और अमृत रस (आध्यात्मिक आनंद) का आस्वादन करता है।
मन थक ब्रह्म होय
जिसका मन थक जाता है – अर्थात मन की सारी वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं – वह ब्रह्म (परमात्मा) हो जाता है। यह अद्वैत का सिद्धांत है: ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।
शून्य मार्ग
"देखे सुन्य मार्ग फिर ताके" – वह शून्य मार्ग (सुषुम्ना, शून्यता का मार्ग) देखता है और उसी में विचरण करता है। यह योग मार्ग का उच्चतम स्थान है, जहाँ साधक शून्य (निराकार) में स्थित होता है।
🦢 हंस की यात्रा: मानसरोवर से सुखसागर तक
"सो त हंख रावरा होई। मानसरोवर पहुँचे सोई ॥" – यहाँ हंस शब्द आता है। हंस वह मुक्त आत्मा है जो संसार के कीचड़ में रहकर भी अलिप्त रहती है, जैसे हंस जल में रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता। मानसरोवर ज्ञान और शुद्धि का सरोवर है – यह आध्यात्मिक पराकाष्ठा का प्रतीक।
काया पलट और सतगुरु की सैना
"काया पलट होय आवन । तब पावे सतगुरु की सैना" – काया का पलट (परिवर्तन) अर्थात देह-अभिमान का नाश। जब यह होता है, तो साधक सतगुरु की सैना (संगति, शरण) को प्राप्त करता है। सैना का अर्थ सेना – यहाँ सतगुरु के सच्चे शिष्यों का समूह, या सतगुरु की कृपा का अटूट सहारा।
देह दशा विसरै – कर्म-भ्रम का नाश
"देह दसा विसरै जेहि केरी । काटै करम भरम को बेरी" – जिसकी देह की दशा (शरीर का बोध) विसर जाता है, वह कर्म और भ्रम की बेरी (बाड़, बंधन) को काट देता है। यह स्थिति तब आती है जब सुरत शब्द में लीन हो जाती है।
✨ सुखसागर में स्थिति: “फिर देही नाहीं घर लेही । सुख बासा सुखसागर रहही” – अब वह देही (जीवात्मा) पुनः घर (शरीर) नहीं लेता। वह सुख के बास (निवास) सुखसागर (सतलोक) में सदा रहता है।
हंसों के संग जहीरा
"हंसन के संग करें जहीरा" – मुक्त आत्मा अन्य मुक्त आत्माओं (हंसों) के साथ विहार करती है। यह सतलोक की अनुभूति है, जहाँ सब मिलकर आनंद में रहते हैं।
पाँच तच का शरीर
"पाँच तच को रहे सरीरा" – भले ही पाँच तत्वों का शरीर बना रहे, पर उससे कोई बंधन नहीं। शरीर तो वैसे ही है जैसे हंस का पंख – जल से लिप्त नहीं।
🏡 विदेश से स्वदेश – आशा का अंत, प्राप्ति का आरंभ
"मिटै विदेस की आसा जबही । पहुँचे जाय देस में तबही" – यह सबसे स्पष्ट कथन है। विदेश यह संसार है, जहाँ हम परदेशी की तरह भटक रहे हैं। देश हमारा सच्चा घर है – सतलोक, परमधाम। जब तक विदेश (संसार) की आशा (लालसा, मोह) नहीं मिटती, तब तक साधक अपने देश में नहीं पहुँच सकता।
विदेश की आशा क्या है?
- धन-संपत्ति की लालसा
- शरीर और इंद्रियों के सुखों की आसक्ति
- नाम-यश की इच्छा
- संबंधों में मोह
देश (सतलोक) कैसे पहुँचें?
- शब्द पर प्रतीति (विश्वास) रखें
- सुरत को शब्द में समाएँ
- सतगुरु की शरण लें
- हंस बनकर रहें – संसार में रहते हुए भी अलिप्त
🔑 “हंस होय सत जीव जो, करै देस की आस” – सच्चा हंस वह है जो देस (सतलोक) की आशा करता है, संसार की नहीं। उसकी सारी लगन परमधाम में लगी होती है।
“जिन प्रतीत है सब्द की, करिहै सो सुख बास” – जिसे शब्द पर प्रतीति (दृढ़ विश्वास) है, वही सच्चे सुख के निवास को प्राप्त करेगा।
🙏 सतगुरु की दया – अपार, अगोचर, सार
"अपार, ताहि अगोचर जानिये ।
सार, जो सतगुरू दया करें ॥"
यह सोरठा संपूर्ण रचना का निष्कर्ष है। शब्द अपार है – उसकी कोई सीमा नहीं। उसे अगोचर जानना चाहिए – अर्थात वह इंद्रियों से परे है, केवल आंतरिक अनुभव से जाना जा सकता है।
अपार
अनंत, असीम, जिसका पार न हो
सार
सार तत्व, निचोड़, जो सतगुरु दया करके बताते हैं
📝 सारांश: शब्द ही आधार, सतगुरु ही द्वार
इस संपूर्ण रचना का सार निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
शब्द ही बीज और वृक्ष
शब्द ही सृष्टि का मूल कारण है, उसी से सबका विस्तार हुआ है।
सुरत-शब्द का सम्मिलन
ध्यान (सुरत) को शब्द में समाना ही साधना है, यही समाधि का मार्ग है।
शब्द स्नेही का जीवन
जो शब्द से प्रेम करता है, वह दिन-रात शब्द में लीन रहता है, निद्रा-भूख से परे होता है।
पंचतत्वों से परे
शब्द की उच्च अवस्था में पाँच तत्वों का भान नहीं रहता, केवल अलल-पच्छ (अवर्णनीय) शेष रहता है।
हंस बनना
साधक हंस बन जाता है, मानसरोवर पहुँचता है, कर्म-भ्रम का बंधन काटता है।
विदेश से स्वदेश
संसार की आशा मिटने पर सतलोक (स्वदेश) की प्राप्ति होती है – यही मुक्ति है।
🙏 सतगुरु की दया से मिले सत शब्द,
सुरत समाए तो मिटे सब भेद ।
हंस बने, पहुँचे मानसरोवर,
सुखसागर में हो सदा निवास ॥