🙏 ये तो प्रेम की बात है, ऊधो

(Ye To Prem Ki Baat Hai Udho) – कृष्ण भजन

🎵 प्रेम की महिमा – आशिकी की गहराई – मोहन का रस

📝 भजन विवरण

🏷️ श्रेणी: कृष्ण भजन / प्रेम भक्ति
🎶 भाव: प्रेम की गहराई, आशिकी, समर्पण
📍 विशेषता: ऊधो (उद्धव) के प्रति कृष्ण भक्तों का संदेश – प्रेम बिना शर्त का होता है
📀 प्रचलन: कृष्ण भक्तों में अत्यंत प्रिय, प्रेम और आशिकी की गहराई को दर्शाने वाला भजन

📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)

॥ स्थायी ॥

ये तो प्रेम की बात है, ऊधो,
बंदगी तेरे बस की नहीं है।
यहाँ सर दे के होते हैं सौदे,
आशिकी इतनी सस्ती नहीं है॥

॥ अंतरा १ ॥

प्रेम वालों ने कब वक्त पूछा,
उनकी पूजा में सुन ले ओ ऊधो।
यहाँ दम-दम में होती है पूजा,
सिर झुकाने की फुर्सत नहीं है॥

ये तो प्रेम की बात है, ऊधो,
बंदगी तेरे बस की नहीं है॥

॥ अंतरा २ ॥

जो असल में हैं मस्ती में डूबे,
उन्हें क्या परवाह ज़िंदगी की।
जो उतरती है, चढ़ती है मस्ती,
वो हक़ीकत में मस्ती नहीं है॥

ये तो प्रेम की बात है, ऊधो,
बंदगी तेरे बस की नहीं है॥

॥ अंतरा ३ ॥

जिसकी नज़रों में हैं श्याम प्यारे,
वो तो रहते हैं जग से न्यारे।
जिसकी नज़रों में मोहन समाए,
वो नज़र फिर तरसती नहीं है॥

ये तो प्रेम की बात है, ऊधो,
बंदगी तेरे बस की नहीं है।
यहाँ सर दे के होते हैं सौदे,
आशिकी इतनी सस्ती नहीं है॥
ये तो प्रेम की बात है, ऊधो,
बंदगी तेरे बस की नहीं है॥

🎵 रचनाकार : लोक परम्परा / कृष्ण प्रेम भक्ति काव्य

🙏 भजन का अर्थ और संदेश

यह प्रसिद्ध कृष्ण भजन भक्त और प्रभु के बीच प्रेम की गहराई और सच्चे प्रेम की शर्तों को बताता है। यह भजन उद्धव (ऊधो) के नाम पर कहा जा रहा है – वे कृष्ण के दूत और महान ज्ञानी थे। भक्त कहता है कि यह प्रेम की बात है, बंदगी (साधना, नियम-पूजा) तुम्हारे बस की बात नहीं है। “यहाँ सर दे के होते हैं सौदे, आशिकी इतनी सस्ती नहीं है” – सच्चे प्रेम में अपना सब कुछ (सर) अर्पण करना पड़ता है, यह कोई सस्ता सौदा नहीं है।

पहले अंतरे में – प्रेम करने वालों ने कभी समय नहीं देखा (वे सदा प्रेम में मग्न रहते हैं)। उनकी पूजा में हर सांस (दम-दम) में पूजा होती है, उन्हें सिर झुकाने की भी फुर्सत नहीं होती – अर्थात वे स्वतः ही सिर झुकाए रहते हैं।

दूसरे अंतरे में – जो सच में मस्ती में डूबे हैं, उन्हें ज़िंदगी की कोई परवाह नहीं रहती। जो मस्ती उतरती-चढ़ती रहे, वह असली मस्ती नहीं है – असली मस्ती तो स्थिर, अडिग होती है।

तीसरे अंतरे में – जिसकी नज़रों में श्याम (कृष्ण) प्यारे हैं, वह संसार से न्यारे हो जाते हैं। जिसकी नज़रों में मोहन समा गए, उस नज़र को फिर कभी किसी और की तरस नहीं रहती।

यह भजन सिखाता है कि कृष्ण प्रेम सबसे उच्च है, और उस प्रेम के लिए पूर्ण समर्पण, आत्म-त्याग और निरंतर स्मरण आवश्यक है।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व

ऊधो (उद्धव) के प्रति भक्त का संदेश: पौराणिक कथा में उद्धव को ज्ञान मार्ग का प्रतिनिधि माना गया है। यह भजन उद्धव से कह रहा है कि प्रेम की राह ज्ञान की राह से अलग है – यहाँ नियम-कर्म की बंदगी काम नहीं करती, बल्कि सिर देने की बात होती है।

“सर दे के सौदे” – पूर्ण समर्पण का प्रतीक: यह पंक्ति बताती है कि सच्चे प्रेम में अहंकार, स्वार्थ, सब कुछ त्यागना पड़ता है। प्रेम कोई लेन-देन का सौदा नहीं, बल्कि आत्मदाह का सौदा है।

मस्ती की गहराई: “जो उतरती है, चढ़ती है मस्ती, वो हकीकत में मस्ती नहीं है” – यह उस आध्यात्मिक मस्ती को दर्शाता है जो सदा स्थिर रहती है, जो कभी कम या ज्यादा नहीं होती।

💖 प्रेम भक्ति का संदेश

🎯 संदेश

सच्चा प्रेम नियमों, रीति-रिवाजों या ज्ञान से नहीं आता – वह तो हृदय से फूटता है। वह पूर्ण समर्पण माँगता है, और जो उसमें डूब जाता है, उसे दुनिया की कोई चिंता नहीं रहती।

✨ आस्था का प्रतीक

यह भजन उन सभी भक्तों के लिए प्रेरणा है जो कृष्ण के प्रति गहरे प्रेम में डूबना चाहते हैं। यह बताता है कि आशिकी (प्रेम) सस्ती नहीं है – उसके लिए अपना सब कुछ न्योछावर करना पड़ता है।

🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।। जय श्री कृष्ण ।। राधे-राधे ।।

॥ इति कृष्ण प्रेम भजनम् ॥
॥ ये तो प्रेम की बात है, ऊधो, बंदगी तेरे बस की नहीं है ॥