Parvati Stotram

दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरीअखियां प्यासी रे लिरिक्स (Darshan Do Ghanshyam Mori ANkhiya Pyasi Re Lyrics ijn Hindi) - Narsi Bhagat Shyam Bhajan - Bhaktilok

98 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अँखियां प्यासी रे - परिचय एवं भक्ति रस

"दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अँखियां प्यासी रे" सनातन भक्ति परंपरा और कृष्ण संकीर्तन का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी, भावपूर्ण और अमर भजन है। ब्रज संस्कृति और भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति में रचे-बसे इस भजन का संबंध संत शिरोमणि नरसी भगत की पावन परंपरा और उनके आराध्य श्याम सुंदर के प्रति अगाध प्रेम से जोड़ा जाता है। जब एक साधक या जीवात्मा का अंतर्मन भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य दर्शन के लिए व्याकुल हो उठता है, तब उसकी विरह वेदना इस भजन के माध्यम से फूट पड़ती है। यह केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि उस परम चेतना के प्रति समर्पण की पराकाष्ठा है जो हर युग में भक्तों के हृदय को झंकृत करती रही है। इस भजन को गाते समय साधक के नेत्रों में अश्रु और हृदय में अनन्य अनुराग स्वतः प्रवाहित होने लगता है। कलयुग के इस भौतिकतावादी युग में जहां मन अशांत रहता है, वहां ऐसे पावन श्याम भजन साधक को आंतरिक शांति और दिव्यता की अनुभूति कराते हैं।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थाई (मखड़ा):

दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अँखियां प्यासी रे,
अँखियां प्यासी रे मनवा प्यासा रे,
दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अँखियां प्यासी रे...

अंतरा 1:

मंदिर के पट खोल पुजारी, दर्शन का दिन आया,
सांवरिया की मूरत देखे, दिल मेरा हरषाया।
तेरे बिना सूनी लागे ब्रज की हर गलियां रे,
दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अँखियां प्यासी रे...

अंतरा 2:

मीराबाई ने विष का प्याला, हँसकर पी लिया,
नरसी की हुंडी के खातिर, तूने रूप लिया।
द्वार तेरे आया जो भी, खाली ना गया रे,
दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अँखियां प्यासी रे...

अंतरा 3:

मुरली की तान सुना जा ओ मेरे बंशीवारे,
तुझको पुकारें देख नयन ये मेरे कुँवारे।
अब तो दरश दिखा जा ओ नंद के लाला रे,
दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अँखियां प्यासी रे...

समापन पंक्ति:

चरणों की धूल दे दो, जीवन सफल बना दो,
हे बांके बिहारी मेरे, अपना मुझे बना लो।
तेरे बिना जीवन सूना, ओ मेरे सांवरे रे,
दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अँखियां प्यासी रे...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन जीवात्मा और परमात्मा के बीच के उस मधुर और पवित्र संबंध को दर्शाता है जिसे भारतीय दर्शन में 'मधुर भाव की भक्ति' कहा गया है। भजन की मुख्य पंक्ति "दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अँखियां प्यासी रे" में 'अँखियां प्यासी' होना इस बात का प्रतीक है कि नेत्रों ने संसार के समस्त दृश्यों को देख लिया है, किंतु जब तक वे अपने आराध्य घनश्याम (कृष्ण) के साक्षात दर्शन नहीं कर लेते, तब तक उनकी तृप्ति असंभव है।

भजन के अंतरा भागों में भक्त अपनी विरह व्यथा का वर्णन करते हुए मंदिर के पट खोलने और सांवरिया की छवि को अपने नयनों में बसाने की प्रार्थना करता है। मीराबाई के विषपान और नरसी मेहता की हुंडी के संदर्भ यह प्रमाणित करते हैं कि भगवान ने हर संकट में अपने भक्तों की रक्षा की है। इसलिए साधक को पूर्ण विश्वास है कि उसके भी पुकारने पर भगवान अवश्य आएंगे। यह भावार्थ मनुष्य को सिखाता है कि सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर यदि प्रभु से प्रेम किया जाए, तो वह निश्चित रूप से अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं। इसके साथ ही आप अन्य लोकप्रिय स्तोत्रों जैसे ओम जय जगदीश हरे आरती का भी स्मरण कर सकते हैं जो संध्या वंदना में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसका सरस और सहज प्रवाह है जो बिना किसी कठिन व्याकरण या शब्दों के सीधे हृदय को स्पर्श करता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपों—मुरलीधर, नंदलाल, सांवरिया और घनश्याम—का स्मरण किया गया है। धार्मिक दृष्टि से संकीर्तन करने से मन का मैल धुलता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। संत परंपरा के अनुसार, जिस भजन में रोदन और पुकार का भाव हो, वह ईश्वर को शीघ्र आकर्षित करता है। इस भजन का नियमित गायन या श्रवण करने से मानसिक तनाव दूर होता है और भक्ति भाव में वृद्धि होती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भजन गायन के लिए कोई निश्चित समय सीमा नहीं होती, क्योंकि प्रेम और भक्ति कभी भी व्यक्त की जा सकती है, फिर भी ब्रह्ममुहूर्त (प्रातःकाल) या संध्यावंदन के समय इसका गायन अत्यंत फलदायी माना गया है।

