Parvati Stotram

प्राणायाम मन्त्र (Pranayaam Mantra Sanskrit me) - Bhaktilok

98 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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सनातन वैदिक परंपरा में प्राणायाम केवल एक शारीरिक व्यायाम या श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक गहन आध्यात्मिक साधना है जो शरीर, मन और प्राण को परम चेतना से जोड़ती है। संध्यावंदन और दैनिक यज्ञ-अनुष्ठान के समय किया जाने वाला प्राणायाम जब विशिष्ट मंत्रों के साथ संपन्न होता है, तो उसे 'सबाध प्राणायाम' या 'मंत्रसहित प्राणायाम' कहा जाता है। "प्राणायाम मन्त्र (Pranayaam Mantra)" सात व्याहृतियों (भूर्भुवः स्वः आदि), महामंत्र गायत्री मंत्र और गायत्री शिरोमंत्र का एक अत्यंत दिव्य और शक्तिशाली संयोजन है। यह मंत्र साधक के अंतःकरण को शुद्ध करता है, प्राण ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन करता है और मानसिक चंचलता को समाप्त कर समाधि की ओर अग्रसर करता है। इस लेख में हम इस परम पावन प्राणायाम मंत्र के मूल पाठ, शुद्ध उच्चारण, विस्तृत शब्दार्थ, दार्शनिक महत्व और जप की शास्त्रीय विधि का सविस्तार अध्ययन करेंगे।

मूल मंत्र एवं शुद्ध पाठ | Complete Mantra

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्।
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्॥

मंत्र उच्चारण एवं पद-विच्छेद | Mantra Pronunciation

वैदिक मंत्रों के पूर्ण फल की प्राप्ति के लिए उनका शुद्ध उच्चारण अत्यंत आवश्यक है। प्राणायाम मंत्र तीन मुख्य भागों से मिलकर बना है: सप्त व्याहृति, गायत्री मंत्र और गायत्री शिरः। इसका उच्चारण करते समय स्वर और वर्णों की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। नीचे इसका सुगम उच्चारण मार्गदर्शिका दी गई है:

  • सप्त व्याहृति: ॐ भूः (Om Bhuh) | ॐ भुवः (Om Bhuvah) | ॐ स्वः (Om Svah) | ॐ महः (Om Mahah) | ॐ जनः (Om Janah) | ॐ तपः (Om Tapah) | ॐ सत्यम् (Om Satyam)।
  • गायत्री मंत्र: ॐ तत्-सवितुर्-वरेण्यं (Om Tat-Savitur-Varenyam) | भर्गो देवस्य धीमहि (Bhargo Devasya Dhimahi) | धियो यो नः प्रचोदयात् (Dhiyo Yo Nah Prachodayat)।
  • गायत्री शिरः: ॐ आपो ज्योती रसो-ऽमृतं (Om Aapo Jyoti Raso-'mritam) | ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् (Brahma Bhurbhuvah Svarom)।

