🙏 सांवरिया रे थारी – ओल्यूड़ी आवे

(Sanwariya Re Thari – Olyudi Aave) – राजस्थानी कृष्ण भजन

✍️ रचनाकार: संजू शर्मा, लक्मन साहा | कृष्ण विरह का मार्मिक राजस्थानी लोकगीत

📝 गीत विवरण

✍️ रचनाकार: संजू शर्मा, लक्मन साहा
🏷️ श्रेणी: कृष्ण भजन / राजस्थानी लोकगीत
🎶 भाव: विरह, व्याकुलता, प्रेम, प्रतीक्षा
📀 विशेषता: सांवरिया (कृष्ण) के वियोग में भक्त की करुण पुकार – राजस्थानी भाषा का सजीव प्रयोग

📜 गीत लिरिक्स (राजस्थानी-हिन्दी में)

॥ मुखड़ा ॥

याद थारी आवे नैणा, बरस रही बादळी,
सांवरिया रे थारी, ओल्यूड़ी आवे ।।

दिन बीत्या रे बीत्या महीना, बीतण लागी साल,
आजा रे साँवरिया थारी, ऊबो जोऊँ बाट,
गिण गिण घसगी म्हारे, हाथां री आँगळी,
सांवरिया रे थारी, ओल्यूड़ी आवे ।।

वादो करके भूल गयो तू, क्यूँ म्हानै बिलमायो,
बोल्यो थो आऊँगा तेरे, आज तलक नहीं आयो,
तेरी मीठी बातां बाबा, नींद ले गई म्हारली,
सांवरिया रे थारी, ओल्यूड़ी आवे ।।

एक पल चैन नहीं बिन थारे, मनड़ो धीर गंवाए,
टालमटोल करे मत बाबा, एक बर मिल ले आय,
थारे बिना कईयाँ चलसी, जीवन की या गाडली,
सांवरिया रे थारी, ओल्यूड़ी आवे ।।

आणो है तो आजा साँवरा, क्यूँ म्हाने तरसावे,
लोग मस्करा पूछे ‘संजू’, कद साँवरियो आवे,
बात म्हारी जो गई तो, जासी बात थारली,
सांवरिया रे थारी, ओल्यूड़ी आवे ।।

✍️ रचनाकार : संजू शर्मा जी, लक्मन साहा जी

🗣️ भाषा: राजस्थानी – हिन्दी मिश्रित

🙏 गीत का अर्थ और संदेश

यह अत्यंत मार्मिक राजस्थानी कृष्ण भजन है जिसमें भक्त सांवरिया (कृष्ण) के वियोग में व्याकुल है। “याद थारी आवे नैणा, बरस रही बादळी” – तुम्हारी याद आती है तो आँखें बरसाती हैं, बादल भी बरस रहे हैं। “सांवरिया रे थारी, ओल्यूड़ी आवे” – हे सांवरिया, तुम्हारी याद बरसात के झोंके (ओल्यूड़ी) के समान आती है।

पहले अंतरे में – दिन बीते, महीने बीते, साल बीतने लगा। हे साँवरिया, आ जाओ, मैं तुम्हारी राह देखते-देखते खड़ी-खड़ी अपनी अँगुलियाँ गिन-गिन कर घिस गई हूँ।

दूसरे अंतरे में – तुमने वादा करके भूल गए, क्यों विलंब किया? कहा था कि आऊँगा, पर आज तक नहीं आए। तुम्हारी मीठी बातों ने मेरी नींद चुरा ली।

तीसरे अंतरे में – बिना तुम्हारे एक पल चैन नहीं, मन ने धीरज खो दिया। टालमटोल मत करो बाबा, एक बार मिल लो। तुम्हारे बिना जीवन की यह गाड़ी कैसे चलेगी?

चौथे अंतरे में – आना है तो आ जाओ साँवरिया, क्यों तरसाते हो? लोग मस्कराकर पूछते हैं – “संजू, कब साँवरिया आएंगे?” अगर मेरी बात चली गई (मैं नहीं रही), तो तुम्हारी बात भी चली जाएगी (अर्थात तुम्हारी प्रतिष्ठा भी चली जाएगी)।

यह गीत कृष्ण भक्ति के विरह रस का उत्कृष्ट उदाहरण है – जहाँ भक्त प्रियतम के वियोग में अपनी पीड़ा और व्याकुलता को मार्मिक शब्दों में प्रस्तुत करता है।

🔍 गीत का विशेष महत्त्व

राजस्थानी लोक संस्कृति का अनूठा उदाहरण: इस गीत में “ओल्यूड़ी” (बरसात के झोंके), “गिण गिण घसगी हाथां री आँगळी” (अँगुलियाँ गिनते-गिनते घिस जाना), “गाडली” (गाड़ी) जैसे शब्द राजस्थानी भाषा की समृद्धि को दर्शाते हैं।

विरह रस की गहराई: यह गीत मीरा की विरह-भक्ति की परम्परा में आता है, जहाँ सांवरिया के बिना जीवन अधूरा है।

रचनाकार का नामोल्लेख: अंतिम अंतरे में “लोग मस्करा पूछे ‘संजू’” से रचनाकार संजू शर्मा ने स्वयं को शामिल किया है, जिससे यह और भी व्यक्तिगत और मार्मिक बन गया है।

💖 विरह भक्ति का अद्भुत रस

🎯 संदेश

प्रभु के वियोग में भक्त की पीड़ा अपरंपार होती है। लेकिन यह वियोग ही उस प्रेम की गहराई को मापता है। सच्चा प्रेमी प्रभु से एक बार मिलने के लिए वर्षों प्रतीक्षा कर सकता है।

✨ आस्था का प्रतीक

यह गीत लाखों कृष्ण भक्तों के हृदय की व्याकुलता को आवाज देता है। “सांवरिया” का यह पुकार न केवल राजस्थान में बल्कि पूरे भारत में प्रिय है।

🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।। सांवरिया रे थारी ओल्यूड़ी आवे ।। जय श्री कृष्ण ।।

॥ इति राजस्थानी कृष्ण विरह गीतम् ॥
॥ सांवरिया रे थारी, ओल्यूड़ी आवे – याद थारी आवे नैणा बरस रही बादळी ॥