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Kabir Amritvani

संत वाणी: सतनाम – निर्मास पद और सतलोक की यात्रा (Sant Vani: Satnaam – The Immaculate State and the Journey to Sattlok)

268 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

🧘 संत वाणी: सतनाम – सतलोक का सोपान

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

सत्तनाम निर्मास पद, सत्तलोक को जाय

नाम अमी रस पीव, काहे को विष सींचही

🌟 सतनाम – निर्मल पद और सतलोक का द्वार

प्रस्तुत है संत वाणी का एक अत्यंत गूढ़ अंश, जो सतनाम को निर्मास पद (निर्मल, मल-रहित अवस्था) के रूप में स्थापित करता है। यह वाणी बताती है कि कैसे सतनाम के सहारे जीव सतलोक (परम धाम) को प्राप्त होता है, और कैसे करम-काल के बंधन में पड़ा जीव संसार के झूठे आस (आशा) में भटकता है।

संत कहते हैं कि नाम अमी रस (अमृत रस) को पीने वाला ही सच्चा सुख पाता है; अन्यथा जीव विष (संसारिक मोह) में डूबा रहता है। वाणी में काया के भीतर के पाताल-आकाश, चंद्र-सूर्य स्थान, और उलट चोर कोतवाले जैसे योगिक रहस्यों का भी वर्णन है। यह वह मार्ग है जहाँ रैन-दिवस एक समान हो जाते हैं, और सहज समाधि लगती है। अंत में संत कहते हैं कि यह सारा खेल (संसार) निज घट (अपने ही शरीर) के भीतर ही है – “निज घट घट का खेल पसारा”।

📖 संत वाणी: मूल पाठ एवं सरल अर्थ

“सत्तनाम निर्मास पद, सत्तलोक को जाय ।
झूठ आस संसार की, जेहि लागो जिव धाय ॥”

सरल अर्थ: सतनाम निर्मास (निर्मल, मल-रहित) पद है; इसके द्वारा सतलोक (परम धाम) को जाया जाता है। संसार की झूठी आस (आशा, मोह) जिस जीव को लग जाती है, वह (भटकता हुआ) दौड़ता रहता है।

“करम काल बस जीव, भमें जो जिव पचि मरे ।
नाम अमी रस पीव, काहे को विष सींचही ॥”

सरल अर्थ: जीव कर्म और काल के वश में है; वह भटकता है, और (कर्मों में) पचकर मर जाता है। (अतः) नाम अमी (अमृत) रस को पीओ। काहे को (क्यों) विष (संसारिक मोह-माया) सींचते हो?

“नमुन ते जो सब रस चाखा । मन पवना जो अंतर राखा ।
काया में पाताल अकासा । निःअच्छर मजहर है देसा ॥
पापा मेटि के तारी लावे । चंद्र स्थान में सूर उगावै ॥
बंध कृप दामिनि परकासे । अगम पंथ जेहि कीन्ह गुफा से ॥
गाँजी दार अजर जह झाँका । वह होइ बाट चले सो ताका ॥
गन मंडल में आसन माँडे । उलट चोर कोतवाले डाँड़े ॥
भेंडप चहुँ दिस एकहि वेरा । मिटि गई भोजल जीवन केरा ॥”

सरल अर्थ: (साधक) नमन (प्रणाम) करके सब रसों को चखता है। मन और प्राण (पवन) को अंतर (भीतर) में रखता है। इस काया (शरीर) के भीतर ही पाताल और आकाश (सारा ब्रह्मांड) है। निःअच्छर (शब्द-रहित, परम ब्रह्म) का मजहर (प्रकट स्थान) यही देस (देश/शरीर) है। यह (साधन) पापों को मिटाकर पार उतारता है। चंद्र स्थान (आज्ञा चक्र/सहस्रार के नीचे) में सूर्य को उगाता है। बंध (बंधन) को कृप (दया) से दामिनी (बिजली) के समान प्रकाशित करता है। अगम (दुर्गम) पंथ को गुफा (शरीर की गुफा/ब्रह्मरंध्र) से (पार) करता है। गाँजी दार (गज-द्वार?/मस्तिष्क के द्वार) अजर (अविनाशी) स्थान में झाँकता है। वही (साधक) उस बाट (मार्ग) पर चलता है। गण मंडल (सूर्य-चंद्र आदि ग्रहों के मंडल) में आसन जमाता है। उलट चोर (उलटी साधना/प्रत्याहार) कोतवाल (रक्षक) के समान डाँड़े (डंडा/नियंत्रण) लगाता है। भेंडप (भेद/रहस्य) चारों दिशाओं में एक ही बार में प्रकट हो जाता है। और भवसागर (भोजल) जीवन का (बंधन) मिट जाता है।

