अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

स कदाचिन्महातेजा नरेन्द्रो रघुनन्दनः। चिन्तयामास पुत्रार्थे न च लेभे सुतं प्रियम्॥

हिंदी अनुवाद

वह महातेजस्वी नरेन्द्र रघुनंदन (दशरथ) कभी पुत्र के लिए चिंतित हुए, क्योंकि उन्हें प्रिय पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई थी।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक राजा की पुत्रहीनता से उत्पन्न चिंता को व्यक्त करता है।

टिप्पणी

यहाँ 'महातेजाः' और 'रघुनन्दनः' विशेषण राजा की महानता और वंश की प्रतिष्ठा को दर्शाते हैं, जिसके बावजूद उन्हें पुत्र सुख नहीं मिला। 'चिन्तयामास' परस्मैपद प्रयोग से चिंता की तीव्रता व्यक्त होती है।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक ३७ ॥

स कदाचिन्महातेजा नरेन्द्रो रघुनन्दनः।
चिन्तयामास पुत्रार्थे न च लेभे सुतं प्रियम्॥
sa kadācin mahātejā narendraḥ raghunandanaḥ | cintayāmāsa putrārthe na ca lebhe sutaṃ priyam ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : वह महातेजस्वी नरेन्द्र रघुनंदन (दशरथ) कभी पुत्र के लिए चिंतित हुए, क्योंकि उन्हें प्रिय पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई थी।

🔹 English Translation : That greatly radiant lord of men, the delight of the Raghu dynasty, once became anxious for a son, as he had not obtained a dear son.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
सःसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनवह
कदाचित्अव्ययकभी
महातेजाःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनमहान तेजस्वी
नरेन्द्रःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनराजा
रघुनन्दनःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनरघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाला
चिन्तयामासक्रिया, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (चिन्त् धातु, परस्मैपद)चिंता की
पुत्रार्थेअव्ययीभाव? (पुत्र + अर्थे) = पुत्र के लिएपुत्र के लिए
अव्ययनहीं
अव्ययऔर
लेभेक्रिया, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (लभ् धातु, आत्मनेपद)प्राप्त किया
सुतम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनपुत्र
प्रियम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनप्रिय

यह श्लोक राजा की व्यथा को प्रकट करता है। इतने गुणों से युक्त राजा को भी पुत्र न होना उनके लिए बहुत बड़ी पीड़ा थी। यही पीड़ा आगे चलकर यज्ञ और पुत्र प्राप्ति का कारण बनती है। 'प्रियम्' विशेषण से पुत्र के प्रति उनके स्नेह का पता चलता है।