अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
स चिन्तयित्वा धर्मात्मा सुमन्त्रं मन्त्रिसत्तमम्। आहूय प्राह धर्मज्ञो वाक्यं वाक्यविशारदः॥
हिंदी अनुवाद
चिंतन करके उस धर्मात्मा, धर्मज्ञ एवं वाक्यविशारद राजा ने मंत्रियों में श्रेष्ठ सुमंत्र को बुलाकर वचन कहा।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक राजा द्वारा मंत्री सुमंत्र को बुलाने और परामर्श करने का प्रसंग है।
टिप्पणी
राजा के लिए धर्मात्मा, धर्मज्ञ, वाक्यविशारद विशेषण उनकी योग्यता को दर्शाते हैं। वे स्वयं ज्ञानी होते हुए भी मंत्री की सलाह लेते हैं, जो एक कुशल शासक का लक्षण है।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक ३८ ॥
आहूय प्राह धर्मज्ञो वाक्यं वाक्यविशारदः॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : चिंतन करके उस धर्मात्मा, धर्मज्ञ एवं वाक्यविशारद राजा ने मंत्रियों में श्रेष्ठ सुमंत्र को बुलाकर वचन कहा।
🔹 English Translation : Having reflected, that righteous king, knower of dharma and skilled in speech, summoned Sumantra, the best of ministers, and spoke this word.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| सः | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | उसने (राजा ने) |
| चिन्तयित्वा | क्रिया, ल्यबन्त अव्यय (चिन्त् धातु) | चिंतन करके |
| धर्मात्मा | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | धर्मात्मा |
| सुमन्त्रम् | पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | सुमंत्र को |
| मन्त्रिसत्तमम् | विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | मंत्रियों में श्रेष्ठ |
| आहूय | क्रिया, ल्यबन्त अव्यय (आ + ह्वे) | बुलाकर |
| प्राह | क्रिया, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (प्र + ब्रू) | कहा |
| धर्मज्ञः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | धर्म का ज्ञाता |
| वाक्यम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | वचन |
| वाक्यविशारदः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वाक्य में कुशल |
इस श्लोक में राजा के गुणों का बखान है। वे धर्मात्मा हैं, धर्मज्ञ हैं, और वाक्यविशारद हैं। इतने गुणी होते हुए भी वे मंत्री सुमंत्र को बुलाकर परामर्श लेते हैं। यह राजा की विनम्रता और कुशल प्रशासन का परिचायक है।