“रैन दिवस इक सम करे, तिमिर न होय प्रकास ।
आदि ब्रह्म ते दीखई, पूजे मन की आस ॥”

सरल अर्थ: (जो साधक) रात और दिन को एक समान कर लेता है (द्वंद्व से परे हो जाता है), उसके लिए अंधकार (तिमिर) और प्रकाश में कोई भेद नहीं रहता। तब आदि ब्रह्म (आदि परमात्मा) दिखाई देता है, और मन की सब आशाएँ पूर्ण हो जाती हैं।

“सतगुरु के परसाद, सहज समाध लगाइये ।
रीकि रहा मन नाद, देखि भेद सब जानिये ॥”

सरल अर्थ: सतगुरु की कृपा (प्रसाद) से सहज समाधि (स्वाभाविक समाधि) लगाई जाती है। मन रीकि (रिक्त, शून्य) रह जाता है, और (अनहद) नाद (ध्वनि) में लीन हो जाता है। इस प्रकार भेद (रहस्य) को देखकर सब कुछ जान लिया जाता है।

“कहि है जग ब्रह्म निनारा । निज घट घट का खेल पसारा”

सरल अर्थ: कहा जाता है कि जगत में ब्रह्म निराला (अद्वितीय, अलग) है। यह सारा खेल (संसार) अपने ही घट (शरीर) के भीतर विस्तारित है।

🕉️ वाणी का आध्यात्मिक विश्लेषण

1. सतनाम – निर्मास पद और सतलोक

“निर्मास” का अर्थ है निर्मल, मल-रहित, जहाँ किसी प्रकार का आवरण न हो। सतनाम वह साधन है जो जीव को इस निर्मल अवस्था में पहुँचाता है। सतलोक परम धाम है – जहाँ सत् (सत्य) का वास है। यह कोई भौतिक स्थान नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है जहाँ जीव सच्चिदानंद स्वरूप में स्थित होता है। “झूठ आस संसार की” – संसार की आशाएँ मिथ्या हैं, जो जीव को भटकाती हैं।

2. करम-काल का बंधन और नाम अमृत

जीव कर्म और काल (समय/मृत्यु) के वश में है। कर्म के कारण वह बार-बार जन्म-मरण लेता है, और काल उसकी आयु को सीमित करता है। इस बंधन से मुक्ति का एकमात्र उपाय है “नाम अमी रस” – सतनाम रूपी अमृत। यह अमृत पीने वाला विष (संसारिक मोह) को त्याग देता है।


3. काया में पाताल-आकाश – अंतर्यात्रा

यह योग विज्ञान का गहन रहस्य है – सारा ब्रह्मांड इसी काया (शरीर) के भीतर स्थित है। पाताल (मूलाधार) से आकाश (सहस्रार) तक, सब कुछ इसी देह में है। “निःअच्छर मजहर है देसा” – निःअच्छर (शब्द-रहित) परम ब्रह्म का प्रकट स्थान यही देह है। इसलिए बाहर कहीं खोजने की आवश्यकता नहीं; भीतर ही सब कुछ है।

4. चंद्र स्थान में सूर्य – प्राण और मन का संयोग

योग में “चंद्र स्थान” आज्ञा चक्र या सहस्रार के निकट का स्थान है, जहाँ प्राण की ऊर्जा एकत्र होती है। “सूर्य उगावै” का अर्थ है कि वहाँ आत्म-ज्योति का प्रकट होना। यह कुंडलिनी जागरण की अवस्था है, जहाँ प्राण सुषुम्ना में प्रवेश करता है और साधक को परम ज्ञान की अनुभूति होती है।


5. उलट चोर कोतवाले – विपरीत साधना

“उलट चोर” का अर्थ है उलटी साधना – इंद्रियों को बाहर से हटाकर भीतर की ओर मोड़ना (प्रत्याहार)। “कोतवाले डाँड़े” का अर्थ है कि साधक अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लेता है, जैसे कोतवाल (रक्षक) चोरों पर डंडा चलाता है। यह साधना की पराकाष्ठा है।

