अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
तं दृष्ट्वा राजशार्दूलो मुनिं परमधार्मिकम्। पूजयामास धर्मज्ञः सर्वभूतहिते रतः॥
हिंदी अनुवाद
उस परमधार्मिक मुनि को देखकर राजशार्दूल (सिंह के समान पराक्रमी राजा) ने, जो धर्मज्ञ और सर्वभूतहित में रत थे, उनकी पूजा की।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक राजा के मुनि के प्रति श्रद्धा और सम्मान को दर्शाता है।
टिप्पणी
राजा के लिए "राजशार्दूलः" (सिंहतुल्य राजा) और "धर्मज्ञः" विशेषणों का प्रयोग उनके पराक्रम और धर्मनिष्ठा को दर्शाता है। "सर्वभूतहिते रतः" यह सिद्ध करता है कि राजा सभी प्राणियों के कल्याण में लीन थे।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक ४३ ॥
पूजयामास धर्मज्ञः सर्वभूतहिते रतः॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : उस परमधार्मिक मुनि को देखकर राजशार्दूल (सिंह के समान पराक्रमी राजा) ने, जो धर्मज्ञ और सर्वभूतहित में रत थे, उनकी पूजा की।
🔹 English Translation : Seeing that supremely righteous sage, the tiger among kings (the king), who was knower of dharma and devoted to the welfare of all beings, worshipped him.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| तम् | सर्वनाम, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | उस (मुनि) |
| दृष्ट्वा | क्रिया, ल्यबन्त अव्यय (दृश् धातु) | देखकर |
| राजशार्दूलः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | सिंह के समान पराक्रमी राजा |
| मुनिम् | पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | मुनि को |
| परमधार्मिकम् | विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | परम धार्मिक |
| पूजयामास | क्रिया, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (पूज् धातु, णिच्) | पूजा की |
| धर्मज्ञः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | धर्म का ज्ञाता |
| सर्वभूतहिते | नपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचन (सर्वभूत + हित) | समस्त प्राणियों के हित में |
| रतः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (रम् धातु) | लीन, आसक्त |
यह श्लोक राजा के चरित्र की महानता को उजागर करता है। वे केवल शक्तिशाली ही नहीं, बल्कि धर्मज्ञ और परोपकारी भी थे। मुनि के दर्शन मात्र से वे उनकी पूजा करते हैं, यह उनकी विनम्रता और ऋषियों के प्रति श्रद्धा को दर्शाता है। "पूजयामास" णिजन्त रूप से पूजा की सक्रियता और सम्पूर्णता व्यक्त होती है।