युद्ध काण्ड अध्याय 99

राम का सभा में विभीषण को उपदेश

राम एक भव्य सभा में विभीषण को राजधर्म और नीति का उपदेश देते हैं, जिससे वह धर्मपूर्वक लंका का शासन कर सकें।

विवरण

राज्याभिषेक के पश्चात् राम ने एक विशाल सभा बुलाई जिसमें सभी वानर और राक्षस उपस्थित थे। इस सभा में राम ने विभीषण को राजधर्म, नीति, और प्रजापालन के गूढ़ उपदेश दिए। उन्होंने बताया कि एक राजा को कैसे आचरण करना चाहिए, कैसे धर्म का पालन करना चाहिए, और कैसे शत्रुओं से रक्षा करनी चाहिए। राम ने सुग्रीव और अन्य वानरों को भी सम्बोधित किया और उन्हें उनके कर्तव्यों का स्मरण दिलाया। यह सर्ग राम के गहन राजनीतिक ज्ञान और धर्मदर्शन को उजागर करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९९

(राम का सभा में विभीषण को उपदेश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : विभीषण के राज्याभिषेक के बाद राम ने एक विशाल सभा बुलाकर उन्हें राजधर्म और नीति का उपदेश दिया। यह सर्ग राम के गहन राजनीतिक ज्ञान का परिचायक है।