6. रैन-दिवस एक सम – द्वंद्व से परे

जब साधक द्वंद्वों (सुख-दुःख, शीत-उष्ण, रात-दिन) से परे हो जाता है, तब उसे “आदि ब्रह्म” का दर्शन होता है। यही सहज समाधि की अवस्था है – जहाँ मन रीकि (शून्य) रहता है और अनहद नाद में लीन हो जाता है।


7. निज घट घट का खेल – अपने भीतर ही सब

अंतिम पंक्ति – “निज घट घट का खेल पसारा” – इस वाणी का सार है। यह सारा संसार, यह सारा खेल (लीला), अपने ही घट (शरीर/हृदय) के भीतर विस्तारित है। बाहर कुछ भी नहीं है। जो इस रहस्य को जान लेता है, वही सच्चा ज्ञानी है।

🧘 साधना पथ: सतनाम से सतलोक, अपने भीतर की यात्रा

यह वाणी साधक को स्पष्ट रूप से बताती है कि सतनाम ही वह साधन है जो जीव को निर्मास पद और सतलोक तक पहुँचाता है। यह यात्रा बाहर नहीं, बल्कि अपने शरीर के भीतर ही है।

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सतनाम अमृत

“नाम अमी रस पीव” – सतनाम का जाप और स्मरण ही अमृत है। यह करम-काल के बंधन को तोड़ता है। संसार के विष (मोह) को त्यागें, और इस अमृत को पियें।

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अंतर्यात्रा

“काया में पाताल अकासा” – सारा ब्रह्मांड इसी देह में है। ध्यान को भीतर लगाएँ, मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा करें। चंद्र स्थान में सूर्य उगते देखें।

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सहज समाधि

“सतगुरु के परसाद, सहज समाध लगाइये” – सतगुरु की कृपा से सहज समाधि (स्वाभाविक समाधि) लगती है। मन शून्य हो जाता है, अनहद नाद में लीन हो जाता है। यही साधना का चरम फल है।

📌 अभ्यास सुझाव: प्रतिदिन ध्यान में सतगुरु का स्मरण करें और सतनाम का जाप करें। धीरे-धीरे ध्यान को भीतर की ओर लगाएँ। शरीर के भीतर विभिन्न चक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा, सहस्रार) की यात्रा का अनुभव करें। “उलट चोर” बनें – इंद्रियों को बाहर से हटाकर भीतर मोड़ें। जब मन स्थिर हो, तो अनहद नाद को सुनने का प्रयास करें। सतगुरु की कृपा से “सहज समाधि” अपने आप लगने लगेगी। याद रखें, यह सारा खेल “निज घट” (अपने ही शरीर) के भीतर है – बाहर कहीं खोजने की आवश्यकता नहीं।

🌹 अन्य संतों की वाणी में सतनाम, सतलोक और सहज समाधि

“सतनाम सार है सब जग में, सतनाम ही सतलोक।
सतनाम बिना जग क्यों तरै, सतनाम ही मोख।।”

– संत कबीर

“सहज समाधि सुख पाइये, गुरु मिले जब आय।
नानक नाम अधार है, नामे ही छुटि जाय।।”

– गुरु नानक

“घट घट में ब्रह्म समाया, बाहर क्या खोजै जाय।
कबीर घट भीतर ही खेल, सतगुरु मिले दिखाय।।”

– संत कबीर

❓ वाणी से जुड़े सामान्य प्रश्न

प्रश्न 1: “निर्मास पद” का क्या अर्थ है?

उत्तर: “निर्मास” का अर्थ है निर्मल, मल-रहित, जहाँ किसी प्रकार की अशुद्धि या आवरण न हो। “निर्मास पद” वह अवस्था है जहाँ जीव सभी मलों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होता है। सतनाम के स्मरण से यह अवस्था प्राप्त होती है।

प्रश्न 2: “चंद्र स्थान में सूर उगावै” – यह कौन-सा योगिक रहस्य है?

