अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

इत्युक्त्वा ते द्विजा राज्ञं जग्मुः सर्वे यथागतम्। राजापि प्रीतमनसा निवासाय मनो दधे॥

हिंदी अनुवाद

ऐसा कहकर वे सभी ब्राह्मण राजा से यथागत (जिधर से आए थे) चले गए। राजा भी प्रसन्न मन से निवास (महल) में प्रवेश के लिए तैयार हुए।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक यज्ञ समाप्ति के बाद ऋत्विजों के प्रस्थान और राजा की प्रसन्नता का वर्णन करता है।

टिप्पणी

यज्ञ के बाद ऋत्विजों का अपने-अपने स्थानों पर लौटना स्वाभाविक है। 'यथागतम्' का अर्थ है जिस रास्ते से वे आए थे, उसी रास्ते से वापस गए। राजा का 'प्रीतमनसा' होना उनकी आंतरिक संतुष्टि और आश्वस्ति को दर्शाता है कि उनकी कामना पूरी होगी।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक ३५ ॥

इत्युक्त्वा ते द्विजा राज्ञं जग्मुः सर्वे यथागतम्।
राजापि प्रीतमनसा निवासाय मनो दधे॥
ityuktvā te dvijā rājñaṃ jagmuḥ sarve yathāgatam | rājāpi prītamanasā nivāsāya mano dadhe ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : ऐसा कहकर वे सभी ब्राह्मण राजा से यथागत (जिधर से आए थे) चले गए। राजा भी प्रसन्न मन से निवास (महल) में प्रवेश के लिए तैयार हुए।

🔹 English Translation : Having said thus, all those Brahmins departed from the king as they had come. The king also, with a pleased mind, turned his attention to residence.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
इतिअव्ययऐसा
उक्त्वाक्रिया, ल्यबन्त अव्यय (वच् धातु)कहकर
तेसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनवे
द्विजाःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनब्राह्मण
राज्ञम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनराजा से
जग्मुःक्रिया, लिट्लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन (गम् धातु)गए
सर्वेविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनसभी
यथागतम्अव्यय (यथा + आगत)जैसे आए थे वैसे
राजापुल्लिंग, प्रथमा एकवचनराजा
अपिअव्ययभी
प्रीतमनसाविशेषण, पुल्लिंग, तृतीया एकवचनप्रसन्न मन से
निवासायपुल्लिंग, चतुर्थी एकवचननिवास के लिए
मनःनपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनमन
दधेक्रिया, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (धा धातु, आत्मनेपद)लगाया, स्थिर किया

इस श्लोक में राजा की मानसिक स्थिति का सुंदर चित्रण है। आशीर्वाद सुनकर वे प्रसन्न हो जाते हैं और अपने निवास की ओर मन लगाते हैं। 'निवासाय मनो दधे' का अर्थ है कि अब वे अपने राजकाज और पारिवारिक जीवन में मन लगा सकते हैं, क्योंकि पुत्र की चिंता अब आशीर्वाद से दूर हो गई है।