Krishna Bhajan बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

मोहे प्रेम का रोग लगाये गयो री वो कान्हा बंसी वालो भजन इन हिंदी लिरिक्स

पढ़ें मोहे प्रेम का रोग लगाये गयो री वो कान्हा बंसी वालो भजन इन हिंदी लिरिक्स का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भ

प्रस्तुत भजन "मोहे प्रेम का रोग लगाये गयो री वो कान्हा बंसी वालो" वैष्णव भक्ति रस की एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण रचना है। इस भजन में जीवात्मा और परमात्मा के मध्य के अनन्य प्रेम को दर्शाया गया है। यहाँ "प्रेम का रोग" कोई लौकिक व्याधि नहीं, बल्कि वह दिव्य अनुराग है जो भक्त को संसार के समस्त बंधनों से मुक्त कर केवल ईश्वर की ओर उन्मुख करता है। यह भजन विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र की मधुर गायन शैली और माधुर्य भाव (Madhurya Bhava) को प्रदर्शित करता है। जब कोई भक्त पूर्ण समर्पण के साथ इस भजन का गायन करता है, तो वह श्री कृष्ण की बांसुरी की तान और उनकी मनमोहक छवि में पूरी तरह लीन हो जाता है। यह भजन सत्संगों, श्री कृष्ण जन्माष्टमी, राधाष्टमी और दैनिक संध्या आरती के समय भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मोहे प्रेम का रोग लगाये गयो री वो कान्हा बंसी वालो

मोहे प्रेम का रोग लगाये गयो री वो कान्हा बंसी वालो।
वो कान्हा बंसी वालो, वो कान्हा कालो कालो॥
मोहे प्रेम का रोग लगाये गयो री वो कान्हा बंसी वालो॥

रंग जो गम सब मेरे भुला के, मेरी नजर से नजर को मिला के।
नैनन को तीर चलाए गयो री, वो कान्हा बंसी वालो॥
मोहे प्रेम का रोग लगाये गयो री वो कान्हा बंसी वालो॥

सुघर सलोनी मोहनी मूरत, बन गई है अब मेरी जरूरत।
मेरे दिल के बीच समाये गयो री, वो कान्हा बंसी वालो॥
मोहे प्रेम का रोग लगाये गयो री वो कान्हा बंसी वालो॥

ज्योति तिवाड़ी हुयी बलिहारी, बात हकीकत कहे अनाड़ी।
मस्ती को रंग चड़ाये गयो री, वो कान्हा बंसी वालो॥
मोहे प्रेम का रोग लगाये गयो री वो कान्हा बंसी वालो॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस सुंदर भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और आध्यात्मिक है। यहाँ गोपी भाव या भक्त के हृदय की उस अवस्था का वर्णन है जहाँ वह भगवान श्री कृष्ण के दिव्य प्रेम में पूरी तरह से रंग चुका है।

भक्त कहता है कि उस बंसी बजाने वाले नटखट कान्हा ने मुझे अपने प्रेम का ऐसा रोग लगा दिया है जिसका कोई सांसारिक उपचार नहीं है। यह रोग केवल और केवल प्रभु के दर्शन और उनके सानिध्य से ही शांत हो सकता है। वह कान्हा जो सांवले रंग का है, अपनी बांसुरी की मधुर तान से संपूर्ण सृष्टि को मोहित करता है, उसने मेरे हृदय को चुरा लिया है।

आगे भक्त कहता है कि प्रभु ने मेरी आँखों से अपनी आँखें मिलाकर मेरे जीवन के सारे दुखों और कष्टों को भुला दिया है। उन्होंने अपने नैनों से ऐसा प्रेम रूपी बाण चलाया है कि मेरा हृदय उनके प्रति पूर्णतः समर्पित हो गया है। उनकी वह सुंदर, सलोनी और मनमोहक मूरत अब मेरे जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है। उनके बिना अब एक क्षण भी रहना असंभव प्रतीत होता है। अंत में, कवयित्री कहती हैं कि वे भगवान श्री कृष्ण की इस अनुपम लीला पर पूरी तरह से न्योछावर (बलिहारी) हो चुकी हैं और प्रभु ने उनके जीवन को अपनी भक्ति के दिव्य रंग और मस्ती से सराबोर कर दिया है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित गोपियों के "रागानुगा भक्ति" मार्ग का जीवंत उदाहरण है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • माधुर्य भाव की पराकाष्ठा: इस भजन में शांत या दास्य भाव के स्थान पर माधुर्य भाव की प्रधानता है, जहाँ भक्त अपने आराध्य को अत्यंत निकट मानता है।
  • सांसारिक विरक्ति: "रंग जो गम सब मेरे भुला के" पंक्ति दर्शाती है कि जब जीव को ईश्वर का सच्चा प्रेम प्राप्त होता है, तो वह संसार के समस्त सुख-दुख और चिंताओं से मुक्त हो जाता है।
  • आत्मसमर्पण: भजन की प्रत्येक पंक्ति में भक्त का अपने आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पण झलकता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान के नाम संकीर्तन के लिए किसी विशेष समय की बाध्यता नहीं होती, फिर भी इस भजन के गायन और श्रवण का विशेष फल निम्नलिखित अवसरों पर मिलता है:

  • संध्या काल संकीर्तन: शाम के समय घर के मंदिर या देवालय में दीप प्रज्वलित कर इस भजन का गायन करने से मानसिक शांति मिलती है।
  • विशेष उत्सव: श्री कृष्ण जन्माष्टमी, होली, राधाष्टमी और कार्तिक मास के दौरान इस भजन का सामूहिक संकीर्तन अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • गायन की विधि: इसे ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम के साथ मध्यम लय में गाना चाहिए ताकि भजन के शब्दों का भाव हृदय में गहराई से उतर सके।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण और उनकी ह्लादिनी शक्ति श्री राधा रानी को समर्पित है। वैष्णव संप्रदाय में राधा-कृष्ण का प्रेम जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। इस भजन की रचना आधुनिक युग की सुप्रसिद्ध भजन गायिका और लेखिका ज्योति तिवारी द्वारा की गई है, जिन्होंने अपनी सरल और भावपूर्ण शैली से इस भजन को जन-जन तक पहुँचाया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि ब्रज की लोक संस्कृति और रसिया गायन परंपरा से प्रेरित है। ब्रजभूमि में भगवान कृष्ण को एक सखा, प्रेमी और रक्षक के रूप में पूजा जाता है। इस भजन की रचना में उसी पारंपरिक ब्रज भाषा के पुट का प्रयोग किया गया है जो सीधे हृदय को स्पर्श करता है। यह भजन आधुनिक काल में रचित होने के बावजूद प्राचीन अष्टछाप कवियों के पदों जैसी ही दिव्य अनुभूति प्रदान करता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है जिसमें ब्रजभाषा के शब्दों जैसे "नैनन", "सुघर", "बलिहारी", "कान्हा" आदि का अत्यंत सुंदर समन्वय किया गया है।

  • काव्य शैली: यह एक गेय पद है जिसे सुगमता से गाया जा सकता है।
  • अलंकार योजना: इसमें रूपक और अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है। "प्रेम का रोग" में रूपक अलंकार है, जहाँ प्रेम को ही रोग का रूप दे दिया गया है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें सिखाता है कि वास्तविक आनंद भौतिक वस्तुओं या सांसारिक संबंधों में नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम में है। जब हम अपने अहंकार को त्यागकर भगवान के चरणों में समर्पित हो जाते हैं, तो हमारे जीवन के सारे कष्ट स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि भक्ति में सरलता और निश्छलता का होना अत्यंत आवश्यक है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
प्रेम का रोग ईश्वरीय अनुराग की पराकाष्ठा वह अवस्था जहाँ भक्त को केवल ईश्वर की याद रहती है।
बंसी वालो बांसुरी बजाने वाले श्री कृष्ण प्रभु की वह बांसुरी जो अनाहत नाद का प्रतीक है।
नैनन को तीर नेत्रों का कटाक्ष या कृपा दृष्टि भगवान की वह दृष्टि जो भक्त के अज्ञान को नष्ट करती है।
सुघर सलोनी अत्यंत सुंदर और सांवली श्री कृष्ण की मनमोहक और दिव्य छवि।
बलिहारी स्वयं को न्योछावर करना अहंकार का पूर्ण विसर्जन और समर्पण।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

मुखड़ा: "मोहे प्रेम का रोग लगाये गयो री वो कान्हा बंसी वालो..."

भक्त अपनी सखी से कहता है कि हे सखी! उस बांसुरी बजाने वाले सांवले कृष्ण ने मुझे अपने दिव्य प्रेम का ऐसा रोग लगा दिया है कि अब मुझे संसार की कोई सुध-बुध नहीं रही।

प्रथम अंतरा: "रंग जो गम सब मेरे भुला के..."

