अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
एवं गुणगणैर्युक्तो राजा दशरथोऽभवत्। यस्य पुत्रो महातेजा रामो राजीवलोचनः॥
हिंदी अनुवाद
इस प्रकार गुणों के समूह से युक्त राजा दशरथ थे, जिनके पुत्र महातेजस्वी, कमलनयन श्रीराम हुए।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक सर्ग का समापन करता है और राजा दशरथ के गुणों एवं उनके पुत्र राम के आगमन की सूचना देता है।
टिप्पणी
यह श्लोक सर्ग ७ का अंतिम श्लोक है। यह राजा दशरथ के चरित्र का सार प्रस्तुत करता है और साथ ही आगामी सर्गों में राम के जन्म की ओर संकेत करता है। "राजीवलोचनः" (कमलनयन) राम के सौंदर्य और दिव्यता का वर्णन करता है।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक ४५ ॥
यस्य पुत्रो महातेजा रामो राजीवलोचनः॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : इस प्रकार गुणों के समूह से युक्त राजा दशरथ थे, जिनके पुत्र महातेजस्वी, कमलनयन श्रीराम हुए।
🔹 English Translation : Thus was King Dasharatha endowed with multitudes of virtues, whose son was the greatly radiant, lotus-eyed Rama.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| एवम् | अव्यय | इस प्रकार |
| गुणगणैः | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन (गुण + गण) | गुणों के समूहों से |
| युक्तः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (युज् धातु, क्त) | युक्त |
| राजा | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | राजा |
| दशरथः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | दशरथ |
| अभवत् | क्रिया, लङ्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (भू धातु) | थे, हुए |
| यस्य | सर्वनाम, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | जिनके |
| पुत्रः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | पुत्र |
| महातेजाः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | महान तेजस्वी |
| रामः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | राम |
| राजीवलोचनः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (राजीव + लोचन) | कमल के समान नेत्रों वाले |
यह श्लोक सर्ग का सारगर्भित समापन है। पूरे सर्ग में राजा दशरथ के शासन, उनके गुण, उनकी पुत्रकामना और अंततः मुनि के वरदान का वर्णन हुआ। यहाँ कहा गया है कि ऐसे गुणसंपन्न राजा के पुत्र महातेजस्वी कमलनयन राम हुए। "राजीवलोचनः" विशेषण राम के सौंदर्य, पवित्रता और दिव्यता का सूचक है। यह श्लोक राम के जन्म की भूमिका तैयार करता है, जिसका विस्तृत वर्णन अगले सर्गों में होगा।
📜 सर्ग ७ का सारांश
सर्ग ७ में राजा दशरथ के अयोध्या के प्रशासन का वर्णन है। इसमें उनकी पुत्रकामना, पुत्रीया यज्ञ, ऋत्विजों को दक्षिणा, उनका आशीर्वाद, लंबे समय तक शासन, पुत्रहीनता की चिंता, सुमंत्र से संवाद, शिकार का वर्णन, सरयू तट पर मुनि के दर्शन, उनकी पूजा और अंततः मुनि द्वारा वरदान का उल्लेख है। यह सर्ग राजा के चरित्र और उनके पुत्र प्राप्ति के मार्ग की आधारशिला रखता है।
॥ एवं गुणगणैर्युक्तो राजा दशरथः – सर्ग समाप्त ॥
जय श्री राम 🙏