रचा है श्रष्टि को जिस प्रभु ने वही ये श्रष्टि चला रहे है लिरिक्स (Racha Hai Srishti Ko Jis Prabhu Ne Lyrics in Hindi)
प्रकाशित तिथि: 2026 | श्रेणी: भजन एवं भक्ति गीत | पावन स्मरण: श्री बांके बिहारी एवं राधा-कृष्ण
सनातन धर्म की पावन परंपरा में संकीर्तन और प्रभु नाम का स्मरण जीवात्मा के कल्याण का सर्वोत्तम मार्ग माना गया है। यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "रचा है श्रष्टि को जिस प्रभु ने वही ये श्रष्टि चला रहे है" परमपिता परमात्मा की असीम शक्ति, उनकी लीलाओं और इस संपूर्ण ब्रह्मांड पर उनके स्वामित्व का जीवंत गान है। जिस प्रकार एक सूत्र में पिरोए गए मोती सुंदर माला का रूप लेते हैं, उसी प्रकार यह संपूर्ण ब्रह्मांड श्री हरि विष्णु और उनके पूर्णावतारी भगवान श्री कृष्ण की योगमाया के नियंत्रण में संचालित हो रहा है। इस भजन का प्रत्येक शब्द साधक को यह अश्वासन देता है कि इस संसार में पत्ता भी उनकी मर्जी के बिना नहीं हिलता। जब मनुष्य अपनी चिंताओं को त्यागकर पूर्ण रूप से उस परम सत्ता पर भरोसा कर लेता है, तब जीवन की सभी बाधाएं स्वतः दूर हो जाती हैं। आइए, इस दिव्य भजन के भावार्थ, लिरिक्स और इसके आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करें।
भजन का मुख्य संदेश
संसार के समस्त दायित्वों और कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी अपने मन को निरंतर भगवान के श्रीचरणों में लीन रखना ही सच्ची भक्ति है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि रचयिता ही संचालक है, अतः हमें फल की चिंता किए बिना केवल अपने कर्म और भक्ति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अधिक जानकारी के लिए हमारे श्री कृष्ण भजन संग्रह और राधा कृष्ण स्टेटस पृष्ठ का अवलोकन करें।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
मखड़ा (स्थाई)
रचा है श्रष्टि को जिस प्रभु ने,
वही ये श्रष्टि चला रहे हैं!
वही ये श्रष्टि चला रहे हैं,
वही ये श्रष्टि चला रहे हैं...
अंतरा 1
जलाते जो धूप बिना सितारे,
बहाते जो निर्झर खुशी की धारा,
वही कण-कण में समाए हुए हैं,
हमें अपना जलवा दिखा रहे हैं!
रचा है श्रष्टि को जिस प्रभु ने...
अंतरा 2
हवाओं की गति को जो रोके नहीं तो,
ये तूफान बनकर प्रलय ला दें हमको,
मगर उनकी ममता का पहरा है ऐसा,
कि हर साँस में प्यार बरसा रहे हैं!
रचा है श्रष्टि को जिस प्रभु ने...
अंतरा 3
भटकते हैं जो मोह-माया के वन में,
उन्हें खींच लाते हैं पावन चरण में,
पुकारो जो सच्चे हृदय से कन्हैया,
तो दौड़े चले वे चले आ रहे हैं!
रचा है श्रष्टि को जिस प्रभु ने,
वही ये श्रष्टि चला रहे हैं!