जब प्रभु ने मुझसे अपनी कृपामयी दृष्टि मिलाई, तो मेरे जीवन के सारे दुख, दर्द और सांसारिक चिंताएं पल भर में गायब हो गईं। उनके नैनों के प्रेम रूपी बाण ने मेरे हृदय को अपना बना लिया है।

द्वितीय अंतरा: "सुघर सलोनी मोहनी मूरत..."

उनकी वह अत्यंत सुंदर और सांवली सूरत अब मेरे हृदय में इस प्रकार बस गई है कि वह मेरे जीवन का आधार बन चुकी है। अब उनके बिना मेरा अस्तित्व ही अधूरा है।

तृतीय अंतरा: "ज्योति तिवाड़ी हुयी बलिहारी..."

कवयित्री कहती हैं कि मैं उस नटवर नागर पर पूरी तरह से न्योछावर हो चुकी हूँ। यह कोई कल्पना नहीं बल्कि जीवन की परम सत्य हकीकत है कि प्रभु ने मेरे जीवन को अपनी भक्ति के दिव्य रंग से सराबोर कर दिया है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को और अधिक प्रगाढ़ करने के लिए भगवान श्री कृष्ण के इस प्रसिद्ध श्लोक का स्मरण करना चाहिए:

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥

(श्रीमद्भगवद्गीता - 18.65)

अर्थ: "मुझमें अपना मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त करोगे। यह मेरा तुम्हारे प्रति सत्य वचन है क्योंकि तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।"

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम मोहे प्रेम का रोग लगाये गयो री वो कान्हा बंसी वालो
मुख्य आराध्य भगवान श्री कृष्ण (राधा-कृष्ण)
रचनाकार / गायिका ज्योति तिवारी (Jyoti Tiwari)
भाषा हिंदी (ब्रजभाषा पुट के साथ)
भक्ति भाव माधुर्य भाव, समर्पण भाव (Madhurya Bhava)
मुख्य वाद्य यंत्र हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा, बांसुरी
उपयुक्त अवसर जन्माष्टमी, सत्संग, दैनिक संध्या वंदना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन की रचना और गायन सुप्रसिद्ध भजन गायिका ज्योति तिवारी द्वारा किया गया है। उनके इस भजन को भक्तों द्वारा बहुत पसंद किया गया है।

यहाँ "प्रेम का रोग" का अर्थ सांसारिक बीमारी नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति अनन्य और अटूट प्रेम की वह अवस्था है जहाँ भक्त को भगवान के अतिरिक्त कुछ और नहीं सुहाता।

यह भजन मुख्य रूप से ब्रज की पारंपरिक लोक शैली और सुगम संगीत के मिश्रण पर आधारित है, जिसे बहुत ही सरल और मधुर धुन में गाया जाता है।

इस भजन के नियमित गायन और श्रवण से मन शांत होता है, सांसारिक तनाव दूर होते हैं और हृदय में भगवान श्री कृष्ण के प्रति भक्ति भाव जाग्रत होता है।

हाँ, श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर इस भजन का संकीर्तन करना अत्यंत शुभ और आनंददायी माना जाता है।

इसका अर्थ है कि भगवान श्री कृष्ण ने अपनी करुणामयी और प्रेमपूर्ण दृष्टि से भक्त के हृदय को जीत लिया है और उसके अज्ञान को दूर कर दिया है।

इस भजन का मुख्य रस "भक्ति रस" और "शृंगार रस" (माधुर्य भाव) है, जो भक्त और भगवान के मधुर संबंध को दर्शाता है।

हाँ, इसकी सरल भाषा और मधुर लय के कारण बच्चे इसे बहुत आसानी से सीख सकते हैं, जिससे उनमें बचपन से ही सुसंस्कार और भक्ति का संचार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को वैष्णव ग्रंथों, ब्रज साहित्य और पारंपरिक संकीर्तन पद्धतियों के आधार पर अत्यंत सावधानीपूर्वक संकलित और विश्लेषित किया गया है ताकि पाठकों को शुद्ध और प्रामाणिक जानकारी प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण (रासपंचाध्यायी प्रसंग)
  • पारंपरिक वैष्णव कीर्तन संग्रह
  • ब्रज लोक साहित्य एवं रसिया परंपरा

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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