hari bhajan बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

जब मैं था तब हरी नहीं अब हरी है मैं नाही सब अँधियारा मिट गया दोहे का अर्थ(Jab Mai Tab Hari Nahi Ab Hari Hai Mai Nahi Sab Dohe Ka Arth in Hindi)

इस भजन में ईश्वर के अनुभव, भक्ति और अज्ञान के अंधकार को मिटाने का सार छिपा है।

प्रस्तावना एवं परिचय

भक्ति का प्रकाश: हरी की अनुभूति

इस भजन के माध्यम से हरी की उपासना करें और अपने जीवन से अंधकार को मिटाएं।

जब मैं था तब हरी नहीं अब हरी है मैं नाही सब अँधियारा मिट गया
साझा करें:

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भक्ति गीत में कवि अपने जीवन के आध्यात्मिक विकास की गूढ़ता को प्रकट करते हैं। 'जब मैं था तब हरी नहीं' का आशय है कि जब तक मनुष्य अपने अंतर्मन में ईश्वर की सत्ता का अनुभव नहीं करता, तब तक वह भटकता रहता है। यह जीवन के भ्रम और अज्ञानता का प्रतीक है, जिसमें इंसान बाहरी संसार के पदार्थों में उलझा रहता है। दूसरी पंक्ति 'अब हरी है मैं नाही' की ओर संकेत करती है कि जब व्यक्ति ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति और प्रेम का अनुभव करता है, तब उसे यह एहसास होता है कि सच्चा सुख केवल ईश्वर में है। दरअसल, यह भक्ति का एक अद्भुत अनुभव है, जिसमें भक्त अपने 'अहं' को खोकर हरी में विलय हो जाता है। इस गीत का तात्पर्य यह है कि जब हम अपने आत्मा को भक्ति में समर्पित करते हैं, तो अंधकार मिट जाता है और प्रकाश की प्राप्ति होती है।

इस भजन का भावार्थ गहराई में जाकर मानवता की पहचान और उसके आध्यात्मिक यात्रा को संजोता है। जब कवि कहते हैं, 'अब हरी है मैं नाही', तो वे यह अभिव्यक्त करते हैं कि व्यक्ति को अपने अहं, स्वार्थ और सीमाओं को छोड़कर अनंत हरी में खोना चाहिए। यह इस जीवन के दुःख-दर्द से उबरने का मार्ग प्रदर्शित करता है। भक्त की आँखों में जब ईश्वर का दीदार होता है, तब इस जगत के सभी दुखों का अंत हो जाता है। यह एक गहरा अहसास है कि जब आत्मा ईश्वर के साथ एकत्व का अनुभव करती है, तब मन के सारे अंधेरे मिट जाते हैं। भक्त को इस भक्ति मार्ग पर चलने का विज्ञान-विज्ञान का अनुभव मिलता है।

इस भक्ति काव्य में उपासना का एक मूलाधार विद्यमान है। यह दर्शाता है कि भक्ति मार्ग पर चलना एक कठिन लेकिन आवश्यक यात्रा है। मनुष्य को अपने 'मैं' को मिटाकर अपने आत्मिक स्वरूप, जो कि ईश्वर का अंश है, उसे पहचानना होगा। यह भक्ति की सच्चाई को उजागर करता है कि हमारी आत्मा का संबंध सीधे ईश्वर से है और यह हमारे भीतर की महानता को दर्शाता है। जब हम ईश्वर में लीन होते हैं, तब सच्चे ज्ञान का प्रकाश हमारे चारों ओर फैला होता है। भक्ति के इस मार्ग पर चलकर, हम ना केवल आत्मा के परम ज्ञान की प्राप्ति करते हैं, बल्कि यह तथ्य भी समझते हैं कि ईश्वर हमारे चारों ओर है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

यह भजन भक्ति और तात्त्विक रूप से मनुष्य के आत्मिक ज्ञान की यात्रा को दर्शाता है। यह शास्त्रीय संदर्भों से भी जुड़ता है, जैसे गीता में, जो कहती है कि आत्मा अमर है और सभी जीवों में व्याप्त है। 'हरि' का अर्थ ईश्वर या ब्रह्म का सर्वोच्च अस्तित्व है। उपनिषदों में इस सत्य को बड़ी सुंदरता से व्याख्या किया गया है कि 'तत्त्वमसि', यानी वह जो है, वही आप भी हैं। यह भजन मनुष्य को आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर करता है और योग, साधना और ध्यान का मार्ग दिखाता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का जाप करने से भक्त के मानसिक तनाव में कमी आती है और आंतरिक शांति की प्राप्ति होती है। यह भक्ति भाव का अनुभव कराता है, जो भक्त की प्रतिभा को बढ़ाता है और उसे ईश्वर की निकटता के अनुभव को कराता है। इसी तरह, यह सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे भौतिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का जाप सुबह सूर्योदय के समय या संध्या समय में किया जा सकता है। भक्त को आरामदायक और साफ स्थान पर बैठकर ध्यान करना चाहिए। पूजा में स्वच्छता का ध्यान रखें और एक दीये को जलाएं। निश्चिंत मन के साथ भाव से भजन का जाप करें, जिससे मन की सारी समस्याएं दूर हो सकें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि जब हम अपने अहं को ईश्वर में समर्पित कर देते हैं, तब अंधकार मिट जाता है और सच्चा प्रकाश प्रकट होता है।

जब मैं था तब हरी नहीं का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि जब तक मनुष्य ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव नहीं करता, तब तक वह जीवन में भटकता रहता है। यह आत्मा के अज्ञान का प्रतीक है।

इस भजन के किस भाग पर ध्यान देना चाहिए?

भजन के उन अंशों पर ध्यान देना चाहिए जो अहंकार के त्याग और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का संदेश देते हैं। यह ध्यान साधना में सहायक होते हैं।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!