उत्तर: योग में “चंद्र स्थान” आज्ञा चक्र (भौंहों के मध्य) या सहस्रार के निकट का स्थान है। “सूर उगावै” का अर्थ है उस स्थान पर आत्म-ज्योति (प्रकाश) का प्रकट होना। यह कुंडलिनी जागरण की उच्च अवस्था है, जहाँ प्राण शक्ति सुषुम्ना में प्रवेश करके सहस्रार तक पहुँचती है। यहाँ साधक को दिव्य दर्शन और अनुभूति होती है।

प्रश्न 3: “उलट चोर कोतवाले डाँड़े” – इसका आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

उत्तर: “उलट चोर” उस साधक को कहते हैं जो इंद्रियों को बाहर के विषयों से हटाकर भीतर की ओर मोड़ लेता है (प्रत्याहार)। “कोतवाले डाँड़े” का अर्थ है कि वह अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लेता है। जैसे कोतवाल (रक्षक) चोरों को डंडा मारकर भगाता है, वैसे ही साधक विषय-वासनाओं को मन से निकाल बाहर करता है। यह साधना की पराकाष्ठा है।

प्रश्न 4: “सहज समाधि” क्या है?

उत्तर: समाधि की अनेक अवस्थाएँ हैं – ध्यान से लेकर निर्विकल्प समाधि तक। “सहज समाधि” वह अवस्था है जो स्वाभाविक, बिना किसी प्रयास के, सहज ही प्राप्त होती है। यह तब आती है जब साधक सतगुरु की कृपा से नाम के अभ्यास में पूर्ण रूप से स्थिर हो जाता है। इस अवस्था में मन शून्य रहता है और अनहद नाद में लीन हो जाता है। साधक को यह समाधि लगानी नहीं पड़ती, बल्कि वह अपने आप लग जाती है – इसलिए “सहज” कहलाती है।

प्रश्न 5: “निज घट घट का खेल पसारा” – इसका क्या तात्पर्य है?

उत्तर: यह वाणी का सार है। इसका अर्थ है कि यह सारा संसार, यह सारी लीला, अपने ही शरीर (घट) के भीतर विस्तारित है। ब्रह्मांड बाहर नहीं, बल्कि भीतर है। जो इस रहस्य को जान लेता है, वह बाहर की खोज छोड़कर भीतर की यात्रा पर निकल पड़ता है। यही सच्चा आत्म-ज्ञान है।

📝 सतनाम – निर्मास पद से सतलोक तक, अपने भीतर की यात्रा

यह संत वाणी हमें सबसे गहरा संदेश देती है – सतनाम ही वह साधन है जो जीव को निर्मास पद (निर्मल अवस्था) और सतलोक (परम धाम) तक पहुँचाता है। संसार की “झूठी आस” में भटकने वाला जीव कर्म और काल के वश में है; वह विष (मोह-माया) को सींचता है, जबकि उसे नाम अमृत पीना चाहिए।

यह वाणी योग विज्ञान का भी विस्तृत मानचित्र है – काया के भीतर पाताल-आकाश, चंद्र-सूर्य का स्थान, उलट चोर की साधना, और अंत में सहज समाधि। संत कहते हैं कि यह सब कुछ “निज घट” (अपने ही शरीर) के भीतर ही है। बाहर कहीं खोजने की आवश्यकता नहीं।

इसलिए साधक को चाहिए कि वह सतगुरु की शरण ले, सतनाम का जाप करे, और अपने ही शरीर के भीतर की यात्रा पर निकल पड़े। जब वह “रैन-दिवस एक सम” कर लेगा, “तिमिर न होय प्रकास” (अंधकार और प्रकाश में भेद न रहेगा), तब उसे “आदि ब्रह्म” के दर्शन होंगे, और उसकी मन की सब आशाएँ पूर्ण हो जाएँगी।

यही सतगुरु के प्रसाद से मिलने वाली “सहज समाधि” है – जहाँ मन रीकि रहता है, अनहद नाद में लीन हो जाता है, और सब भेद समझ में आ जाते हैं।

🙏 ॐ सतनाम निर्मास पदाय नमः || सतलोक प्रदायकाय नमः || सहज समाधये नमः ||

🧘 सत्तनाम निर्मास पद, सत्तलोक को जाय
निज घट घट का खेल पसारा

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "संत वाणी: सतनाम – निर्मास पद और सतलोक की यात्रा (Sant Vani: Satnaam – The Immaculate State and the Journey to Sattlok)" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

श्रेणियां: Kabir Amritvani

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 05 Sep 2026

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