विस्तृत शब्दार्थ एवं पद-विच्छेद | Word-by-word Meaning

संस्कृत शब्द पद-विच्छेद सरल हिंदी मीनिंग संदर्भगत आध्यात्मिक अर्थ (Contextual Meaning)
ॐ (Om) ओम् प्रणव, परमात्मा का मुख्य नाम सृष्टि का आदिनाद, परब्रह्म का प्रतीक
भूः (Bhuh) भूः पृथ्वी लोक अस्तित्व, भौतिक जगत, मूलाधार चक्र
भुवः (Bhuvah) भुवः अंतरिक्ष लोक प्राण जगत, स्वाधिष्ठान चक्र
स्वः (Svah) स्वः स्वर्ग लोक मनोमय जगत, मणिपुर चक्र
महः (Mahah) महः महर्लोक तेजस्वी लोक, अनाहत चक्र
जनः (Janah) जनः जनलोक सृजन का लोक, विशुद्धि चक्र
तपः (Tapah) तपः तपोलोक तपस्या का लोक, आज्ञा चक्र
सत्यम् (Satyam) सत्यम् सत्यलोक परम सत्य, सहस्रार चक्र
तत् (Tat) तत् उस उस परब्रह्म परमेश्वर का
सवितुः (Savituh) सवितुः सविता का सृष्टिकर्ता, प्रकाशक सूर्य देव का
वरेण्यम् (Varenyam) वरेण्यम् वरण करने योग्य सर्वश्रेष्ठ, पूजनीय, स्वीकार करने योग्य
भर्गः (Bhargah) भर्गः पाप नाशक तेज अज्ञान और अंधकार को मिटाने वाला दिव्य प्रकाश
देवस्य (Devasya) देवस्य देवता का दिव्य गुणों से युक्त परमात्मा का
धीमहि (Dhimahi) धीमहि हम ध्यान करते हैं बुद्धि और हृदय में धारण करते हैं
धियः (Dhiyah) धियः बुद्धियों को हमारी विचारशक्ति और प्रज्ञा को
यः (Yah) यः जो वह परमेश्वर जो सर्वव्यापी है
नः (Nah) नः हमारी हम सभी साधकों की सामूहिक बुद्धि को
प्रचोदयात् (Prachodayat) प्र-चोदयात् प्रेरित करे सत्कर्मों और सन्मार्ग की ओर अग्रसर करे
आपः (Aapah) आपः जल तत्व सर्वव्यापी, जीवनदायी तत्व
ज्योतिः (Jyotih) ज्योतिः प्रकाश ज्ञान का दिव्य प्रकाश, चैतन्य
रसः (Rasah) रसः आनंद रस परमानंद, भक्ति का दिव्य रस
अमृतम् (Amritam) अमृतम् अमरता मृत्युहीनता, मोक्ष स्वरूप
ब्रह्म (Brahma) ब्रह्म परब्रह्म अनंत, असीम, सर्वोपरि सत्ता

सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth

प्राणायाम मंत्र का सामूहिक अर्थ अत्यंत गंभीर और व्यापक है। यह मंत्र साधक को ब्रह्मांड की समस्त शक्तियों और लोकों से जोड़ता है। इसका सरल हिंदी भावार्थ इस प्रकार है:

सप्त व्याहृति का अर्थ: "हम उस परमेश्वर का स्मरण करते हैं जो भूलोक (अस्तित्व), भुवलोक (प्राण), स्वलोक (मन), महर्लोक (तेज), जनलोक (सृजन), तपोलोक (तप) और सत्यलोक (परम सत्य) के रूप में व्याप्त है। ये सातों लोक उसी एक परमात्मा की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं।"

गायत्री मंत्र का अर्थ: "हम सृष्टि के रचयिता, पूजनीय, दिव्य प्रकाश स्वरूप सविता देव के उस परम पावन तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे, हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाए।"

गायत्री शिरोमंत्र का अर्थ: "वह परमात्मा ही जल (सर्वव्यापकता), ज्योति (ज्ञान), रस (परमानंद) और अमृत (अमरता) स्वरूप है। वह परब्रह्म है, जो भूः, भुवः और स्वः तीनों लोकों में व्याप्त है और प्रणव (ॐ) रूप में सर्वत्र गुंजायमान है।"

समग्र भावार्थ: प्राणायाम करते समय जब हम इस मंत्र का मानसिक जप करते हैं, तो हम स्वयं को इस विराट ब्रह्मांड का एक हिस्सा अनुभव करते हैं। हम अपनी श्वास के माध्यम से उस दिव्य प्राण ऊर्जा को भीतर खींचते हैं जो सातों लोकों में व्याप्त है। यह मंत्र हमारे अस्तित्व को भौतिक धरातल से उठाकर आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक ले जाता है, जहां हम अनुभव करते हैं कि हमारे भीतर बहने वाला प्राण और ब्रह्मांड में बहने वाला महाप्राण एक ही हैं।

मंत्र का भाव एवं आध्यात्मिक संदेश | Spiritual Message

प्राणायाम मंत्र का मुख्य आध्यात्मिक संदेश "एकता और शुद्धि" है। यह मंत्र हमें सिखाता है कि हमारी व्यक्तिगत चेतना (व्यष्टि) और समष्टि चेतना (ब्रह्मांड) में कोई भेद नहीं है। जब हम प्राणायाम करते हैं, तो हम केवल ऑक्सीजन का आदान-प्रदान नहीं कर रहे होते, बल्कि हम ब्रह्मांडीय चेतना के साथ संवाद कर रहे होते हैं।

