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Kabir Amritvani

संत वाणी: ओंकार से सृष्टि का विस्तार – नाम का महत्व और चौथी अवस्था (Sant Vani: The Expansion of Creation from Omkar – Importance of Naam and the Fourth State)

123 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

🧘 संत वाणी: ओंकार और सृष्टि का रहस्य

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

निराकार ते भया अकारा – या विधि भौसागर बिस्तारा

नाम एक सार जग माहीं, नाम बिहूना आवे जाही

🌟 ओंकार – ब्रह्म का प्रथम ध्वनि स्वरूप

प्रस्तुत है संत वाणी का एक महत्वपूर्ण अंश, जो ओंकार को सृष्टि के मूल कारण के रूप में स्थापित करता है। यह वाणी निराकार से साकार के विस्तार, तीन लोकों और चौथी अवस्था (तुरीय) के रहस्य, तथा नाम (सतनाम) की सार्वभौमिक महिमा का वर्णन करती है।

संत कहते हैं कि ओंकार को सारा जगत जानता है, पर उसका सच्चा स्वरूप केवल सतगुरु के मार्ग पर चलने वाला ही समझ पाता है। निराकार से साकार हुआ, और इसी प्रकार भवसागर (संसार) का विस्तार हुआ। तीन लोकों में सब रचा-बसा है, पर चौथा (तुरीय) वह पद है जिसे कोई विरला ही पाता है। नाम ही सार है – नाम के बिना जीव जन्म-मरण के चक्र में भटकता है। वेद-कतेव (शास्त्र) एक ओर हैं, और नाम की निहोरी (शरण) दूसरी ओर। सच्ची साधना वही है जो सतगुरु के सत पंथ पर चलकर नाम को धारण करे।

📖 संत वाणी: मूल पाठ एवं सरल अर्थ

“ओंकार को सब जग जानी । ता ते पंडित बेद बखानी ॥
निराकार ते भया अकारा । या विधि भौसागर बिस्तारा ॥”

सरल अर्थ: ओंकार को सारा जगत जानता है। उसी से पंडित लोग वेदों की व्याख्या करते हैं। निराकार (निर्गुण ब्रह्म) से साकार (सगुण स्वरूप) उत्पन्न हुआ, और इसी विधि से भवसागर (संसार-समुद्र) का विस्तार हुआ।

“सू म से जो भया अस्थूला । हिलमिल बिलसे ता को मूला ॥
सुद्दम कार जाहि निरमाया । आपहि सब का मूल कहाया ॥”

सरल अर्थ: सूक्ष्म (सू) से स्थूल (अस्थूल) बना। उसके हिलने-मिलने (संयोग) से वह मूल (आधार) रूप में विलसता (प्रकट) हुआ। सुद्दम कार (शुद्ध ब्रह्म) जो माया से रहित (निर्माया) है, वही सबका मूल कहलाता है।

“ता म निःतत का बासा । विमल सरूप सदा परकासा ॥
तीन लोक में रहा समोई । चौथे को जब पावे कोई ॥
पाँच तत्त गुन तीन जो राचा । देह लागि सुर नर मुनि नाचा ॥”

सरल अर्थ: उस (ब्रह्म) में निःतत (नित्य) का वास है। वह विमल (निर्मल) स्वरूप है, सदा प्रकाशमान है। तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) में वह समाया हुआ है। जब कोई चौथे (तुरीय) पद को प्राप्त करता है, तब सच्चा ज्ञान होता है। पाँच तत्त्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और तीन गुण (सत्व, रज, तम) – इनसे यह देह रची गई है, और इस देह के कारण देवता (सुर), मनुष्य (नर) और मुनि (ऋषि) सब नाचते (भ्रमित) हैं।

“तिरविधि ताप को काटही, चौथे आप कहाय ।
सत्त सब्द जाने बिना, सब जग रहा भुलाय ॥”

सरल अर्थ: (जो साधक) तीनों प्रकार के ताप (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) को काट देता है, वह चौथे (तुरीय) पद को प्राप्त होता है। सत् शब्द (सत्य शब्द/सतनाम) को जाने बिना सारा जगत भूला हुआ (भ्रमित) है।

