मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
🚪 दसवें द्वार की यात्रा
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।
अगम चढ़े जो चीन्हे कोई । धरती सुरति सो गगन समोई ॥
🌌 प्रस्तावना: अगम चढ़ना – साधना का अंतिम पड़ाव
प्रस्तुत पंक्तियाँ आध्यात्मिक साधना के उस परम शिखर को स्पर्श करती हैं, जहाँ साधक की सुरत (ध्यान) धरती (भौतिक शरीर) को छोड़कर गगन (आकाश, सहस्रार के परे) में समा जाती है। “अगम चढ़े” – उस दुर्गम, अगम्य स्थान पर चढ़ना, जहाँ केवल सतगुरु की कृपा से ही पहुँचा जा सकता है। यह यात्रा दसवें द्वार (दशम द्वार) से होकर गुजरती है – जहाँ आत्मा जागती है, और तब साधक को अनहद बानी का अनुभव होता है।
यह गुरुवाणी हमें बताती है कि कैसे मूल मंत्र (सतनाम) ही वह कुंजी है, जो कुंडी (बंद द्वार) खोलती है, और कैसे उसके बाद साधक तीनों लोकों के पार, जहाँ सन्नाटे में अनहद नाद गूँजता है, स्थित हो जाता है।
📖 मूल पाठ एवं सरल अर्थ (Text & Simple Meaning)
"अगम चढ़े जो चीन्हे कोई । धरती सुरति सो गगन समोई ॥"
अर्थ: उस अगम (दुर्गम) पर चढ़े हुए को शायद ही कोई पहचानता है। (उसकी) धरती (भौतिक शरीर) की सुरति गगन (आकाश, उच्च चेतना) में समा जाती है।
"तारी दसवें द्वारे लागी । गुरु प्रताप से आतम जागी ॥"
अर्थ: (उसकी) तार (सुरत/नाड़ी) दसवें द्वार (दशम द्वार) पर लग जाती है। गुरु के प्रताप (कृपा) से आत्मा जाग जाती है।
"तन मन की गति मति बिसरावै । सरतवंत कोई सहज समावै ॥"
अर्थ: (वह) तन और मन की गति-मति (चेष्टाएँ) भूल जाता है। (ऐसा) सरतवंत (चेतनावान) साधक सहज ही समा जाता है।
"धरती तजि जब चढ़े अकासा । देखे झिलमिल बिमल तमासा ॥"
अर्थ: जब (वह) धरती (शरीर) को त्याग कर आकाश (सहस्रार/शून्य) पर चढ़ता है, तब वह झिलमिलाता हुआ विमल (शुद्ध) तमाशा (दिव्य दृश्य) देखता है।
"उर्थ रूप जाय निज अई। गगन के मध्य मगन होइ रहई ॥"
अर्थ: (उसका) ऊर्ध्व रूप (सूक्ष्म शरीर) अपने (सच्चे) स्थान को प्राप्त होता है। वह गगन (आकाश) के मध्य में मगन होकर रहता है।
"बज्र किवाड़ी लेहि उघारी । थाके मन जब बाज' विचारी ॥"
अर्थ: (साधक) वज्र (अत्यंत कठोर) किवाड़ (द्वार) को खोल लेता है। जब मन (विचार) थक जाता है, तब (वह द्वार) बाज (खुल) जाता है – ऐसा विचार करो।
दोहा
"सहज सुन्न के आगे, तीन लोक के पार ।
जहाँ निसान बजावही, सन्दन की भनकार ॥"
अर्थ: (वह स्थान) सहज सुन्न (सहज शून्य) के आगे, तीनों लोकों के पार है। जहाँ (अनहद) निशान (ध्वनि) बजती है, (और) सन्दन (शंख?) की भनकार (गूँज) सुनाई देती है।
सोरठा
"सुनै जो अगम संदेस, निगम थके गुन गाय के ।
कुटे सब भ्रम भेस, निहचे जाय प्रमान कर ॥"
अर्थ: जो उस अगम (दुर्गम) का संदेश (अनहद नाद) सुनता है – (जहाँ) वेद (निगम) गुणगान करते-करते थक गए – वह सब भ्रम (और) भेष (रूप-आवरण) कुट (नष्ट) कर देता है, और निश्चय ही प्रमाण (सत्य) को प्राप्त हो जाता है।
चौपाई 36
"अच्छर है निज सार अरूपा । जा ते सब जग धरा सरूपा ॥"
अर्थ: (वह) अच्छर (अक्षर/अविनाशी) अपने सार (तत्व) में अरूप (निराकार) है। जिससे सारा जगत सरूप (साकार) धारण करता है।
"लौ लावै छिन नहिं विसरावै । आदि अंत की मड पावै ॥"
