Parvati Stotram

जयदेव जय मंगल मूर्ति (JAIDEVJAI MANGAL MURTI Lyrics in Hindi) - GANESH AARTI SUKH KARTA DUKH HARTA -

172 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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भगवान श्री गणेश हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य देव हैं। किसी भी शुभ कार्य, पूजा, यज्ञ या अनुष्ठान के प्रारंभ में उनकी आराधना अनिवार्य मानी गई है। "जयदेव जय मंगल मूर्ति" (Jaidev Jai Mangal Murti) आरती, जिसे "सुखकर्ता दुखहर्ता" (Sukh Karta Dukh Harta) के नाम से भी जाना जाता है, भगवान गणेश की सबसे लोकप्रिय, प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी आरतियों में से एक है। इस पावन आरती की रचना 17वीं शताब्दी के महान संत और राष्ट्रगुरु समर्थ रामदास स्वामी जी ने की थी। यह आरती न केवल महाराष्ट्र के गणेशोत्सव का प्राण है, बल्कि पूरे भारत और विश्वभर के सनातनी परिवारों में अत्यंत श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ गाई जाती है। इस व्यापक लेख में हम इस दिव्य आरती के संपूर्ण लिरिक्स, उसके गहरे आध्यात्मिक भावार्थ, कठिन शब्दों के अर्थ, आरती की शास्त्रीय विधि और इसके गायन से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभों का सविस्तार वर्णन करेंगे। आइए, विघ्नहर्ता श्री गणेश के चरणों में अपना ध्यान केंद्रित करते हुए इस पावन यात्रा का आरंभ करें।

सम्पूर्ण आरती पाठ | Complete Aarti Lyrics

॥ श्री गणेश आरती ॥

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची।
नुरवी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झलके माल मुक्ताफळांची॥१॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥ जय देव जय देव॥


रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुमकुमकेशरा।
हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥२॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥ जय देव जय देव॥


लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना।
दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना॥३॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥ जय देव जय देव॥


शेंदूर लाल चढायो अच्छा गजमुखको।
दोंदिल लाल बिराजे सुत गौरीहरको।
हाथ लिए गुड़ लड्डू साईं सुखारको।
महिमा कहे न जाय छबि अनूपमको॥४॥

आरती का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth

संत समर्थ रामदास जी द्वारा रचित इस आरती की प्रत्येक पंक्ति में भगवान गणेश के दिव्य स्वरूप और उनकी असीम कृपा का सुंदर चित्रण किया गया है। यहाँ इसका विस्तृत भावार्थ प्रस्तुत है:

प्रथम चरण: सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची

भावार्थ: भगवान गणेश सुखों को प्रदान करने वाले (सुखकर्ता) और दुखों का हरण करने वाले (दुखहर्ता) हैं। वे जीवन के सभी विघ्नों, बाधाओं और संकटों की खबरों को भी नष्ट कर देते हैं, अर्थात उनके आते ही विघ्न पलायन कर जाते हैं। वे अपने भक्तों पर प्रेम और कृपा की वर्षा करते हैं और उनकी सभी सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करते हैं। उनके संपूर्ण शरीर पर लाल सिंदूर का लेप सुशोभित है, और उनके गले में मोतियों की सुंदर माला चमक रही है।

द्वितीय चरण (ध्रुवपद): जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती

भावार्थ: हे देव! आपकी जय हो, जय हो। हे मंगल के दाता, मंगलमूर्ति! आपके केवल दर्शन मात्र से ही भक्तों के मन की सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। आपके दर्शन से हृदय में शांति और जीवन में शुभता का संचार होता है।

तृतीय चरण: रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा

भावार्थ: हे माता पार्वती के पुत्र (गौरीकुमरा)! आप रत्नों से जड़े हुए सिंहासन या पीठ पर विराजमान हैं। आपके दिव्य शरीर पर चंदन, कुमकुम और केसर का सुगंधित लेप लगा हुआ है। आपके मस्तक पर हीरों से जड़ा हुआ मुकुट अत्यंत सुशोभित हो रहा है। जब आप चलते हैं, तो आपके चरणों में बंधी हुई पैंजनियां और घुंघरू रुणझुण की मधुर ध्वनि करते हैं, जो भक्तों के मन को मोह लेती है।

