महाकाव्य के गायन की ज़िम्मेदारी – श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
जटाबन्धनमन्यस्तु काष्ठरज्जुं मुदान्वितः। यज्ञभाण्डमृषिः कश्चित्काष्ठभारं तथापरः॥
हिंदी अनुवाद
किसी आनन्दित मुनि ने जटाबन्धन की रस्सी दी, किसी ऋषि ने यज्ञ के भाण्ड दिए और किसी अन्य ने काष्ठ (समिधा) का भार दिया।
अर्थ / व्याख्या
इस अंतिम श्लोक में मुनियों द्वारा दी गई अन्य वस्तुओं का उल्लेख है – जटाबन्धन की रस्सी (जटाओं को बाँधने के लिए), यज्ञभाण्ड (यज्ञ के पात्र) तथा काष्ठभार (समिधा या लकड़ियों का बोझ)। ये सभी वस्तुएँ यज्ञ एवं तपस्या के लिए अत्यावश्यक हैं।
टिप्पणी
इस श्लोक में अंतिम उपहारों का वर्णन है। जटाबन्धन की रस्सी (जटा-रज्जु) से जटाओं को बाँधकर सुव्यवस्थित रखा जाता था – यह तपस्वी के केश-विन्यास का आवश्यक अंग था। यज्ञभाण्ड वे पात्र हैं जिनमें यज्ञ की सामग्री रखी जाती है। काष्ठभार यज्ञ की समिधा के लिए लकड़ियों का बंडल है। इन सबके द्वारा मुनि यह संकेत दे रहे थे कि राम-लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए सभी आवश्यक सामग्री उपलब्ध करा दी गई है। अब वे विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए पूर्णतया सुसज्जित हैं।
॥ बालकाण्ड सर्ग ४ श्लोक २५ – जटा-रज्जु, यज्ञभाण्ड एवं काष्ठभार ॥
यज्ञभाण्डमृषिः कश्चित्काष्ठभारं तथापरः॥
yajñabhāṇḍam ṛṣiḥ kaścit kāṣṭhabhāraṃ tathāparaḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : किसी आनन्दित मुनि ने जटाबन्धन की रस्सी दी, किसी ऋषि ने यज्ञ के भाण्ड दिए और किसी अन्य ने काष्ठ (समिधा) का भार दिया।
🔹 English Translation : Another joyful sage gave a cord for tying matted locks (jaṭābandhana), some ṛṣi gave sacrificial vessels (yajñabhāṇḍa), and yet another gave a load of firewood (kāṣṭhabhāra).
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| जटाबन्धनम् | नपुंसकलिङ्ग द्वितीया एकवचन | जटाओं को बाँधने की रस्सी |
| अन्यः | पुल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन | किसी अन्य (मुनि) ने |
| तु | अव्यय | तो |
| काष्ठरज्जुम् | स्त्रीलिङ्ग द्वितीया एकवचन | लकड़ी की रस्सी / जटा-रज्जु |
| मुदान्वितः | विशेषण, पुल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन | आनन्द से युक्त |
| यज्ञभाण्डम् | नपुंसकलिङ्ग द्वितीया एकवचन | यज्ञ के पात्र |
| ऋषिः | पुल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन | ऋषि ने |
| कश्चित् | अनियतवाचक सर्वनाम | किसी |
| काष्ठभारम् | पुल्लिङ्ग द्वितीया एकवचन | लकड़ियों का भार (समिधा) |
| तथा | अव्यय | इसी प्रकार |
| अपरः | पुल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन | दूसरे ने |
📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
इस श्लोक में अंतिम तीन उपहारों का वर्णन है – जटाबन्धन रज्जु (जटाओं को बाँधने की रस्सी), यज्ञभाण्ड (यज्ञ के पात्र) तथा काष्ठभार (समिधा का बंडल)। ये सभी वस्तुएँ एक तपस्वी के लिए नितान्त आवश्यक हैं।
जटाबन्धन रज्जु से जटाओं को बाँधा जाता था जिससे तपस्या या यज्ञ में बाधा न हो। यज्ञभाण्ड वे पात्र हैं जिनमें आहुति सामग्री रखी जाती थी – जैसे स्रुवा, स्रुक्, चमस आदि। काष्ठभार यज्ञ की समिधा के रूप में प्रयुक्त होता था। ये सभी वस्तुएँ प्राप्त कर राम-लक्ष्मण पूर्ण रूप से यज्ञ-रक्षा हेतु सुसज्जित हो गए।
📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण
इस श्लोक में चार पाद हैं, प्रत्येक में आठ अक्षर। प्रथम पाद 'जटाबन्धनमन्यस्तु' में 'तु' अव्यय है। द्वितीय पाद 'काष्ठरज्जुं मुदान्वितः' – 'मुदान्वितः' विशेषण मुनि के भाव को दर्शाता है। तृतीय पाद 'यज्ञभाण्डमृषिः कश्चित्' में 'कश्चित्' अनिश्चयवाचक है। चतुर्थ पाद 'काष्ठभारं तथापरः' में 'तथा' समुच्चयबोधक एवं 'अपरः' एक अन्य मुनि का बोध कराता है।
यह श्लोक चतुर्थ सर्ग का अंतिम श्लोक है। यहाँ उपहारों की श्रृंखला समाप्त होती है। अब राम-लक्ष्मण सभी आवश्यक वस्तुओं से सुसज्जित होकर विश्वामित्र के साथ यज्ञ-रक्षा के लिए प्रस्थान करेंगे।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
जटाबन्धन रज्जु – जटा ऊर्जा के संचय का प्रतीक है। उसे बाँधना ऊर्जा को नियंत्रित करना है। यज्ञभाण्ड – यज्ञ के पात्र हमारे शरीर के समान हैं, जिनमें हम आहुति (कर्म) डालते हैं। काष्ठभार – समिधा हमारे त्याग और तपस्या की प्रतीक है, जिसे अग्नि (ज्ञान) में समर्पित किया जाता है।
ये अंतिम उपहार यह सुनिश्चित करते हैं कि राम-लक्ष्मण अब पूर्ण रूप से यज्ञीय जीवन के लिए तैयार हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि किसी भी महान कार्य के लिए उचित तैयारी एवं साधन आवश्यक हैं। गुरु एवं शुभचिन्तक उन साधनों को जुटाने में सहायता करते हैं।
॥ यज्ञार्थं समिधा भारं यः करोति स योग्यभाक् ॥
जय श्री राम 🙏