“मूल बाँडि गह डार, सुर नर मुनि जो रहे सब ।
भूल रहा संसार, तिरविधि रूप परखंड में ॥”

सरल अर्थ: मूल (ब्रह्म) को बाँटकर (विभाजित कर) सुर, नर और मुनि सब स्थित हैं। यह संसार तीनों प्रकार के रूप (तिरविधि) के परखंड (आडंबर) में भूला हुआ है।

“विलें नाम कोई कोइ यावे । जेहि ते आवागवन नसावै ॥
ममता ते जग को विस्तारा । नाम गहे सो उतरे पारा ।
काहे पंडित विद्या पढ़ाई । सतगुरु के सत पंथ न चलई ॥
वेद कतेव धेरे इक ओरा । तन मन अपें नाम निहोरा ॥
पटतर नाम न जग कछु अहई । ब्रिजी जीव जो नाम छ देई ॥
नाम विना जिव परले होई । सुर नर मुनि सब गये बिगोई ॥
नाम एक सार जग माहीं । नाम बिहूना आवे जाही ॥”

सरल अर्थ: विरला कोई (विलें) नाम को पाता है, जिससे आवागमन (जन्म-मरण) नष्ट हो जाता है। ममता (आसक्ति) से इस जगत का विस्तार हुआ है; नाम को ग्रहण करने वाला ही पार उतरता है। पंडित लोग विद्या पढ़कर क्यों व्यर्थ घमंड करते हैं, जब वे सतगुरु के सत पंथ (सच्चे मार्ग) पर नहीं चलते? वेद-कतेव (शास्त्र) एक ओर हैं, और अपने तन-मन को नाम की निहोरी (शरण) में लगाना दूसरी ओर। पटतर (व्यापार, साधन) में नाम के समान कोई दूसरा (जगत में) नहीं है। जीव को जो नाम देता है, वही ब्रिजी (बृजी – सही मार्ग पर चलने वाला) है। नाम के बिना जीव परलोक में भटकता है; देवता, मनुष्य और मुनि सब नष्ट हो गए (नाम के अभाव में)। नाम ही एक सार (सत्य) है इस जगत में; नाम के बिना जीव आता-जाता (जन्म-मरण) रहता है।

“नाम भजै धन धाम तजि, नर नारी सब कोय ।
अवचल महिमा जेहि बसै, तो अवचल देही होय ॥”

सरल अर्थ: नाम का भजन करने वाला धन-धाम (सांसारिक सुख) का त्याग कर देता है, चाहे वह नर हो या नारी। जिसमें अवचल (अटल, शाश्वत) महिमा बस जाती है, वह अवचल देही (अमर आत्मा) हो जाता है।

“सतनाम विस्वास, करम भरम जग परिहरै ॥
सतगुरु पुरखे आस, जो नर आस ऐसी करें ॥”

सरल अर्थ: सतनाम में विश्वास रखने वाला, कर्म और भ्रम (संसारिक बंधन) को त्याग देता है। जो मनुष्य सतगुरु पुरख (सतगुरु परमात्मा) पर ऐसी आस (आशा, भरोसा) करता है, वह सफल होता है।

🕉️ वाणी का आध्यात्मिक विश्लेषण

1. ओंकार – सृष्टि का बीज

ओंकार को वेदों का सार और ब्रह्म का प्रथम ध्वनि स्वरूप माना गया है। यहाँ संत कहते हैं कि सब जगत ओंकार को जानता है, पर केवल जानना ही पर्याप्त नहीं; उसके रहस्य को सतगुरु के मार्ग पर चलकर ही समझा जा सकता है। निराकार (निर्गुण) से साकार (सगुण) का विस्तार हुआ और यही भवसागर का आधार है।

2. सूक्ष्म से स्थूल – सृष्टि का क्रम

“सू म से जो भया अस्थूला” – सूक्ष्म (अव्यक्त) से स्थूल (व्यक्त) की उत्पत्ति हुई। यह सांख्य दर्शन के सिद्धांत से मेल खाता है। “सुद्दम कार” (शुद्ध ब्रह्म) ही मूल है, जो माया से रहित है।


