अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

स शरं धनुषा गृह्य मृगान् हन्तुं चकार ह। तेन शब्देन वित्रस्ता गावश्च मृगपक्षिणः॥

हिंदी अनुवाद

उसने (राजा ने) धनुष से बाण लेकर मृगों को मारना आरंभ किया। उस शब्द से गायें, मृग और पक्षी भयभीत हो गए।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक राजा के आखेट (शिकार) के वर्णन को दर्शाता है, जिसमें उनके बाण की टंकार से समस्त प्राणी भयभीत हो जाते हैं।

टिप्पणी

यह श्लोक राजा दशरथ की शिकार प्रियता को दर्शाता है। प्राचीन काल में क्षत्रियों के लिए शिकार खेलना मनोरंजन और कौशल का विषय था। यहाँ "वित्रस्ताः" शब्द से प्राणियों के भय का सजीव चित्रण हुआ है।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक ४१ ॥

स शरं धनुषा गृह्य मृगान् हन्तुं चकार ह।
तेन शब्देन वित्रस्ता गावश्च मृगपक्षिणः॥
sa śaraṃ dhanuṣā gṛhya mṛgān hantuṃ cakāra ha |
tena śabdena vitrastā gāvaśca mṛgapakṣiṇaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उसने (राजा ने) धनुष से बाण लेकर मृगों को मारना आरंभ किया। उस शब्द से गायें, मृग और पक्षी भयभीत हो गए।

🔹 English Translation : He, taking an arrow with his bow, started to kill the deer. By that sound, the cows, deer, and birds were terrified.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
सःसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनउसने (राजा ने)
शरम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनबाण
धनुषानपुंसकलिंग, तृतीया एकवचनधनुष से
गृह्यक्रिया, ल्यबन्त अव्यय (ग्रह् धातु)लेकर
मृगान्पुल्लिंग, द्वितीया बहुवचनमृगों को
हन्तुम्क्रिया, तुमुन्नन्त अव्यय (हन् धातु)मारने के लिए
चकार हक्रिया, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (कृ धातु) + ह (पादपूरण)किया
तेनसर्वनाम, पुल्लिंग, तृतीया एकवचनउस
शब्देनपुल्लिंग, तृतीया एकवचनशब्द से
वित्रस्ताःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (वि + त्रस्)भयभीत
गावःस्त्रीलिंग, प्रथमा बहुवचनगायें
अव्ययऔर
मृगपक्षिणःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (मृग + पक्षिन्)मृग और पक्षी

📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक राजा दशरथ के शिकारप्रिय स्वभाव का वर्णन करता है। प्राचीन भारतीय राजाओं के लिए शिकार केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि युद्ध कौशल का अभ्यास भी था। राजा दशरथ अपने धनुष विद्या में अत्यंत निपुण थे, जिसका प्रमाण उनका नाम "दशरथ" (दिशाओं तक उनका रथ जाने वाला) और उनके बाण की टंकार है। यहाँ उनके बाण की टंकार से उत्पन्न शब्द से गाय, मृग और पक्षी भयभीत हो जाते हैं।

गायों का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि गाय को हिंदू धर्म में माता का स्थान दिया गया है। उनका भयभीत होना यह दर्शाता है कि राजा का शिकार इतना प्रचंड था कि उससे घरेलू पशु भी सुरक्षित नहीं थे। यह राजा की शक्ति और उनके आखेट के प्रभाव को दर्शाता है।

📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण

यह श्लोक अनुष्टुप् छंद में है। प्रथम पाद "स शरं धनुषा गृह्य मृगान् हन्तुं चकार ह" में ८ अक्षर हैं। यहाँ "गृह्य" ल्यबन्त प्रत्यय का प्रयोग पूर्वक्रिया को दर्शाता है। "चकार ह" में "ह" निपात केवल पादपूर्ति के लिए है, जिससे छंद की मात्रा पूरी होती है। द्वितीय पाद "तेन शब्देन वित्रस्ता गावश्च मृगपक्षिणः" में भी ८ अक्षर हैं। "वित्रस्ताः" में "वि" उपसर्ग भय की तीव्रता को बढ़ाता है।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक हमें बताता है कि बल और पराक्रम का प्रदर्शन दूसरों में भय उत्पन्न कर सकता है। राजा दशरथ का शिकार उनके वीरत्व का प्रतीक है, परंतु साथ ही यह संकेत भी देता है कि निर्बल प्राणी बलशाली के भय से ग्रस्त रहते हैं। आगे चलकर यही शिकार उनके जीवन में श्रवण कुमार की घटना का कारण बनता है, जो राजा के लिए शाप और पीड़ा का कारण बनता है। यह हमें सिखाता है कि बल का दुरुपयोग या लापरवाही से किया गया कर्म दुखद परिणाम ला सकता है।

॥ स शरं धनुषा गृह्य – राजा का आखेट और प्राणियों का भय ॥

जय श्री राम 🙏