यह मंत्र हमें संदेश देता है कि हमारी बुद्धि का नियंत्रण हमारे अहंकार के हाथ में न होकर उस दिव्य सविता देव (परमात्मा) के हाथ में होना चाहिए। जब हमारी बुद्धि ईश्वर-प्रेरित होती है, तो हमारे जीवन से स्वार्थ, क्रोध, लोभ और मोह का नाश हो जाता है। गायत्री शिरोमंत्र में प्रयुक्त 'अमृत' शब्द हमें याद दिलाता है कि हमारा वास्तविक स्वरूप अविनाशी आत्मा है, न कि यह नश्वर शरीर।

शास्त्रीय संदर्भ, ऋषि, छंद एवं देवता | Scriptural Origin

इस मंत्र का शास्त्रीय आधार अत्यंत सुदृढ़ है। यह वैदिक संहिताओं और उपनिषदों से संकलित है:

  • ग्रंथ संदर्भ: यह मंत्र तैत्तिरीय आरण्यक (10.27) और महानारायण उपनिषद में वर्णित है। संध्यावंदन पद्धति में प्राणायाम के लिए इसी मंत्र को अनिवार्य बताया गया है।
  • ऋषि: इस मंत्र के विभिन्न भागों के ऋषि अलग-अलग हैं। सप्त व्याहृतियों के ऋषि प्रजापति हैं, गायत्री मंत्र के ऋषि विश्वामित्र हैं और शिरोमंत्र के ऋषि प्रजापति हैं।
  • छंद: मुख्य मंत्र का छंद देवी गायत्री है, जो २४ अक्षरों का होता है।
  • देवता: इस मंत्र के अधिष्ठाता देवता सविता (सूर्य देव के अंतर्यामी परब्रह्म), अग्नि, वायु, आदित्य और परमेश्वर हैं।

मंत्र जप विधि, नियम एवं शुभ मुहूर्त | Chanting Method, Rules & Vidhi

प्राणायाम मंत्र का जप सामान्य मंत्रों की तरह बोलकर नहीं किया जाता। इसकी एक विशिष्ट शास्त्रीय विधि है जिसे 'सबाध प्राणायाम' कहा जाता है:

  1. आसन और दिशा: प्रातःकाल पूर्व दिशा की ओर और सायंकाल पश्चिम दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें। सुखासन, सिद्धासन या पद्मासन का प्रयोग करें।
  2. प्राणायाम के तीन चरण:
    • पूरक (श्वास लेना): दाहिने हाथ की अनामिका और कनिष्ठिका उंगली से बाएं नथुने को बंद करें (या प्राणायाम मुद्रा बनाएं) और दाएं नथुने से धीरे-धीरे श्वास अंदर खींचें। इस दौरान मंत्र का एक बार मानसिक जप करें।
    • कुंभक (श्वास रोकना): श्वास को भीतर रोककर रखें (अंतः कुंभक)। इस अवस्था में मंत्र का मन ही मन एकाग्रतापूर्वक जप करें। शास्त्रीय नियम के अनुसार कुंभक के दौरान मंत्र का जप सबसे महत्वपूर्ण है।
    • रेचक (श्वास छोड़ना): अब बाएं नथुने से श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालें। इस दौरान भी मंत्र का मानसिक स्मरण करें।
  3. संख्या और आवृत्ति: दैनिक साधना में कम से कम 3 प्राणायाम अवश्य करने चाहिए। विशेष अनुष्ठान में इसकी संख्या 10, 28 या 108 तक हो सकती है।
  4. शुभ मुहूर्त: ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) और संध्याकाल (सूर्यास्त का समय) प्राणायाम के लिए सर्वोत्तम माने गए हैं। खाली पेट ही प्राणायाम करना चाहिए।

मंत्र का दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व | Philosophical Significance

