राम का सभा में विभीषण को उपदेश
राम एक भव्य सभा में विभीषण को राजधर्म और नीति का उपदेश देते हैं, जिससे वह धर्मपूर्वक लंका का शासन कर सकें।
विवरण
राज्याभिषेक के पश्चात् राम ने एक विशाल सभा बुलाई जिसमें सभी वानर और राक्षस उपस्थित थे। इस सभा में राम ने विभीषण को राजधर्म, नीति, और प्रजापालन के गूढ़ उपदेश दिए। उन्होंने बताया कि एक राजा को कैसे आचरण करना चाहिए, कैसे धर्म का पालन करना चाहिए, और कैसे शत्रुओं से रक्षा करनी चाहिए। राम ने सुग्रीव और अन्य वानरों को भी सम्बोधित किया और उन्हें उनके कर्तव्यों का स्मरण दिलाया। यह सर्ग राम के गहन राजनीतिक ज्ञान और धर्मदर्शन को उजागर करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९९
(राम का सभा में विभीषण को उपदेश)
🔆 प्रस्तावना : विभीषण के राज्याभिषेक के बाद राम ने एक विशाल सभा बुलाकर उन्हें राजधर्म और नीति का उपदेश दिया। यह सर्ग राम के गहन राजनीतिक ज्ञान का परिचायक है।
🏛️ सभा का आयोजन और राम का आरम्भिक उपदेश (श्लोक १-१०)
उवाच विभीषणं प्रेम्णा वाक्यमेतदनुत्तमम् ॥
विभीषण महाबाहो शृणु राजधर्ममुत्तमम् ।
येन शास्त्रेण राज्यं त्वं पालयेथा यथाविधि ॥
धर्मेण पालयेद्राज्यं प्रजाः सर्वाः सुखेन च ।
अधर्मेण तु यो राज्यं करोति स विनश्यति ॥
उवाच राघवो राजा सर्वेषां शृण्वतां तदा ॥
यथा राज्ञा सदा रक्ष्या प्रजा धर्मेण सर्वदा ।
यथा चार्थाश्च धर्माश्च यशश्च सुसमृद्ध्यते ॥
एवं राज्ञः परो धर्मः प्रजापालनमुच्यते ।
न तेन सदृशो धर्मः कश्चिदन्य इह स्मृतः ॥
📜 राजधर्म का विस्तृत विवेचन (श्लोक ११-२०)
एते राज्ञः परा धर्माः सदा पाल्या विशेषतः ॥
न क्रोधेन न मानेन न दम्भेन न मत्सरात् ।
धर्मं त्यजेत राजेन्द्रः सदा धर्मपरो भवेत् ॥
बलवद्भिश्च शत्रुभ्यो रक्षेत्स्वजनमात्मवान् ।
दुर्बलान् पालयेद्यत्नाद्राजा धर्मेण संयुतः ॥
तेषां हितं सदा कुर्याद्राजा धर्मेण नित्यशः ॥
अर्थधर्मौ च युगपत्कामं चैव न हापयेत् ।
सर्वानेतान्यथाशक्ति युञ्ज्याद्राजा विचक्षणः ॥
एवं राज्ञः परो धर्मः प्रोक्तो धर्मविदा पुरा ।
त्वमप्येवं विभीषण धर्मेण पालय प्रजाः ॥
🙏 सभा का समापन और राम का आशीर्वाद (श्लोक २१-३०)
उवाच प्रीतमनसा वाक्यं स्नेहसमन्वितम् ॥
त्वमपि सुग्रीव धर्मेण राज्यं किष्किन्धया सह ।
पालयस्व सदा प्रजाः सुहृदश्चाभिपूजय ॥
मम स्नेहेन ते राज्यं भविष्यति सुखावहम् ।
विभीषणेन सख्यं च कुरु नित्यमसंशयम् ॥
विसर्जयामास तदा सभां सर्वान् नरोत्तमः ॥
ते सर्वे हृष्टमनसो रामस्यानुमते स्थिताः ।
प्रशशंसुर्महात्मानं राघवं सत्यविक्रमम् ॥
इत्येष एकोनशततमः सर्गो युद्धकाण्ड उत्तमः ।
रामोपदेशनिर्देशी श्रोतॄणां हितकारकः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
📚 राजधर्म का सार
राम ने इस सर्ग में राजधर्म का जो उपदेश दिया, वह वाल्मीकि रामायण का एक महत्वपूर्ण नीति-खण्ड है। यह राजा के कर्तव्यों, प्रजापालन, न्याय, और मित्रता के महत्त्व को रेखांकित करता है।