अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

न तस्य चौरा विद्यन्ते न दुर्वृत्ता न दस्यवः। न ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्च विरोधं कुर्वते क्वचित्॥

हिंदी अनुवाद

उसके राज्य में न चोर थे, न दुर्वृत्त लोग, न डाकू; और न कभी ब्राह्मण और क्षत्रिय परस्पर विरोध करते थे।

अर्थ / व्याख्या

दशरथ के राज्य में चोर, दुर्वृत्त, डाकू नहीं थे, और ब्राह्मण-क्षत्रियों में कभी विरोध नहीं होता था।

टिप्पणी

यह श्लोक रामराज्य के आदर्श को प्रस्तुत करता है, जहाँ अपराध नहीं होते और सामाजिक सौहार्द बना रहता है।

श्लोक २६: अपराध एवं संघर्ष से मुक्त राज्य

न तस्य चौरा विद्यन्ते न दुर्वृत्ता न दस्यवः।
न ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्च विरोधं कुर्वते क्वचित्॥
na tasya caurā vidyante na durvṛttā na dasyavaḥ | na brāhmaṇāḥ kṣatriyāśca virodhaṃ kurvate kvacit ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उसके राज्य में न चोर थे, न दुर्वृत्त लोग, न डाकू; और न कभी ब्राह्मण और क्षत्रिय परस्पर विरोध करते थे।

🔹 English Translation : In his kingdom there were no thieves, no wicked people, no robbers; and never did the Brahmins and Kshatriyas quarrel with each other.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
अव्ययनहीं
तस्यसर्वनाम, षष्ठी एकवचनउसके (राज्य में)
चौराःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनचोर
विद्यन्तेआत्मनेपद, लट्लकार, प्रथमपुरुष बहुवचनहोते हैं, थे
दुर्वृत्ताःविशेषण, प्रथमा बहुवचनदुराचारी, बुरे आचरण वाले
दस्यवःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनडाकू, लुटेरे
ब्राह्मणाःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनब्राह्मण
क्षत्रियाःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनक्षत्रिय
अव्ययऔर
विरोधम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनविरोध, झगड़ा
कुर्वतेआत्मनेपद, लट्लकार, प्रथमपुरुष बहुवचनकरते हैं
क्वचित्अव्ययकहीं भी, कभी भी

📜 व्याख्या एवं महत्त्व

यह श्लोक दशरथ के राज्य की आदर्श स्थिति का वर्णन करता है। चोर, दुर्वृत्त और डाकू न होना यह दर्शाता है कि राज्य में पूर्ण कानून व्यवस्था थी और प्रजा संतुष्ट थी। दूसरी पंक्ति में ब्राह्मणों और क्षत्रियों के परस्पर विरोध न होने का उल्लेख है। यह वर्णों (जातियों) के बीच सद्भाव को दर्शाता है। प्राचीन समाज में ब्राह्मण (ज्ञानी, पुरोहित) और क्षत्रिय (योद्धा, शासक) के बीच कभी-कभी टकराव हो जाता था, परन्तु दशरथ के राज्य में ऐसा नहीं था।

यह रामराज्य का आदर्श चित्रण है, जहाँ न केवल अपराध अनुपस्थित हैं, बल्कि सामाजिक सद्भाव भी पूर्ण रूप से विद्यमान है। ऐसा राज्य सुखदायी होता है और प्रजा धर्मपरायण होती है।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक हमें सिखाता है कि एक आदर्श समाज वह है जहाँ अपराध न हों और विभिन्न वर्गों में परस्पर सहयोग हो। यह तभी संभव है जब शासक धर्मपरायण हो और प्रजा भी धर्म का पालन करे। आध्यात्मिक दृष्टि से, हमें अपने अंतःकरण से चोर (बुरे विचार), दुर्वृत्त (दुर्गुण) और डाकू (काम, क्रोध आदि) को निकालना चाहिए और आंतरिक सद्भाव स्थापित करना चाहिए।

॥ न ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्च विरोधं कुर्वते क्वचित् ॥

जय श्री राम 🙏