  • प्रातःकाल पूजा: स्नान के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह के समक्ष दीपक प्रज्वलित कर इस भजन का गान करने से दिनभर सकारात्मकता बनी रहती है।
  • संध्या आरती: संध्या के समय जब मंदिरों और घरों में घंटी-घड़ियाल बजते हैं, तब इस भजन को गाने से मन को असीम शांति मिलती है।
  • सत्संग एवं कीर्तन: एकादशी, जन्माष्टमी या किसी भी धार्मिक उत्सव पर सामूहिक रूप से इस भजन का संकीर्तन करने से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र बिंदु भगवान श्रीकृष्ण हैं, जिन्हें 'घनश्याम' (सांवलिया रूप) के रूप में पुकारा गया है। साथ ही, इस भजन में भक्त कवि नरसी मेहता और मीराबाई जैसी महान विभूतियों का स्मरण किया गया है जिन्होंने अपनी अनन्य भक्ति से भगवान को प्रकट कर लिया था। संत नरसी मेहता का जीवन इस बात का प्रमाण है कि जो व्यक्ति पूर्ण रूप से भगवान पर आश्रित हो जाता है, उसकी हर मनोकामना स्वयं भगवान पूरी करते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

पारंपरिक ब्रज और गुजराती लोक संस्कृति के प्रभाव से उपजे इस भजन की रचना लोक-संस्कृति के संतों और कवियों द्वारा की गई है। नरसी भगत के भजनों की परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए व्याकुलता एक केंद्रीय विषय रही है। कालान्तर में इसे कई लोक कलाकारों और प्रसिद्ध गायकों ने अपनी मधुर आवाज़ में गाकर जन-जन तक पहुँचाया है। यह भजन मौखिक परंपरा से होते हुए आज लिखित और डिजिटल माध्यमों से लाखों भक्तों तक पहुँच चुका है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल हिंदी, ब्रजभाषा और अवधी के मिश्रण से युक्त लोक भाषा है। इसमें वियोग श्रृंगार रस (विप्रलम्भ श्रृंगार) की प्रधानता है। कवियों ने 'अँखियों की प्यास' और 'मनवा की प्यास' जैसे रूपकों का सुंदर प्रयोग करके जीवात्मा की तड़प को बहुत ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। शब्दों की सरलता ही इस काव्य शैली की सबसे बड़ी ताकत है जो अनपढ़ से लेकर विद्वान तक हर किसी की समझ में आसानी से आ जाती है.

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें सिखाता है कि जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं से अधिक महत्वपूर्ण आत्मिक शांति और ईश्वर के प्रति प्रेम है। जिस प्रकार एक प्यासे व्यक्ति को जल के बिना कुछ नहीं सुहाता, उसी प्रकार साधक को भी भगवान के दर्शन के बिना यह संसार सूना प्रतीत होना चाहिए। यह भजन हमें अहंकार त्यागकर शरणागति का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देता है।

शब्द / पदावली सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
घनश्यामनाथ काले बादलों जैसे सुंदर श्रीकृष्ण भगवान का आराध्य रूप जो शीतलता प्रदान करता है
अँखियां प्यासी दर्शन के लिए तरसते नेत्र ज्ञान और भक्ति के चक्षुओं की परम उत्कंठा
पट खोल कपाट खोलना अंतःकरण के द्वार को ज्ञान और प्रेम के लिए खोलना
हुंडी विश्वास का हुक्मनामा भक्त की सच्ची पुकार पर भगवान का संकट हरना

