अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
सुमन्त्र शृणु मद्वाक्यं प्रियं त्वं हितकारकम्। पुत्रार्थं यतते राजा न च पुत्रमवाप्नुयात्॥
हिंदी अनुवाद
हे सुमन्त्र! तुम मेरे प्रिय एवं हितकारक वाक्य को सुनो। राजा पुत्र के लिए यत्न कर रहा है, फिर भी पुत्र को प्राप्त नहीं कर पा रहा है।
अर्थ / व्याख्या
राजा अपनी व्यथा सुमंत्र से साझा करते हैं।
टिप्पणी
यहाँ राजा ने सुमंत्र को 'प्रिय' और 'हितकारक' कहकर संबोधित किया है, जो उनके घनिष्ठ संबंध को दर्शाता है। 'यतते' और 'अवाप्नुयात्' क्रियाएँ प्रयास और अप्राप्ति की स्थिति को स्पष्ट करती हैं।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक ३९ ॥
पुत्रार्थं यतते राजा न च पुत्रमवाप्नुयात्॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : हे सुमन्त्र! तुम मेरे प्रिय एवं हितकारक वाक्य को सुनो। राजा पुत्र के लिए यत्न कर रहा है, फिर भी पुत्र को प्राप्त नहीं कर पा रहा है।
🔹 English Translation : O Sumantra, listen to my words which are dear and beneficial. The king is striving for a son, yet does not obtain a son.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| सुमन्त्र | सम्बोधन, पुल्लिंग एकवचन | हे सुमन्त्र |
| शृणु | क्रिया, लोट्लकार, मध्यमपुरुष एकवचन (श्रु धातु) | सुनो |
| मद्वाक्यम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन (मद् + वाक्य) | मेरा वचन |
| प्रियम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | प्रिय |
| त्वम् | मध्यमपुरुष एकवचन | तुम |
| हितकारकम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | हित करने वाला |
| पुत्रार्थम् | अव्यय (पुत्र + अर्थम्) | पुत्र के लिए |
| यतते | क्रिया, लट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (यत् धातु, आत्मनेपद) | प्रयत्न करता है |
| राजा | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | राजा |
| न | अव्यय | नहीं |
| च | अव्यय | और |
| पुत्रम् | पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | पुत्र को |
| अवाप्नुयात् | क्रिया, विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (अव + आप्) | प्राप्त कर पाता है, प्राप्त करे |
यह श्लोक राजा के हृदय की पीड़ा को प्रकट करता है। वे सुमंत्र से कहते हैं कि मैं पुत्र के लिए सब कुछ कर रहा हूँ, फिर भी सफलता नहीं मिल रही। यह उनकी निराशा और सहायता की आवश्यकता को दर्शाता है।