Parvati Stotram

दुर्लभ मानुष जन्म है देह न बारम्बार दोहे का अर्थ(Durlabh Maanush Janm Hai Deh Na Barambaar Dohe Ka Arth in Hindi)

74 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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दुर्लभ मानुष जन्म है देह न बारम्बार: आध्यात्मिक परिचय एवं महत्व

"दुर्लभ मानुष जन्म है देह न बारम्बार" यह सनातन भक्ति परंपरा का एक अत्यंत पावन, दार्शनिक और विरक्ति से परिपूर्ण दोहा है जो मानव जीवन के परम लक्ष्य और इसकी अनमोल नश्वरता का बोध कराता है। गोस्वामी तुलसीदास जी, संत कबीर दास जी और अन्य महान संतों की वाणी में इस सत्य को बार-बार दोहराया गया है कि चौरासी लाख योनियों के भ्रमण के पश्चात अत्यंत भाग्य से यह मनुष्य योनि प्राप्त होती है। इस दोहे का मूल भाव यह है कि भौतिक सुखों और मोह-माया में अपना समय व्यर्थ गंवाने के बजाय जीव को भगवान के चरणों में प्रीति लगानी चाहिए, क्योंकि यह दुर्लभ शरीर बार-बार मिलने वाला नहीं है। इस लेख में हम इसी दिव्य दोहे के शाश्वत अर्थ, इसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि, संतों के दृष्टिकोण और दैनिक जीवन में इसके व्यावहारिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

मूल दोहा / साखी

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार।
जैसे पात पतर से, बहुरि न लागे डार॥


अथवा संत परंपरा में प्रचलित रूप:

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न मिले दोबारा।
भज लो भगवान को, तर जाए संसारा॥

उच्चारण, पाठ एवं संरचना

इस दोहे की संरचना अत्यंत सरल, लयबद्ध और लोक-मानस के अनुकूल है। यह दोहा अर्धसममात्रिक छंद के अंतर्गत आता है जिसके प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। संत भाषा, अवधी और ब्रज भाषा के सम्मिश्रण से बनी यह शैली श्रोता के हृदय को सीधे स्पर्श करती है। इसका शुद्ध उच्चारण करने से अंतःकरण में वैराग्य और भक्ति का भाव जागृत होता है। इसे प्रातःकाल ध्यान के समय या सत्संग के दौरान सस्वर पाठ करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है.

कठिन शब्दार्थ

शब्द / पद सरल हिंदी अर्थ संदर्भित प्रसंग
दुर्लभ जिसे प्राप्त करना बहुत कठिन हो मानव योनि की दुर्लभता
मानुष जन्म मनुष्य का जीवन या योनि 84 लाख योनियों में श्रेष्ठतम योनि
देह शरीर, भौतिक ढांचा नश्वर शरीर
बारम्बार बार-बार, लगातार पुनरावृत्ति का अभाव
पात पत्ता पेड़ से गिरा हुआ पत्ता
पतर झड़ना / गिरना प्रकृति का नियम
डार डाल, टहनी मूल वृक्ष (योनियों का चक्र)

पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ

इस दोहे का पदच्छेद और पंक्ति-दर-पंक्ति विश्लेषण इस प्रकार है:

  • दुर्लभ मानुष जन्म है: इसका अर्थ है कि यह मनुष्य रूपी जन्म संसार में अत्यंत दुर्लभ है, जो सामान्यतः जीव को सुलभ नहीं होता।
  • देह न बारम्बार: यह भौतिक शरीर बार-बार प्राप्त नहीं होता। एक बार यह अवसर हाथ से निकल गया तो पुनः चौरासी लाख योनियों के चक्कर में भटकना पड़ सकता है।
  • जैसे पात पतर से, बहुरि न लागे डार: जिस प्रकार वृक्ष की टहनी या डाल से एक बार पत्ता झड़कर नीचे गिर जाता है, वह सूख जाने पर पुनः उसी डाल से नहीं जुड़ सकता। ठीक उसी प्रकार, एक बार यह मानव जीवन रूपी अवसर समाप्त हो गया, तो पुनः इस योनि का मिलना अनिश्चित और कठिन है।

सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ

इस दोहे का विस्तृत भावार्थ यह है कि परमात्मा ने समस्त जीव-जंतुओं और योनियों में से मनुष्य को सर्वोत्तम बुद्धि, विवेक और चिंतन की शक्ति प्रदान की है। पशु और पक्षी केवल अपनी मूल प्रवृत्तियों (आहार, निद्रा, भय, मैथुन) के अधीन जीवन जीते हैं, लेकिन मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो अपने कर्मों का चयन कर सकता है, धर्म का पालन कर सकता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। संतों का यह संदेश हमें यह चेतावनी देता है कि हम अपने बहुमूल्य जीवन को केवल धन कमाने, भौतिक उपभोग करने और अहंकार में व्यतीत न करें। जीवन का असली उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और भगवत्प्राप्ति है। जब तक यह शरीर स्वस्थ है, इंद्रियाँ काम कर रही हैं और चेतना जाग्रत है, तब तक मनुष्य को अपने असली कर्तव्य यानी हरिभजन और परोपकार में लग जाना चाहिए। यह शरीर नश्वर है, आज है तो कल इसका अंत निश्चित है, अतः समय रहते इसका सदुपयोग करना ही बुद्धिमत्ता है।

मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार

इस दोहे का केंद्रीय विचार वैराग्य, पुरुषार्थ और भक्ति है। यह हमें यह सिखाता है कि समय सबसे मूल्यवान धन है। सांसारिक मोह-माया के जाल में फंसकर मनुष्य अक्सर अपने वास्तविक लक्ष्य को भूल जाता है। यह दोहा एक जागृति का शंखनाद है जो सोते हुए जीव को झकझोर कर उसके मूल कर्तव्य का स्मरण कराता है। इसके माध्यम से भक्त यह समझता है कि भगवान की शरण में जाने के लिए और सत्कर्म करने के लिए यही एकमात्र उपयुक्त समय है।

आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश

वेदों, उपनिषदों और भगवद्गीता में भी इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि मनुष्य योनि देवताओं के लिए भी दुर्लभ मानी गई है क्योंकि इसी योनि से मुक्ति का द्वार खुलता है। दार्शनिक दृष्टि से आत्मा अनंत है और वह विभिन्न योनियों में भ्रमण करती रहती है। कर्मफल के सिद्धांत के अनुसार, अच्छे-बुरे कर्मों के भोग के पश्चात जीव को मनुष्य रूप में जन्म मिलता है ताकि वह अपने संचित कर्मों का क्षय कर सके और भगवान से जुड़ सके। यदि इस जन्म में भी विद्या, ज्ञान और भक्ति का अर्जन नहीं किया गया, तो यह जीवन व्यर्थ चला जाता है। यही कारण है कि संत महात्मा बार-बार मनुष्य को सचेत करते हैं कि सांसारिक प्रपंचों को छोड़कर आत्मिक उन्नति की ओर ध्यान दें। इसी चेतना को जागृत रखने के लिए श्री हनुमान चालीसा और अन्य स्तोत्रों का नियमित पाठ करने की प्रेरणा दी जाती है।

भक्ति परंपरा में महत्व

भारतीय संत परंपरा में कबीरदास जी, सूरदास जी, तुलसीदास जी और मीराबाई जैसे संतों ने अपनी वाणियों के माध्यम से इसी सत्य को जन-जन तक पहुँचाया है। रामचरितमानस में भी तुलसीदास जी लिखते हैं— *“बड़े भाग्य मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सदग्रंथन्हि गावा॥”* यह पंक्ति सीधे तौर पर इसी दोहे के भाव को पुष्ट करती है। सनातन धर्म में सत्संग, कीर्तन और कथाओं का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि मनुष्य को उसके इस दुर्लभ अवसर का बोध कराया जाए ताकि वह अहंकार और ईर्ष्या को त्यागकर प्रेम और सेवा का मार्ग अपनाए।

दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख

आधुनिक दौर में जहाँ मनुष्य भागदौड़ भरी जिंदगी और भौतिकता की अंधी दौड़ में व्यस्त है, यह दोहा और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आज का इंसान तनाव, अवसाद और असंतोष से घिरा हुआ है क्योंकि वह अपनी मूल जड़ों और आध्यात्मिक पहचान से दूर हो चुका है। इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि:

  • समय का सदुपयोग करें: अपने दिनचर्या में कुछ समय ईश्वर स्मरण और आत्ममंथन के लिए अवश्य निकालें।
  • सार्थक रिश्ते और कर्म: अपने परिवार और समाज के प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए निष्काम भाव से कार्य करें।
  • अहंकार का त्याग: यह शरीर और इसकी सुंदरता नश्वर है, अतः इस पर घमंड न करें।
  • दूसरों की भलाई: अपने सामर्थ्य के अनुसार दीन-दुखियों की सेवा करें, क्योंकि यही सच्चे धर्म की पहचान है।