चतुर्थ चरण: लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना

भावार्थ: आप विशाल पेट वाले (लंबोदर) हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित किए हुए हैं। आप पीले रंग के रेशमी वस्त्र (पीतांबर) धारण करते हैं। आपने अपने उदर पर विशाल सर्प को यज्ञोपवीत या कटिबंध के रूप में धारण किया हुआ है। आपकी सोंड सीधी और सुंदर है, मुख वक्र (वक्रतुंड) है और आप तीन नेत्रों वाले (त्रिनेत्र) हैं। समर्थ रामदास जी कहते हैं कि आपका यह दास (रामदास) अपने घर में आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहा है। हे देवों द्वारा पूजित प्रभु! संकट के समय हमारी सहायता करें और अंतिम समय (निर्वाण काल) में हमारी रक्षा करें।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Words

इस आरती में प्रयुक्त अधिकांश शब्द मराठी और ब्रजभाषा के मिश्रण से बने हैं। इनके अर्थ को समझकर आरती गाने से भक्ति भाव और अधिक प्रगाढ़ हो जाता है:

शब्द (Word) सरल हिंदी अर्थ (Meaning) आध्यात्मिक संदर्भ (Context)
सुखकर्ता सुख देने वाले भगवान गणेश भक्तों को परम आनंद और लौकिक सुख प्रदान करते हैं।
दुखहर्ता दुखों को दूर करने वाले सभी प्रकार के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्टों का निवारण।
वार्ता विघ्नाची विघ्नों की बात या उपस्थिति विघ्नों के अस्तित्व को ही समाप्त कर देने वाले।
नुरवी पूर्वी शेष न रखना और पूर्ण करना दुखों को शेष न रखकर सुखों की वर्षा करना।
शेंदूर (सिंदूर) लाल रंग का चूर्ण ऊर्जा, तेज और मंगल का प्रतीक जो गणेश जी को अति प्रिय है।
गौरीकुमरा माता पार्वती के पुत्र पार्वती नंदन गणेश।
फणिवरबंधना शेषनाग या सर्प को बांधने वाले कुंडलिनी शक्ति और काल पर नियंत्रण का प्रतीक।
निर्वाणी रक्षावे कठिन या अंतिम समय में रक्षा करना संकट काल या मोक्ष के समय जीव का उद्धार करना।
सुरवरवंदना देवताओं द्वारा पूजित इंद्र आदि समस्त देवताओं द्वारा वंदनीय।

आरती में वर्णित देवता की महिमा | Glory of the Deity

भगवान गणेश केवल एक पौराणिक देवता नहीं हैं, बल्कि वे बुद्धि, विवेक, समृद्धि और विघ्न-निवारण के साक्षात प्रतीक हैं। इस आरती में उनके स्वरूप का जो वर्णन है, वह अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक है:

  • लंबोदर (विशाल उदर): यह दर्शाता है कि एक बुद्धिमान व्यक्ति को संसार की सभी अच्छी-बुरी बातों को पचाने की क्षमता रखनी चाहिए।
  • वक्रतुंड (टेढ़ी सोंड): यह कठिन परिस्थितियों में भी मार्ग खोजने और दुष्टों का दमन करने की शक्ति को दर्शाता है।
  • त्रिनेत्र (तीन आंखें): यह भूत, वर्तमान और भविष्य को देखने की दिव्य दृष्टि और ज्ञान चक्षु का प्रतीक है।
  • पीतांबर (पीला वस्त्र): पीला रंग पवित्रता, ज्ञान और मानसिक एकाग्रता का सूचक है।

आरती का धार्मिक महत्व एवं फल | Religious Significance & Traditional Benefits

सनातन परंपरा में आरती को पूजा का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना गया है। "जयदेव जय मंगल मूर्ति" आरती का नियमित पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. विघ्नों का नाश: जीवन में आने वाली सभी बाधाएं, चाहे वे व्यापार में हों, शिक्षा में हों या पारिवारिक जीवन में, स्वतः दूर हो जाती हैं।
  2. मानसिक शांति: इस आरती के मधुर स्वर और लय से मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगों का संचार होता है, जिससे तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है।
  3. ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति: भगवान गणेश के साथ माता लक्ष्मी और सरस्वती की कृपा भी प्राप्त होती है, जिससे घर में धन-धान्य और ज्ञान का वास होता है।
  4. एकाग्रता में वृद्धि: विद्यार्थियों के लिए इस आरती का श्रवण और गायन अत्यंत लाभकारी है, क्योंकि यह बुद्धि के देवता की स्तुति है।