🏛️ सभा का आयोजन और राम का आरम्भिक उपदेश (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः सभां समावृत्य रामः परमधार्मिकः ।
उवाच विभीषणं प्रेम्णा वाक्यमेतदनुत्तमम् ॥
विभीषण महाबाहो शृणु राजधर्ममुत्तमम् ।
येन शास्त्रेण राज्यं त्वं पालयेथा यथाविधि ॥
धर्मेण पालयेद्राज्यं प्रजाः सर्वाः सुखेन च ।
अधर्मेण तु यो राज्यं करोति स विनश्यति ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; सभाम् = सभा को; समावृत्य = एकत्रित करके; रामः = राम; परमधार्मिकः = परम धार्मिक; उवाच = बोले; विभीषणम् = विभीषण से; प्रेम्णा = प्रेम से; वाक्यम् = वचन; एतत् = यह; अनुत्तमम् = उत्तम; विभीषण = हे विभीषण; महाबाहो = महाबाहु; शृणु = सुनो; राजधर्मम् = राजधर्म; उत्तमम् = उत्तम; येन = जिस; शास्त्रेण = शास्त्र से; राज्यम् = राज्य; त्वम् = तुम; पालयेथाः = पालन करो; यथाविधि = यथाविधि; धर्मेण = धर्म से; पालयेत् = पालन करे; राज्यम् = राज्य; प्रजाः = प्रजा; सर्वाः = सभी; सुखेन = सुख से; च = और; अधर्मेण = अधर्म से; तु = तो; यः = जो; राज्यम् = राज्य; करोति = करता है; सः = वह; विनश्यति = नष्ट हो जाता है।
📖 भावार्थ (200 शब्द): राम ने सभी वानरों और राक्षसों को बुलाकर एक भव्य सभा का आयोजन किया। उन्होंने विभीषण को अपने पास बिठाया और प्रेमपूर्वक उपदेश देना प्रारम्भ किया। राम ने कहा, "हे महाबाहु विभीषण, अब तुम लंका के राजा हो। राजधर्म का पालन करना अत्यन्त कठिन है, परन्तु आवश्यक है। राजा को धर्मपूर्वक राज्य का संचालन करना चाहिए, जिससे सभी प्रजा सुखी रहे। जो राजा अधर्म से राज्य करता है, वह अन्ततः नष्ट हो जाता है। तुम्हें शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए और उनके अनुसार आचरण करना चाहिए। राजा का प्रथम कर्तव्य है प्रजा की रक्षा करना और उन्हें सुख देना।" राम के इन शब्दों ने विभीषण को गम्भीर बना दिया। उन्होंने ध्यानपूर्वक सुना और राम के चरणों में प्रणाम किया।
॥ श्लोक ६-१० ॥
तथा चैव सुग्रीवाय धर्मं राज्यस्य शाश्वतम् ।
उवाच राघवो राजा सर्वेषां शृण्वतां तदा ॥
यथा राज्ञा सदा रक्ष्या प्रजा धर्मेण सर्वदा ।
यथा चार्थाश्च धर्माश्च यशश्च सुसमृद्ध्यते ॥
एवं राज्ञः परो धर्मः प्रजापालनमुच्यते ।
न तेन सदृशो धर्मः कश्चिदन्य इह स्मृतः ॥
🔹 पदच्छेद : तथा = वैसे ही; च = और; एव = ही; सुग्रीवाय = सुग्रीव को; धर्मम् = धर्म; राज्यस्य = राज्य का; शाश्वतम् = शाश्वत; उवाच = बोले; राघवः = राघव; राजा = राजा; सर्वेषाम् = सबके; शृण्वताम् = सुनते हुए; तदा = तब; यथा = जैसे; राज्ञा = राजा द्वारा; सदा = सदा; रक्ष्या = रक्षा करनी चाहिए; प्रजा = प्रजा; धर्मेण = धर्म से; सर्वदा = सदा; यथा = जैसे; च = और; अर्थाः = अर्थ; च = और; धर्माः = धर्म; च = और; यशः = यश; च = और; सुसमृद्ध्यते = अच्छी तरह बढ़ता है; एवम् = इस प्रकार; राज्ञः = राजा का; परः = परम; धर्मः = धर्म; प्रजापालनम् = प्रजापालन; उच्यते = कहा जाता है; न = नहीं; तेन = उसके; सदृशः = समान; धर्मः = धर्म; कश्चित् = कोई; अन्यः = अन्य; इह = इस लोक में; स्मृतः = माना गया।
📖 भावार्थ (200 शब्द): राम ने सुग्रीव की ओर भी देखा और उन्हें भी राजधर्म का उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि राजा का सबसे बड़ा धर्म है प्रजा की रक्षा करना। जब राजा धर्म से प्रजा का पालन करता है, तो उसे अर्थ, धर्म और यश सभी प्राप्त होते हैं। यही राजा का परम धर्म है। इसके समान कोई अन्य धर्म नहीं है। राम ने समझाया कि राजा को सदा न्यायपूर्वक कार्य करना चाहिए और किसी भी प्रजा के साथ अन्याय नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने विभीषण और सुग्रीव दोनों को सलाह दी कि वे आपस में मित्रवत रहें और एक-दूसरे की सहायता करें। सभा में उपस्थित सभी लोगों ने राम के उपदेश को ध्यानपूर्वक सुना और उनकी बुद्धि की प्रशंसा की।