प्रतीक, रूपक एवं साहित्यिक शैली

इस दोहे में 'पात' (पत्ते) और 'डार' (डाल) का सुंदर रूपक (Metaphor) प्रयोग किया गया है। जिस प्रकार पेड़ से गिरा पत्ता कभी हरा नहीं होता और दोबारा डाल पर नहीं टिकता, उसी प्रकार मनुष्य योनि से गिरने के बाद पुनः इसी योनि को प्राप्त करना अत्यंत दुष्कर है। यह लोक-भाषा की सरलता और दार्शनिक गहराई का अद्भुत संगम है, जो बिना किसी क्लिष्ट शब्दावली के सीधे पाठक के हृदय को आंदोलित कर देता है।

दोहा से मिलने वाली प्रमुख सीख

  • मनुष्य योनि बार-बार नहीं मिलती, यह ईश्वरीय कृपा का प्रसाद है।
  • विषय-विकारों और मोह-माया में अपना बहुमूल्य समय नष्ट न करें।
  • नियमित रूप से भगवन्नाम का स्मरण और सत्संग करें।
  • जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है, अतः अच्छे कर्मों को प्राथमिकता दें।
  • दूसरों के प्रति करुणा, प्रेम और सेवा का भाव रखें।
  • अपने भीतर छिपे अहंकार और क्रोध को नियंत्रित करें।
  • संतों और गुरुओं के सानिध्य में ज्ञान प्राप्त करें।

एक नजर में | Quick Summary

विशेषता विवरण
रचना प्रकार धार्मिक दोहा / साखी
मुख्य संत / प्रणेता संत कबीरदास / लोक परंपरा
भाषा संत भाषा / अवधी मिश्रित हिंदी
प्रमुख परंपरा सनातन भक्ति एवं वैराग्य परंपरा
मुख्य विषय मानव जन्म की दुर्लभता और भगवद्भक्ति
प्रमुख संदेश नश्वरता का बोध और समय का सदुपयोग
संबंधित ग्रंथ रामचरितमानस, कबीर बीजक, संत वाणी

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस दोहे का मुख्य अर्थ यह है कि मनुष्य का शरीर अत्यंत सौभाग्य से प्राप्त होता है और यह बार-बार नहीं मिलता। इसलिए इसे केवल सांसारिक उपभोग में गंवाने के बजाय ईश्वर की भक्ति और सत्कर्मों में लगाना चाहिए।

यह दोहा मुख्य रूप से संत कबीर दास जी की साखियों और भारतीय संत परंपरा की उपदेशात्मक वाणियों से लिया गया है। इसी तरह के भाव गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस में भी मिलते हैं।

सनातन ग्रंथों के अनुसार चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद जीव को अत्यंत पुण्य कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य योनि प्राप्त होती है। केवल इसी योनि में जीव को विवेक बुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का अधिकार मिलता है।

इस पंक्ति का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार पेड़ से टूटा हुआ पत्ता दोबारा डाल पर नहीं जुड़ सकता, उसी प्रकार एक बार यह मानव शरीर छूट जाने पर पुनः इस जन्म का मिलना अनिश्चित और अत्यंत कठिन होता है।

यह दोहा हमें समय के सदुपयोग, अहंकार त्यागने और परोपकार करने की प्रेरणा देता है। यह याद दिलाता है कि जीवन अनमोल है और इसे व्यर्थ की चिंताओं या बुराइयों में नष्ट न करें।

हाँ, इस दोहे का मनन करने से मोह-माया के प्रति आसक्ति कम होती है और अंतःकरण में सात्विक वैराग्य तथा भगवान के प्रति प्रेम का भाव जाग्रत होता है।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है— "बड़े भाग्य मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सदग्रंथन्हि गावा॥ साधन धाम मोच्छ द्वार पाई। जेहि न तरइ भव सागर तहि परताइ॥"

नियमित रूप से सत्संग सुनकर, भगवान का नाम जप कर, जरूरतमंदों की सेवा करके और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करके इस दोहे के संदेश को अपने जीवन में उतारा जा सकता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन धर्म की संत परंपरा, वेदान्त दर्शन और लोक-साहित्य के गहरे अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत अर्थ और व्याख्या पाठकों को आध्यात्मिक उन्नति और नैतिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया है कि दी गई जानकारी प्रामाणिक, सरल और जनोपयोगी हो।

स्रोत एवं संदर्भ

  • संत कबीर ग्रन्थवली - कबीर बीजक एवं साखी संग्रह
  • श्रीरामचरितमानस - गोस्वामी तुलसीदास जी (उत्तराखंड / सुंदरकांड प्रसंग)
  • भारतीय सनातन भक्ति परंपरा एवं दार्शनिक ग्रंथ
  • श्रीमद्भागवत पुराण - मानव योनि और मोक्ष मार्ग के संदर्भ

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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