आरती करने की सही विधि एवं थाली सज्जा | Aarti Vidhi & Thali Preparation

आरती को पूर्ण श्रद्धा और शास्त्रीय विधि से करने पर ही उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है। आरती की थाली सजाते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:

सामग्री (Samagri) महत्व और उपयोग (Significance)
तांबे या पीतल की थाली धातु की शुद्धता सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करती है।
घी का दीपक या कपूर अंधकार को दूर करने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए।
कुमकुम और अक्षत थाली के केंद्र में स्वास्तिक बनाने और तिलक लगाने के लिए।
ताजे फूल (विशेषकर लाल) भगवान के चरणों में अर्पित करने के लिए (गुड़हल या गेंदा)।
नैवेद्य (मोदक या लड्डू) भगवान गणेश को भोग लगाने के लिए।

आरती करने का सही समय, दिशा एवं दीप घुमाने की विधि | Best Time & Movement

शास्त्रों के अनुसार, आरती करने की एक निश्चित वैज्ञानिक विधि है जिसका पालन किया जाना चाहिए:

  • सही समय: आरती दिन में दो बार की जानी चाहिए - सुबह सूर्योदय के समय और शाम को सूर्यास्त के बाद (संध्याकाल)।
  • दिशा: आरती करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
  • दीप घुमाने की विधि: दीपक को भगवान की मूर्ति के सामने इस प्रकार घुमाएं कि उससे 'ॐ' की आकृति बने। सबसे पहले भगवान के चरणों की ओर चार बार, नाभि की ओर दो बार, मुखमंडल की ओर एक बार और फिर पूरे शरीर की ओर सात बार गोलाकार घुमाना चाहिए।

आरती के दौरान घंटी, शंख एवं दीप का महत्व | Bell, Conch & Lamp Symbolism

आरती के समय बजने वाली घंटी और शंख की ध्वनि केवल संगीत के लिए नहीं है, बल्कि इनका गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। घंटी की ध्वनि से उत्पन्न कंपन वातावरण से हानिकारक जीवाणुओं और नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करता है। शंख की ध्वनि विजय और शुभता का प्रतीक है, जो फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम मानी गई है। दीपक की लौ हमारे भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश को जगाने का संदेश देती है।

घर में आरती कैसे करें एवं सावधानियां | Home Aarti & Rules

घर के मंदिर में आरती करते समय कुछ विशेष सावधानियां रखनी चाहिए:

  1. आरती हमेशा शांत मन और शुद्ध तन से करें। स्नान के पश्चात ही पूजा स्थल पर बैठें।
  2. आरती गाते समय स्वर में मधुरता और विनम्रता होनी चाहिए, अत्यधिक चिल्लाकर या अशुद्ध उच्चारण के साथ आरती न गाएं।
  3. आरती के समय परिवार के सभी सदस्यों को एकत्रित होना चाहिए, जिससे घर में सामूहिक सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण हो।
  4. अग्नि सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें; दीपक या कपूर को बच्चों की पहुंच से दूर और सुरक्षित स्थान पर रखें।

आरती का आध्यात्मिक संदेश एवं दैनिक जीवन सीख | Spiritual Message & Daily Life

यह आरती हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी बड़ी बाधा (विघ्न) क्यों न आए, यदि हमारे पास बुद्धि और विवेक (गणेश) है, तो हम हर संकट को पार कर सकते हैं। भगवान गणेश का वाहन 'मूषक' (चूहा) यह संदेश देता है कि हमें अपनी चंचल इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। उनका बड़ा मस्तक हमें बड़ा सोचने और संकीर्णता से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है।

एक नजर में आरती की जानकारी | Quick Information Table

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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आरती का नाम जयदेव जय मंगल मूर्ति (सुखकर्ता दुखहर्ता)
मुख्य आराध्य देव भगवान श्री गणेश (विघ्नहर्ता)
रचयिता / कवि समर्थ रामदास स्वामी (17वीं शताब्दी)
मूल भाषा मराठी (हिंदी संकीर्तन के साथ व्यापक रूप से प्रचलित)
मुख्य अवसर गणेश चतुर्थी, संकट चतुर्थी, दैनिक संध्या आरती