📜 राजधर्म का विस्तृत विवेचन (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
अहिंसा सत्यवचनं दया भूतेष्वपैशुनम् ।
एते राज्ञः परा धर्माः सदा पाल्या विशेषतः ॥
न क्रोधेन न मानेन न दम्भेन न मत्सरात् ।
धर्मं त्यजेत राजेन्द्रः सदा धर्मपरो भवेत् ॥
बलवद्भिश्च शत्रुभ्यो रक्षेत्स्वजनमात्मवान् ।
दुर्बलान् पालयेद्यत्नाद्राजा धर्मेण संयुतः ॥
🔹 पदच्छेद : अहिंसा = अहिंसा; सत्यवचनम् = सत्य बोलना; दया = दया; भूतेषु = प्राणियों में; अपैशुनम् = चुगली न करना; एते = ये; राज्ञः = राजा के; पराः = परम; धर्माः = धर्म; सदा = सदा; पाल्याः = पालन करने योग्य; विशेषतः = विशेष रूप से; न = नहीं; क्रोधेन = क्रोध से; न = नहीं; मानेन = मान से; न = नहीं; दम्भेन = दम्भ से; न = नहीं; मत्सरात् = ईर्ष्या से; धर्मम् = धर्म को; त्यजेत = छोड़े; राजेन्द्रः = राजेन्द्र; सदा = सदा; धर्मपरः = धर्म परायण; भवेत् = हो; बलवद्भिः = बलवानों से; च = और; शत्रुभ्यः = शत्रुओं से; रक्षेत् = रक्षा करे; स्वजनम् = अपने लोगों की; आत्मवान् = बुद्धिमान; दुर्बलान् = दुर्बलों की; पालयेत् = पालन करे; यत्नात् = प्रयत्न से; राजा = राजा; धर्मेण = धर्म से; संयुतः = युक्त।
📖 भावार्थ (200 शब्द): राम ने राजा के अन्य कर्तव्यों का भी वर्णन किया। उन्होंने कहा कि राजा को सदा अहिंसा, सत्य, दया और अपैशुन (चुगली न करना) का पालन करना चाहिए। ये राजा के परम धर्म हैं। राजा को कभी भी क्रोध, मान, दम्भ या ईर्ष्या के वशीभूत होकर धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। उसे सदा धर्मपरायण रहना चाहिए। राजा को बलवान शत्रुओं से अपनी प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। विशेष रूप से दुर्बल और निर्बल लोगों की रक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। राजा को चाहिए कि वह न्यायपूर्वक सबके साथ व्यवहार करे और किसी को भी अन्याय न होने दे। राम के इन उपदेशों ने सभी को प्रभावित किया। विभीषण ने राम से वचन लिया कि वह इन सबका पालन करेगा।
॥ श्लोक १६-२० ॥
मन्त्रिणः सुहृदश्चैव ये चास्यानुचराः सदा ।
तेषां हितं सदा कुर्याद्राजा धर्मेण नित्यशः ॥
अर्थधर्मौ च युगपत्कामं चैव न हापयेत् ।
सर्वानेतान्यथाशक्ति युञ्ज्याद्राजा विचक्षणः ॥
एवं राज्ञः परो धर्मः प्रोक्तो धर्मविदा पुरा ।
त्वमप्येवं विभीषण धर्मेण पालय प्रजाः ॥
🔹 पदच्छेद : मन्त्रिणः = मन्त्री; सुहृदः = मित्र; च = और; एव = ही; ये = जो; च = और; अस्य = इसके; अनुचराः = अनुचर; सदा = सदा; तेषाम् = उनका; हितम् = हित; सदा = सदा; कुर्यात् = करे; राजा = राजा; धर्मेण = धर्म से; नित्यशः = नित्य; अर्थधर्मौ = अर्थ और धर्म; च = और; युगपत् = एक साथ; कामम् = काम; च = और; एव = ही; न = नहीं; हापयेत् = छोड़े; सर्वान् = सबको; एतान् = इनको; यथाशक्ति = यथाशक्ति; युञ्ज्यात् = युक्त करे; राजा = राजा; विचक्षणः = बुद्धिमान; एवम् = इस प्रकार; राज्ञः = राजा का; परः = परम; धर्मः = धर्म; प्रोक्तः = कहा गया; धर्मविदा = धर्मज्ञ द्वारा; पुरा = पहले; त्वम् = तुम; अपि = भी; एवम् = इस प्रकार; विभीषण = हे विभीषण; धर्मेण = धर्म से; पालय = पालन करो; प्रजाः = प्रजा।
📖 भावार्थ (200 शब्द): राम ने आगे कहा कि राजा को अपने मन्त्रियों, मित्रों और अनुचरों का भी सदा हित करना चाहिए। उनके कल्याण के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। राजा को अर्थ, धर्म और काम का समन्वय करना चाहिए, किसी की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। एक बुद्धिमान राजा इन तीनों को यथाशक्ति साधता है। यही राजा का परम धर्म है, जो प्राचीन धर्मवेत्ताओं ने बताया है। राम ने विभीषण से कहा, "हे विभीषण, तुम भी इसी प्रकार धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करो। सदा न्याय मार्ग पर चलो और कभी अधर्म मत करो। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हारा राज्य सुखी और समृद्ध रहे।" विभीषण ने राम के चरणों में प्रणाम किया और उनकी आज्ञा का पालन करने का वचन दिया।