3. तीन लोक और चौथा पद

तीन लोक – स्वर्ग, मृत्यु, पाताल – में सब रचा-बसा है, पर यह सब भ्रम है। “चौथे को जब पावे कोई” – चौथा पद तुरीय अवस्था है, जो तीनों गुणों और अवस्थाओं (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति) से परे है। यही आत्म-साक्षात्कार की स्थिति है।

4. त्रिविधि ताप और सत् शब्द

तीन प्रकार के ताप (आधिदैविक – दैवी यातनाएँ, आधिभौतिक – भौतिक कष्ट, आध्यात्मिक – मानसिक/आत्मिक संताप) से मुक्ति केवल सत् शब्द (सतनाम) के ज्ञान से होती है। बिना इस ज्ञान के सारा जगत भुलावे में है।


5. नाम की सार्वभौमिक महिमा

इस वाणी में नाम को सबसे श्रेष्ठ साधन बताया गया है। “नाम एक सार जग माहीं” – संसार में केवल नाम ही सार है। नाम ही आवागमन (जन्म-मरण) को नष्ट करता है। वेद-शास्त्र (वेद कतेव) एक ओर हैं, पर नाम की शरण (निहोरी) दूसरी ओर। पंडितों की विद्या व्यर्थ है यदि वे सतगुरु के सत पंथ पर न चलें।

🧘 साधना पथ: नाम ही सार, सतगुरु ही आस

यह वाणी साधक को स्पष्ट रूप से बताती है कि नाम (सतनाम) ही वह साधन है जो जन्म-मरण के चक्र को तोड़ता है और चौथी अवस्था (तुरीय) को प्राप्त कराता है। इसके लिए सतगुरु के सत पंथ पर चलना और सतनाम में विश्वास रखना आवश्यक है।

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नाम भजन

“नाम भजै धन धाम तजि” – नाम का स्मरण सभी सांसारिक आसक्तियों का त्याग कराता है। नाम ही वह जहाज है जो भवसागर पार लगाता है।

🙏

सतगुरु का पंथ

“सतगुरु के सत पंथ न चलई” – केवल विद्या पढ़ने से कुछ नहीं होता। सतगुरु के बताए सच्चे मार्ग पर चलना ही सार्थक है।

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तुरीय की प्राप्ति

तीनों लोकों और तीनों अवस्थाओं से परे चौथा पद (तुरीय) ही परम लक्ष्य है। यह नाम के अभ्यास से, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।

📌 अभ्यास सुझाव: सतगुरु से सतनाम ग्रहण करें। उस नाम का निरंतर जाप करें – मानसिक रूप से, कण्ठ से, या हृदय से। धीरे-धीरे ममता और आसक्तियाँ कम होंगी। जब नाम में स्थिरता आएगी, तब “चौथे” पद (तुरीय) का अनुभव होने लगेगा। वेद-शास्त्रों के पठन-पाठन में ही न उलझें, बल्कि सतगुरु के बताए सत पंथ पर चलें। याद रखें, “नाम बिहूना आवे जाही” – नाम के बिना जीव बार-बार आता-जाता है।

🌹 अन्य संतों की वाणी में ओंकार और नाम की महिमा

“ओंकार ब्रह्म सरूप है, ओंकार ही राम।
ओंकार ही गोविंद है, ओंकार ही नाम।।”

– संत कबीर

“जागत स्वप्न सुषुप्ति तीनों, चौथा तुरीय नाम।
नानक नाम अधार है, नामे ही विश्राम।।”

– गुरु नानक

“नाम रटत जग तरि गया, नाम बिहूना मरि मरि जाय।
सतगुरु मिले तो नाम मिले, फिर जनम न आवै धाय।।”

– संत तुलसीदास

❓ वाणी से जुड़े सामान्य प्रश्न

प्रश्न 1: “चौथा” पद क्या है? (चौथे को जब पावे कोई)

उत्तर: “चौथा” पद तुरीय अवस्था है। वेदांत में चार अवस्थाएँ बताई गई हैं – जागृत (जाग्रत), स्वप्न, सुषुप्ति (गहन निद्रा), और तुरीय (चौथी)। तुरीय वह अवस्था है जहाँ आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होती है, तीनों गुणों और अवस्थाओं से परे। यही मोक्ष या आत्म-साक्षात्कार की स्थिति है।

प्रश्न 2: “तिरविधि ताप” किन्हें कहते हैं?