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अँखियां प्यासी रे" - इस पंक्ति में भक्त भगवान से करबद्ध प्रार्थना करता है कि हे सांवरे प्रभु! मेरे ये नेत्र आपके दर्शन के बिना अत्यंत व्याकुल और प्यासे हैं, इन्हें अपनी एक झलक दिखाकर तृप्त कीजिए।

"मंदिर के पट खोल पुजारी, दर्शन का दिन आया" - भक्त मंदिर के पुजारी से अनुरोध करता है कि हे पुजारी! मंदिर के कपाट खोलो, क्योंकि आज मेरे आराध्य के दर्शन का पावन दिन आ पहुँचा है और मेरा हृदय उन्हें देखने के लिए उछल रहा है।

"मीराबाई ने विष का प्याला, हँसकर पी लिया" - यह पंक्ति उस दृढ़ विश्वास को दर्शाती है जो एक सच्चे भक्त को अपने भगवान पर होता है। मीरा ने विष को अमृत मानकर हँसते-हँसते पी लिया क्योंकि उसका मन कृष्णमय था।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को और अधिक प्रगाढ़ करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता और कृष्ण स्तोत्र के निम्नलिखित श्लोकों का स्मरण करना अत्यंत कल्याणकारी होता है:

"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वात्मन मत्मत्परायणः।।"

श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 9, श्लोक 34)
भजन की जानकारी विवरण
भजन का नाम दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अँखियां प्यासी रे
आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण (श्याम सुंदर)
संबंधित संत / परंपरा संत नरसी मेहता एवं मीराबाई भक्ति परंपरा
भाषा सरल हिंदी, ब्रज मिश्रित लोक भाषा
मुख्य भाव विरह, प्रेम, शरणागति और दर्शन की लालसा
उचित अवसर दैनिक पूजा, संकीर्तन, जन्माष्टमी, एकादशी

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन पारंपरिक ब्रज लोक संगीत और संत नरसी मेहता की भक्ति गाथाओं से प्रेरित होकर लोक परंपरा में विकसित हुआ है, जिसे अनेक पीढ़ियों से संतों और गायकों द्वारा गाया जाता रहा है।

इस भजन का मुख्य भाव भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, विरह व्यथा और उनके दिव्य दर्शन की तीव्र लालसा है।

हाँ, इस भजन को दैनिक पूजा के समय, संध्या वंदना के दौरान या एकांत में बैठकर पूरी श्रद्धा और भाव के साथ अकेले या परिवार के साथ गाया जा सकता है।

मीराबाई और नरसी मेहता भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे, जिन्होंने अपने जीवन में अटूट विश्वास के बल पर भगवान की कृपा प्राप्त की थी। उनके उदाहरण यह दर्शाते हैं कि भगवान पुकारने पर अवश्य आते हैं।

श्याम भजन गाने से मन को असीम शांति मिलती है, मानसिक तनाव दूर होता है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भगवान के प्रति भक्ति भाव मजबूत होता है।

निश्चित रूप से, जन्माष्टमी, एकादशी और किसी भी सांस्कृतिक या धार्मिक अनुष्ठान के दौरान इस भजन का गायन अत्यंत उपयुक्त और आनंददायक होता है।

भजन का स्मरण करते समय शुद्ध उच्चारण, एकाग्रता और मन में भगवान के प्रति समर्पण का भाव होना सबसे अधिक आवश्यक है।

हाँ, भक्तिलok पर आपको अच्युतं केशवम, पायोजी मैंने राम रतन धन पायो और अन्य कई प्रसिद्ध श्याम भजन और स्तोत्र मिल जाएंगे।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन भक्ति परंपरा, लोक संस्कृति और पारंपरिक संकीर्तन के ग्रंथों के अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक भजन लिरिक्स, उसका सरल अर्थ और आध्यात्मिक महत्व प्रदान करना है। यह सामग्री पूरी तरह से श्रद्धा और सांस्कृतिक मूल्यों को समर्पित है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - गीताप्रेस गोरखपुर
  • भक्ति पदावली एवं नरसी भगत के पद - प्रामाणिक लोक संकलन
  • सनातन धर्म एवं संकीर्तन परंपरा के ग्रंथ
  • भारतीय संगीत एवं लोक भजनकोष

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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