अर्थ: जो (उस पर) लगन लगाता है, क्षण भर नहीं विसरता, वह आदि-अंत (सम्पूर्णता) की मड (महिमा/पद) पाता है।
"मूल मंत्र यह सतगुरु बोला । कुंजी कुफल ते कुंडी खोला ॥"
अर्थ: यह मूल मंत्र सतगुरु ने बोला (दिया)। (यह) कुंजी है – कुफल (कुसुम?) से कुंडी (द्वार की कुंडी) खोल दी।
"मूल अहै जो सब में धरिया । अनहद बानी अनुभव कहिया ॥"
अर्थ: वह मूल (स्रोत) है जो सब में धरा (विद्यमान) है। उसे अनहद बानी (अनाहत ध्वनि) के अनुभव से जाना जाता है।
"मूल सब्द जो बोले बानी । आदि अंत की मध सहदानी ॥"
अर्थ: वह मूल शब्द (सत शब्द) जो बानी के रूप में बोला जाता है, आदि-अंत की मध (मधुरता) का सहदानी (सहज दाता) है।
"मूल मंत्र सोई लख पावे । जाको सतगुरु सुरति लगावै ॥"
अर्थ: उस मूल मंत्र को वही देख (प्राप्त) सकता है, जिसको सतगुरु सुरति (ध्यान) लगाते हैं।
"सुरति सनेही सभी विचारा । सतगुरु ऊपर चढ़े पुकारा ॥"
अर्थ: सुरति स्नेही (जो सुरति से प्रेम करता है) सभी (बातों) का विचार करता है। सतगुरु के ऊपर चढ़कर (उनकी शरण में जाकर) पुकार (दोहाई) देता है।
दोहा
"सुरति सनेही है
चीनी चुने पपील
कोई, करै बिबेक विचार ।
ज्यों, चीनी रेत मंझार ॥"
अर्थ: सुरति स्नेही (सुरति से प्रेम करने वाला) चींटी की तरह होता है, जो रेत में से चीनी (चुन) लेती है। कोई विवेक-विचार करता है, जैसे चीनी को रेत से अलग करता है। (अर्थ: सुरति स्नेही सार (सतनाम) को असार (संसार) से अलग कर लेता है।)
सोरठा
"मूल मंत्र सब माहिं, बानी से उजियार भव ।
तहाँ धूप नहिं छाँह, निगम जो नेत पुकारही ॥"
अर्थ: मूल मंत्र सब में है, बानी (शब्द) से भव (संसार) उजियार (प्रकाशित) होता है। वहाँ (उस स्थान पर) धूप (ताप) नहीं, न छाँह (छाया) है – जिसे वेद “नेति-नेति” कहकर पुकारते हैं।
चौपाई 40
"यही जगत है जम को देसा । नाम भजै तब मिटै कलेसा ॥"
अर्थ: यह जगत (संसार) यमराज का देश है। नाम भजने से ही कलेश (दुःख) मिटता है।
🚪 दसवाँ द्वार – साधना का द्वार
"तारी दसवें द्वारे लागी । गुरु प्रताप से आतम जागी" – यह पंक्तियाँ योग साधना के सर्वोच्च बिंदु को दर्शाती हैं। दसवाँ द्वार (दशम द्वार) शरीर के नौ द्वारों (दो आँखें, दो नासिका, दो कान, मुख, गुदा, मूत्रद्वार) के परे का द्वार है, जो मस्तिष्क के सहस्रार चक्र में स्थित माना जाता है। यह वह द्वार है जिससे आत्मा शरीर से ऊपर उठती है और परमात्मा से मिलती है।
गुरु प्रताप से आत्म जागी
यह द्वार अपने आप नहीं खुलता। गुरु प्रताप (सतगुरु की कृपा) से ही आत्मा जागती है। बिना सतगुरु के यह द्वार बंद ही रहता है।
तन-मन की गति बिसरावै
जब सुरत दसवें द्वार पर लग जाती है, तो साधक शरीर और मन की सारी चेष्टाएँ भूल जाता है। वह न तो शरीर को जानता है, न मन को – केवल शब्द में लीन रहता है।
🌍 धरती तजि गगन चढ़ना – झिलमिल बिमल तमासा
"धरती तजि जब चढ़े अकासा । देखे झिलमिल बिमल तमासा" – यह आंतरिक यात्रा का वर्णन है। धरती यहाँ भौतिक शरीर और इसकी इंद्रियों का प्रतीक है। जब साधक की सुरत इस भौतिकता को छोड़कर आकाश (सहस्रार के परे का सूक्ष्म क्षेत्र) में चढ़ती है, तो उसे झिलमिलाता हुआ विमल (शुद्ध) तमाशा दिखाई देता है – अर्थात दिव्य ज्योति, नाद और अनुभवों का समूह।