वैदिक दर्शन के अनुसार, 'प्राण' ही इस सृष्टि का आधार है। प्रश्नोपनिषद में प्राण को ही प्रजापति और परमेश्वर कहा गया है। प्राणायाम मंत्र के माध्यम से हम प्राण के दार्शनिक स्वरूप को समझते हैं।

सप्त व्याहृतियां हमारे शरीर के सात ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) को जाग्रत करती हैं:

व्याहृति संबंधित चक्र आध्यात्मिक स्तर
भूः मूलाधार चक्र भौतिक स्थिरता और अस्तित्व
भुवः स्वाधिष्ठान चक्र प्राणिक ऊर्जा और सृजनात्मकता
स्वः मणिपुर चक्र संकल्प शक्ति और तेज
महः अनाहत चक्र प्रेम, करुणा और अनाहत नाद
जनः विशुद्धि चक्र अभिव्यक्ति और शुद्धि
तपः आज्ञा चक्र ज्ञान, विवेक और अंतर्दृष्टि
सत्यम् सहस्रार चक्र परम चेतना और समाधि

जब साधक प्राणायाम के साथ इस मंत्र का मानसिक उच्चारण करता है, तो उसकी प्राण ऊर्जा मूलाधार से उठकर सहस्रार चक्र की ओर गति करती है। यह कुंडलिनी जागरण का एक अत्यंत सुरक्षित और वैदिक मार्ग है।

मंत्र के आध्यात्मिक लाभ | Spiritual Benefits

नियमित रूप से प्राणायाम मंत्र के साथ साधना करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • चित्त की शुद्धि: संचित पापों और मानसिक विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) का शमन होता है।
  • तेज और ओज की वृद्धि: चेहरे पर दिव्य आभा और शरीर में ओजस्वी ऊर्जा का संचार होता है।
  • एकाग्रता का विकास: मन की चंचलता समाप्त होती है, जिससे ध्यान लगाने में सुगमता होती है।
  • तनाव से मुक्ति: यह मंत्र मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को शांत करता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है।
  • आयु और स्वास्थ्य की रक्षा: प्राणायम से फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है और शरीर के सभी अंगों को प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन मिलती है।

मंत्र का दैनिक जीवन में महत्व | Daily Life Relevance

आज के तनावपूर्ण और भागदौड़ भरे जीवन में प्राणायाम मंत्र संजीवनी के समान है। आधुनिक जीवनशैली में मानसिक अवसाद, चिंता (Anxiety) और अनिद्रा जैसी समस्याएं आम हो चुकी हैं। प्रतिदिन मात्र 10 मिनट इस मंत्र के साथ प्राणायाम करने से मानसिक संतुलन प्राप्त होता है।

विद्यार्थियों के लिए यह मंत्र स्मृति शक्ति और एकाग्रता बढ़ाने का अचूक साधन है। कामकाजी पेशेवरों के लिए यह कार्यक्षमता बढ़ाने और निर्णय लेने की क्षमता को सुदृढ़ करने में सहायक है। यह हमें सिखाता है कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी शांत और केंद्रित रहा जाए।

Quick Information Table | एक नजर में जानकारी

मंत्र का नाम प्राणायाम मन्त्र (Pranayaam Mantra)
मुख्य देवता सविता देव, परब्रह्म परमेश्वर
ऋषि प्रजापति, विश्वामित्र
छंद देवी गायत्री
वेद/स्रोत यजुर्वेद, तैत्तिरीय आरण्यक, महानारायण उपनिषद
जप की विधि प्राणायाम के दौरान मानसिक जप (पूरक, कुंभक, रेचक)
सर्वोत्तम समय ब्रह्ममुहूर्त, प्रातःकाल और सायंकाल (संध्याकाल)
मुख्य उद्देश्य प्राण शुद्धि, मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति, चक्र जागरण