उत्तर: तिरविधि (तीन प्रकार) ताप हैं – आधिदैविक (देवताओं/प्रकृति से उत्पन्न कष्ट – बाढ़, भूकंप, आदि), आधिभौतिक (जीवों/पदार्थों से उत्पन्न कष्ट – चोर, शत्रु, रोग), और आध्यात्मिक (मन, प्राण, आत्मा से उत्पन्न कष्ट – अज्ञान, अहंकार, वासनाएँ)। इन तीनों से मुक्ति का उपाय सत् शब्द (सतनाम) है।

प्रश्न 3: “वेद कतेव धेरे इक ओरा” – क्या वेद-शास्त्र व्यर्थ हैं?

उत्तर: संत का आशय यह नहीं कि वेद-शास्त्रों का कोई महत्व नहीं, बल्कि यह है कि केवल उनके पठन-पाठन से मोक्ष नहीं होता। वे साधन हैं, साध्य नहीं। “नाम” ही साध्य है। वेद-शास्त्र भी नाम की महिमा का गान करते हैं, पर यदि उन्हें पढ़कर भी सतगुरु के सत पंथ पर न चला जाए, तो वे केवल बोझ हैं।

प्रश्न 4: “नाम बिहूना आवे जाही” का क्या अर्थ है?

उत्तर: नाम के बिना जीव बार-बार जन्म-मरण के चक्र (आवागमन) में फँसा रहता है। वह इस लोक से उस लोक, एक योनि से दूसरी योनि में भटकता रहता है। नाम ही वह साधन है जो इस चक्र को समाप्त करता है और जीव को सतलोक (परम धाम) में स्थापित करता है।

प्रश्न 5: “अवचल देही” किसे कहते हैं?

उत्तर: “अवचल” = अचल, स्थिर, नाशरहित; “देही” = शरीरधारी, आत्मा। अवचल देही वह आत्मा है जो नाशवान शरीर के बंधन से मुक्त होकर अपने शाश्वत स्वरूप में स्थित हो जाती है। नाम का भजन करने वाला इस अवस्था को प्राप्त करता है।

📝 नाम ही सार – भवसागर पार करने का एकमात्र साधन

यह संत वाणी हमें सृष्टि के मूल कारण – ओंकार – से लेकर नाम की सार्वभौमिक महिमा तक का विस्तृत ज्ञान देती है। संत कहते हैं कि निराकार से साकार हुआ, तीन लोक रचे गए, पर यह सब भ्रम है। सच्चा लक्ष्य चौथी अवस्था (तुरीय) को प्राप्त करना है, जो केवल सत् शब्द (सतनाम) के ज्ञान से संभव है।

वेद-शास्त्र (वेद कतेव) पढ़ने वाले पंडित भी इस रहस्य से वंचित रह जाते हैं, क्योंकि वे सतगुरु के सत पंथ पर नहीं चलते। सच्ची साधना वही है जो नाम को धारण करे, ममता का त्याग करे, और सतगुरु की शरण में रहे। नाम ही वह जहाज है जो भवसागर पार कराता है, नाम ही वह सार है जो आवागमन को नष्ट करता है।

इसलिए साधक को चाहिए कि वह सतनाम में विश्वास रखे, सतगुरु पर आस लगाए, और नाम भजन में लीन हो जाए। तब वह “अवचल देही” बनकर सतलोक को प्राप्त होगा, जहाँ न जरा, न मरण, न शोक, न ताप।

🙏 ॐ नमो भगवते सतनाम्ने || सतगुरु सतपंथाय नमः || तुरीय पद प्रदायकाय नमः ||

🧘 नाम एक सार जग माहीं
नाम बिहूना आवे जाही

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "संत वाणी: ओंकार से सृष्टि का विस्तार – नाम का महत्व और चौथी अवस्था (Sant Vani: The Expansion of Creation from Omkar – Importance of Naam and the Fourth State)" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 06 Sep 2026

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