महाकाव्य के गायन की ज़िम्मेदारी – श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
प्रीतः कश्चिन्मुनिस्ताभ्यां संस्थितः कलशं ददौ। प्रसन्नो वल्कलं कश्चिद्ददौ ताभ्यां महायशाः॥
हिंदी अनुवाद
उनसे प्रसन्न होकर कोई मुनि वहाँ से उठकर उन्हें कलश देने लगा, तो किसी महायशा मुनि ने प्रसन्न होकर उन्हें वल्कल (वस्त्र) दिया।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक उस दृश्य का वर्णन करता है जब भगवान राम एवं लक्ष्मण, विश्वामित्र के साथ ऋषियों के आश्रम में पहुँचे और सभी मुनि उनके दिव्य व्यक्तित्व से अत्यधिक प्रसन्न हुए। प्रसन्नता के आवेग में विभिन्न मुनि अपने-अपने आसन से उठे और राम-लक्ष्मण को आशीर्वाद स्वरूप उपहार देने लगे। कोई कलश (जल-पात्र) भेंट कर रहा है तो कोई वल्कल (वन-वस्त्र)। यह दृश्य भक्ति एवं गुरु-शिष्य परम्परा के आदान-प्रदान को दर्शाता है।
टिप्पणी
जब राम और लक्ष्मण ऋषियों के बीच पधारे तो वातावरण भक्तिरस से सराबोर हो गया। मुनिगण उनके तेज एवं सौम्यता पर मुग्ध होकर अपने-अपने आसनों से उठ खड़े हुए और प्रेमपूर्वक उपहार अर्पित करने लगे। यह केवल भौतिक वस्तुओं का दान नहीं था, अपितु अपने तपोबल से सिद्ध किए गए पवित्र पदार्थों का समर्पण था। कलश जल की शुद्धि का प्रतीक है और वल्कल सादगी एवं त्याग का। यह श्लोक सिखाता है कि सच्चे साधक के हृदय में जब आदर्श पुरुष के दर्शन होते हैं तो वह उनके चरणों में अपनी सर्वस्व निछावर कर देता है।
॥ बालकाण्ड सर्ग ४ श्लोक २१ – मुनियों का प्रेमोपहार ॥
प्रसन्नो वल्कलं कश्चिद्ददौ ताभ्यां महायशाः॥
prasanno valkalaṃ kaścid dadau tābhyāṃ mahāyaśāḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : उन (राम-लक्ष्मण) से प्रसन्न होकर कोई मुनि वहाँ से उठकर उन्हें कलश देने लगा, तो किसी महायशा मुनि ने प्रसन्न होकर उन्हें वल्कल (वस्त्र) दिया।
🔹 English Translation : Pleased with them, some sage rose from his seat and gave them a water-pot; another highly illustrious sage gladly gave them bark garments.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| प्रीतः | भूतकालिक कृदन्त (प्री धातु) | प्रसन्न होकर |
| कश्चित् | अनियतवाचक सर्वनाम | किसी |
| मुनिः | पुल्लिङ्ग, प्रथमा एकवचन | मुनि ने |
| ताभ्याम् | सर्वनाम, तृतीया द्विवचन | उन दोनों से |
| संस्थितः | भूतकालिक कृदन्त (सम् + स्था) | खड़ा होकर / उठकर |
| कलशम् | पुल्लिङ्ग, द्वितीया एकवचन | कलश (जल-पात्र) |
| ददौ | लिट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (दा धातु) | दिया |
| प्रसन्नः | विशेषण, पुल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन | प्रसन्न होकर |
| वल्कलम् | नपुंसकलिङ्ग, द्वितीया एकवचन | वल्कल (वस्त्र) |
| कश्चित् | अनियतवाचक सर्वनाम | किसी |
| ददौ | लिट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन | दिया |
| ताभ्याम् | सर्वनाम, चतुर्थी द्विवचन | उन दोनों को |
| महायशाः | विशेषण, पुल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन | महायशस्वी (अत्यन्त कीर्तिवान) |
📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक उस अवसर का वर्णन करता है जब भगवान राम एवं लक्ष्मण, गुरु विश्वामित्र के साथ ऋषियों के आश्रम में पधारे। राम के दिव्य एवं मोहक रूप को देखकर सभी मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए। प्रसन्नता के उफान में वे अपने-अपने आसनों से उठ खड़े हुए और राम-लक्ष्मण को आशीर्वाद स्वरूप उपहार अर्पित करने लगे।
इस श्लोक में वर्णित कलश एवं वल्कल दो महत्वपूर्ण वस्तुएँ हैं – कलश जल एवं पवित्रता का प्रतीक है, जो ऋषियों के आश्रमों में यज्ञ एवं अभिषेक के लिए प्रयुक्त होता था; वल्कल वनवासियों एवं तपस्वियों का वस्त्र है, जो सादगी एवं त्याग का द्योतक है। यह दृश्य दर्शाता है कि जब सच्चे साधक आदर्श पुरुष से मिलते हैं तो वे उनके चरणों में अपनी सम्पूर्ण साधना एवं सामग्री समर्पित कर देते हैं।
📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण
यह श्लोक अनुष्टुप् छंद में निबद्ध है – प्रत्येक पाद में आठ अक्षर। प्रथम पाद 'प्रीतः कश्चिन्मुनिस्ताभ्यां' (८ अक्षर), द्वितीय पाद 'संस्थितः कलशं ददौ' (८ अक्षर), तृतीय पाद 'प्रसन्नो वल्कलं कश्चित्' (८ अक्षर) एवं चतुर्थ पाद 'ददौ ताभ्यां महायशाः' (८ अक्षर)।
इस श्लोक में दो समानान्तर क्रियाएँ 'ददौ' (दिया) का प्रयोग करके समानता एवं समुच्चय अलंकार दर्शाया गया है। 'प्रीतः' एवं 'प्रसन्नः' दोनों पर्यायवाची हैं, जो मुनियों के भाव की एकरूपता को रेखांकित करते हैं। 'महायशाः' विशेषण उस मुनि की विशिष्टता को दर्शाता है जो वल्कल अर्पित करता है।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
इस श्लोक का आध्यात्मिक संदेश यह है कि जब साधक के हृदय में परमात्मा के प्रति सच्चा प्रेम जाग्रत होता है तो वह अपने साधन-सामग्री एवं कर्मफल को उनके चरणों में समर्पित कर देता है। कलश (जल) जीवन का आधार है – इसे अर्पित करने का अर्थ है अपने जीवन को धर्ममय बना देना। वल्कल (वस्त्र) बाहरी आवरण का प्रतीक है – उसे समर्पित करना है अपने अहंकार का त्याग।
राम एवं लक्ष्मण यहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम एवं आदर्श भक्त के प्रतीक हैं। मुनियों का प्रेमोपहार हमें सिखाता है कि ईश्वर या गुरु के समक्ष कुछ भी अर्पित करने से पहले उस वस्तु का भावपूर्ण होना आवश्यक है।
॥ प्रेमपूर्वक अर्पित किया हुआ कण-कण स्वीकार होता है ॥
जय श्री राम 🙏