धरती
भौतिक शरीर, इंद्रिय विषय, मोह-माया
चढ़ना
सुरत को ऊपर उठाना, ध्यान के द्वारा
गगन
सहस्रार, शून्य, अगम स्थान
"उर्थ रूप जाय निज अई। गगन के मध्य मगन होइ रहई" – साधक का सूक्ष्म रूप (ऊर्ध्व रूप) अपने सच्चे स्थान (निज अई) को प्राप्त होता है। वह गगन के मध्य में मगन (लीन) होकर रहता है। यही समाधि की स्थिति है।
🎵 सहज सुन्न के आगे – अनहद नाद का स्थान
"सहज सुन्न के आगे, तीन लोक के पार" – यह उस परम स्थान का वर्णन है जो तीनों लोकों (स्वर्ग, मृत्युलोक, पाताल) से परे है। सहज सुन्न का अर्थ है वह सहज शून्यता, जहाँ से सारी सृष्टि का विस्तार हुआ है। उससे भी आगे का स्थान है, जहाँ "निसान बजावही, सन्दन की भनकार" – अर्थात अनहद नाद (अनाहत ध्वनि) स्वतः बजती है, जैसे शंख की गूँज या दिव्य संगीत।
अगम संदेस सुनने का फल
"सुनै जो अगम संदेस, निगम थके गुन गाय के" – यह संदेश (अनहद नाद) इतना गूढ़ है कि वेद (निगम) उसका गुणगान करते-करते थक गए। जो इसे सुन लेता है, वह सब भ्रम और भेष (रूप-आवरण) नष्ट कर देता है, और निश्चय ही प्रमाण (सत्य) को प्राप्त होता है।
तीन लोक के पार
यह स्थान तीनों लोकों के पार है, इसलिए यमराज का यहाँ कोई अधिकार नहीं। जो यहाँ पहुँचता है, उसके लिए जन्म-मरण समाप्त हो जाता है।
🔊 "तहाँ धूप नहिं छाँह, निगम जो नेत पुकारही" – उस स्थान पर न धूप है (ताप, द्वंद्व) न छाँह (छाया, माया)। वेद उसे "नेति-नेति" (यह नहीं, वह नहीं) कहकर पुकारते हैं, क्योंकि वह सभी वर्णनों से परे है।
🔊 अच्छर – मूल मंत्र – अनहद बानी
"अच्छर है निज सार अरूपा । जा ते सब जग धरा सरूपा" – अच्छर (अविनाशी शब्द) वह मूल तत्व है जो निराकार (अरूप) है, और उसी से सारा जगत साकार (सरूप) धारण करता है। यह वही सत शब्द है, जो बीज से वृक्ष के समान सबका विस्तार है।
मूल मंत्र – सतगुरु की कुंजी
"मूल मंत्र यह सतगुरु बोला । कुंजी कुफल ते कुंडी खोला" – यह मूल मंत्र (सतनाम) ही वह कुंजी है, जो बंद द्वार (कुंडी) को खोल देता है। कुफल का अर्थ कुसुम (फूल) या कुफल (कठिनाई?) – यहाँ यह द्वार की कुंडी का ताला हो सकता है। सतगुरु के दिए इस मंत्र से ही दसवाँ द्वार खुलता है।
अनहद बानी का अनुभव
"मूल अहै जो सब में धरिया । अनहद बानी अनुभव कहिया" – वह मूल सबमें विद्यमान है, लेकिन उसे केवल अनहद बानी (अनाहत ध्वनि) के अनुभव से ही जाना जाता है। यह अनुभव सतगुरु की कृपा से ही संभव है।
🐜 सुरति स्नेही – चींटी की तरह सार ग्रहण
"सुरति सनेही है चीनी चुने पपील
कोई, करै बिबेक विचार । ज्यों, चीनी रेत मंझार"
यह दोहा अत्यंत सुंदर रूपक है। सुरति स्नेही (जो सुरति से प्रेम करता है, ध्यान का सच्चा साधक) चींटी के समान होता है। जैसे चींटी रेत (बालू) के ढेर में से चीनी के कण चुन लेती है, वैसे ही सुरति स्नेही साधक संसार रूपी रेत में से सतनाम रूपी चीनी (सार) को अलग कर लेता है।
चींटी
सुरति स्नेही साधक – लगनशील, एकाग्र, सार-ग्राही
चीनी
सतनाम – सार तत्व, मुक्तिदाता
"कोई करै बिबेक विचार" – विवेकी साधक ही इस विवेक-विचार को करता है, अर्थात असार (संसार) में से सार (सतनाम) को पहचानता है। यही सच्ची बुद्धि है।
💡 मूल मंत्र सब में – शब्द ही प्रकाश