मुख्य आध्यात्मिक संदेश | Key Takeaways

  • प्राणायाम मंत्र केवल श्वास की प्रक्रिया नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ने का महामार्ग है।
  • यह मंत्र सात व्याहृतियों के माध्यम से हमारे शरीर के सातों चक्रों को संतुलित और जाग्रत करता है।
  • गायत्री मंत्र का समावेश हमारी बुद्धि को सन्मार्ग और दिव्य प्रकाश की ओर प्रेरित करता है।
  • शिरोमंत्र हमें हमारे वास्तविक 'अमृत' (अविनाशी आत्मा) स्वरूप का बोध कराता है।
  • दैनिक जीवन में इसका अभ्यास करने से शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

संबंधित मंत्र, श्लोक, स्तोत्र एवं प्रार्थनाएं

प्राणायाम और संध्यावंदन के समय इस मंत्र के साथ अन्य वैदिक मंत्रों का भी पाठ किया जाता है, जो साधना को पूर्णता प्रदान करते हैं। आप हमारे ब्लॉग पर निम्नलिखित दिव्य मंत्रों और स्तोत्रों का भी अध्ययन कर सकते हैं:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्राणायाम मंत्र सात व्याहृतियों, गायत्री मंत्र और गायत्री शिरोमंत्र का एक दिव्य संयोजन है। इसका महत्व यह है कि यह प्राणायाम की शारीरिक क्रिया को एक उच्च आध्यात्मिक साधना में बदल देता है, जिससे प्राण और मन दोनों की शुद्धि होती है।

नहीं, प्राणायाम के दौरान इस मंत्र का उच्चारण हमेशा मानसिक (मन ही मन) करना चाहिए। श्वास खींचते (पूरक), रोकते (कुंभक) और छोड़ते (रेचक) समय मन में इस मंत्र का स्मरण करने का विधान है।

'सप्त व्याहृति' (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) ब्रह्मांड के सात लोकों और हमारे शरीर के सात चक्रों को दर्शाती हैं। इनका जप करने से हमारे भीतर की सुप्त ऊर्जा जाग्रत होती है।

इसका अर्थ है कि वह परब्रह्म ही जल, प्रकाश, रस (आनंद) और अमृत (अमरता) स्वरूप है, जो तीनों लोकों में व्याप्त है। यह हमें ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव कराता है।

इसका अभ्यास प्रातःकाल सूर्योदय के समय (ब्रह्ममुहूर्त) या सायंकाल सूर्यास्त के समय (संध्याकाल) करना सर्वोत्तम माना गया है। इसे हमेशा खाली पेट ही करना चाहिए।

हां, सनातन धर्म के अनुसार कोई भी श्रद्धालु साधक या साधिका श्रद्धा और पवित्रता के साथ प्राणायाम मंत्र का मानसिक जप कर सकते हैं। मानसिक जप के लिए कोई निषेध नहीं है।

मंत्र जप की गति मध्यम और लयबद्ध होनी चाहिए। श्वास लेने (पूरक) में जितना समय लगे, उतने समय में एक बार मंत्र पूरा हो जाना चाहिए। कुंभक के दौरान भी इसी लय को बनाए रखें। जबरदस्ती श्वास रोकने का प्रयास न करें।

हां, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से यह सिद्ध है कि प्राणायाम के साथ मंत्र का जप करने से पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय होता है, जिससे कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर कम होता है और गहरी शांति मिलती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। हमारे वैदिक विद्वानों और संस्कृत विशेषज्ञों की टीम ने तैत्तिरीय आरण्यक, महानारायण उपनिषद और पारंपरिक संध्यावंदन पद्धतियों के मूल ग्रंथों का गहन अध्ययन करके इस सामग्री को संकलित और सत्यापित किया है। इस लेख का उद्देश्य सनातन धर्म के अमूल्य ज्ञान को शुद्धता और प्रामाणिकता के साथ आधुनिक साधकों तक पहुंचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • तैत्तिरीय आरण्यक: प्रपाठक १०, अनुवाक २७ (महानारायण उपनिषद)।
  • प्रश्नोपनिषद: प्राण की महिमा और दार्शनिक विवेचन।
  • संध्यावंदन पद्धति: गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित प्रामाणिक संस्करण।
  • पातंजल योगसूत्र: साधन पाद (प्राणायाम और मानसिक शुद्धि के सूत्र)।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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