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन की पंक्तियाँ केवल शब्दमात्र नहीं हैं, बल्कि वेदांत और भक्तियोग का सार हैं। पहले पद में रचनाकार कहते हैं कि जिस प्रकार इस असीम ब्रह्मांड की रचना करने वाले स्वयं प्रभु श्री कृष्ण हैं, उसी प्रकार इसका सुचारू संचालन भी वही कर रहे हैं। आधुनिक विज्ञान चाहे कितनी भी उन्नतियाँ कर ले, परंतु ब्रह्मांड की यह अद्भुत व्यवस्था बिना किसी सर्वोच्च नियमन के संभव नहीं है।
अगले चरणों में यह समझाया गया है कि सूर्य, चंद्रमा, तारे और प्रकृति के अन्य उपादान उन्हीं की ऊर्जा से प्रकाशित हो रहे हैं। मनुष्य अपनी छोटी-छोटी सफलताओं पर अहंकार कर बैठता है, परंतु वास्तव में कण-कण में उनकी ही चेतना व्याप्त है। जब भक्त जीवन की कठिनाइयों से घबराकर मोह-माया के जंगलों में भटकने लगता है, तब भगवान किसी न किसी रूप में उसका मार्गदर्शन कर उसे अपने पावन चरणों से जोड़ लेते हैं। आवश्यकता केवल एक बार सच्चे हृदय से 'कन्हैया' पुकारने की होती है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- आरध्य देव: जगत के पालनहार भगवान श्री कृष्ण और योगेश्वर हरि।
- भक्ति रस: शरणागति, अनन्य प्रेम, और आश्वस्त भाव (विश्वास)।
- सांस्कृतिक महत्व: सनातन सत्संगों, जागरण और एकादशी उत्सवों पर अत्यंत चाव से गाया जाने वाला लोकप्रिय भजन।
- मानसिक शांति: तनाव और अवसाद से घिरे व्यक्तियों के अंतस में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाला पावन संकीर्तन।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
भक्ति संगीत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए उचित समय और पवित्रता का ध्यान रखना आवश्यक है:
- ब्रह्ममुहूर्त एवं संध्या बेरा: प्रातःकाल स्नान के पश्चात मंदिर में दीप प्रज्वलित करते समय या संध्या वंदन के समय इसे गाना अत्यंत फलदायी है।
- सत्संग एवं कीर्तन: किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, एकादशी जागरण या श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर समवेत स्वर में इसका गायन किया जा सकता है।
- एकाग्रता: श्रवण करते समय नेत्र बंद करके भगवान के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण के निराकार एवं साकार दोनों रूपों को समर्पित है। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण स्वयं अर्जुन से कहते हैं— "मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमितं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥" अर्थात हे धनंजय! मुझसे परे अन्य कोई श्रेष्ठ सत्य नहीं है। यह संपूर्ण संसार मुझमें उसी प्रकार पिरोया हुआ है जैसे धागे में मणियाँ। इस भजन के रचयिता ने इसी शाश्वत दार्शनिक सत्य को अत्यंत सरल लोकभाषा में पिरोया है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, प्रवाहमयी और आम जनमानस के हृदय को छूने वाली हिंदी/अवधी-खड़ी बोली का मिश्रण है। इसमें रूपक अलंकार और अनुप्रास की सुंदर छटा देखने को मिलती है। शब्दों का चयन ऐसा है कि बच्चा हो या वृद्ध, हर कोई इसे आसानी से गुनगुना सकता है। संगीत की दृष्टि से यह भजन तालबद्ध और शांति प्रदान करने वाली धुन में गाया जाता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
- पूर्ण शरणागति (Surrender): जब मनुष्य अपने जीवन की डोर भगवान के हाथ में सौंप देता है, तब भय और चिंता स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
- कर्ताभाव का त्याग: यह समझना कि हम केवल निमित्त मात्र हैं, संचालक वही परमात्मा है।
- प्रभु पर अटूट विश्वास: कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी ईश्वर की न्यायप्रियता और ममता पर संदेह न करना।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पद | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| श्रष्टि | ब्रह्मांड, संसार, रचना | भगवान द्वारा रची गई भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रकृति |
| निर्मल / निर्झर | पवित्र धारा, झरना | भगवान की अतुट करुणा और कृपा का प्रवाह |
| मोह-माया | सांसारिक आकर्षण और अज्ञान | वह आवरण जो जीव को परमात्मा से दूर करता है |
| कण-कण | परमाणु, हर एक स्थान | ईश्वर की सर्वव्यापकता (Omnipresence) |
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | रचा है श्रष्टि को जिस प्रभु ने (Racha Hai Srishti Ko Jis Prabhu Ne) |
|---|---|
| समर्पित देवता | भगवान श्री कृष्ण, राधा-कृष्ण |
| संगीत शैली | भक्ति संगीत / लोक संकीर्तन |
| भाषा | सरल हिंदी |
| मुख्य भाव | शरणागति, अगाध प्रेम और भक्ति |
| उपयुक्त अवसर | जन्माष्टमी, एकादशी, सत्संग, दैनिक पूजा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
भक्तिलok.in पर प्रस्तुत यह सामग्री सनातन ग्रंथों, श्रीमद्भागवत गीता के दर्शन और पारंपरिक लोक संकीर्तन की परंपराओं पर आधारित है। पाठकों की प्रामाणिक और सुंदर भक्ति सामग्री उपलब्ध कराने के हमारे निरंतर प्रयास के तहत यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रकाशित किया गया है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भागवत महापुराण (प्रकाशन गीतापोखरा / गोरखपुर)
- सनातन संकीर्तन और लोक भजन परंपरा
- वैदिक दर्शन एवं उपनिषदों में ईश्वर की सर्वव्यापकता
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