"मूल मंत्र सब माहिं, बानी से उजियार भव" – यह सोरठा बताता है कि मूल मंत्र (सतनाम) सबके भीतर विद्यमान है, लेकिन वह बानी (शब्द) के माध्यम से प्रकट होता है। जैसे सूर्य सबमें है, पर प्रकाश तब दिखता है जब वह उदय होता है। बानी से उजियार भव – शब्द के माध्यम से ही संसार प्रकाशित होता है, अर्थात सत शब्द के अनुभव से ही सत्य का ज्ञान होता है।
🌞 "तहाँ धूप नहिं छाँह, निगम जो नेत पुकारही" – उस परम स्थान (जहाँ मूल मंत्र का पूर्ण अनुभव होता है) पर धूप (ताप, द्वंद्व) और छाँह (छाया, माया) दोनों नहीं है। यह अद्वैत की स्थिति है, जहाँ केवल एक ही सत्ता है। वेद उसे "नेति-नेति" (यह नहीं, वह नहीं) कहकर पुकारते हैं, क्योंकि वह सभी परिभाषाओं से परे है।
⚰️ यह जगत यम का देश – नाम ही उद्धार
"यही जगत है जम को देसा । नाम भजै तब मिटै कलेसा" – यह अंतिम पंक्ति संपूर्ण रचना का निष्कर्ष है। यह संसार (जगत) यमराज का देश है। यहाँ जन्म-मरण, दुःख-क्लेश, भय – सब यमराज के अधीन है। इस देश से पार जाने का एकमात्र उपाय है नाम भजन। जब जीव नाम भजता है (सतनाम का स्मरण, ध्यान, जाप करता है), तभी सारा कलेश (दुःख, कष्ट, संकट) मिट जाता है।
यह जगत
यमराज का देश – बंधन, भय, जन्म-मरण
नाम भजन
सतनाम का स्मरण, ध्यान, अनुसंधान – मुक्ति का एकमात्र मार्ग
📝 सारांश: अगम चढ़ना – साधना का परम लक्ष्य
इस संपूर्ण गुरुवाणी का सार निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
दशम द्वार और आत्म जागरण
सतगुरु की कृपा से दसवाँ द्वार खुलता है, आत्मा जागती है।
धरती से गगन तक
सुरत को शरीर से उठाकर आकाश (सहस्रार/शून्य) में समाना ही साधना है।
अनहद नाद – अगम संदेश
तीनों लोकों के पार अनहद बानी बजती है, जिसे सुनकर सब भ्रम मिट जाते हैं।
मूल मंत्र – कुंजी
सतगुरु का दिया मूल मंत्र ही वह कुंजी है, जो बंद कुंडी (दशम द्वार) खोलता है।
सुरति स्नेही – चींटी समान
सच्चा साधक संसार रूपी रेत में से सतनाम रूपी चीनी को चुन लेता है।
नाम भजन – कलेश नाश
यह जगत यमराज का देश है, नाम भजने से ही सारे दुःख मिटते हैं।
🙏 सतगुरु कृपा से दशम द्वार खुले,
सुरत गगन में समाए, अनहद सुने ।
नाम भजन से कलेश मिटे,
अगम चढ़कर तीन लोक पार हो जाए ॥
🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ
यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "अगम चढ़ना और दसवें द्वार का रहस्य – आध्यात्मिक साधना का शिखर (The Ascent to the Unfathomable and the Mystery of the Tenth Door – The Summit of Spiritual Practice)" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।
भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।
🔍 विशेष महत्त्व और लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।
🕒 साधना एवं गायन विधि
भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।
भजनों को गाने की सही विधि क्या है?
भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।
क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?
हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।
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