🙏 सभा का समापन और राम का आशीर्वाद (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततः सुग्रीवमामन्त्र्य रामः सत्यपराक्रमः ।
उवाच प्रीतमनसा वाक्यं स्नेहसमन्वितम् ॥
त्वमपि सुग्रीव धर्मेण राज्यं किष्किन्धया सह ।
पालयस्व सदा प्रजाः सुहृदश्चाभिपूजय ॥
मम स्नेहेन ते राज्यं भविष्यति सुखावहम् ।
विभीषणेन सख्यं च कुरु नित्यमसंशयम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; आमन्त्र्य = सम्बोधित करके; रामः = राम; सत्यपराक्रमः = सत्यपराक्रमी; उवाच = बोले; प्रीतमनसा = प्रसन्न मन से; वाक्यम् = वचन; स्नेहसमन्वितम् = स्नेह से युक्त; त्वम् = तुम; अपि = भी; सुग्रीव = हे सुग्रीव; धर्मेण = धर्म से; राज्यम् = राज्य; किष्किन्धया = किष्किन्धा; सह = सहित; पालयस्व = पालन करो; सदा = सदा; प्रजाः = प्रजा; सुहृदः = मित्रों को; च = और; अभिपूजय = सम्मान दो; मम = मेरे; स्नेहेन = स्नेह से; ते = तुम्हारा; राज्यम् = राज्य; भविष्यति = होगा; सुखावहम् = सुखदायी; विभीषणेन = विभीषण के साथ; सख्यम् = मित्रता; च = और; कुरु = करो; नित्यम् = नित्य; असंशयम् = बिना संशय के।
📖 भावार्थ (200 शब्द): राम ने सुग्रीव को भी सम्बोधित किया। उन्होंने कहा, "हे सुग्रीव, तुम भी धर्मपूर्वक किष्किन्धा का राज्य करो। अपनी प्रजा का पालन करो और अपने मित्रों का सम्मान करो। मेरे स्नेह के कारण तुम्हारा राज्य सदा सुखदायी रहेगा। तुम विभीषण के साथ भी मित्रता रखो और उनकी सहायता करो। दोनों राज्यों के बीच मैत्री बनी रहे।" सुग्रीव ने सिर झुकाकर राम की आज्ञा स्वीकार की। उन्होंने विभीषण से हाथ मिलाया और मित्रता का वचन दिया। इस प्रकार राम ने दोनों राजाओं के बीच मैत्री स्थापित कर दी।
॥ श्लोक २६-३० ॥
एवमुक्त्वा महातेजा रामः परमधार्मिकः ।
विसर्जयामास तदा सभां सर्वान् नरोत्तमः ॥
ते सर्वे हृष्टमनसो रामस्यानुमते स्थिताः ।
प्रशशंसुर्महात्मानं राघवं सत्यविक्रमम् ॥
इत्येष एकोनशततमः सर्गो युद्धकाण्ड उत्तमः ।
रामोपदेशनिर्देशी श्रोतॄणां हितकारकः ॥
🔹 पदच्छेद : एवम् = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; महातेजाः = महान तेजस्वी; रामः = राम; परमधार्मिकः = परम धार्मिक; विसर्जयामास = विदा किया; तदा = तब; सभाम् = सभा को; सर्वान् = सभी; नरोत्तमः = नरोत्तम; ते = वे; सर्वे = सभी; हृष्टमनसः = प्रसन्न मन वाले; रामस्य = राम की; अनुमते = आज्ञा में; स्थिताः = स्थित; प्रशशंसुः = प्रशंसा की; महात्मानम् = महात्मा की; राघवम् = राघव की; सत्यविक्रमम् = सत्यविक्रम की; इत्येष = इस प्रकार यह; एकोनशततमः = निन्यानवेवाँ; सर्गः = सर्ग; युद्धकाण्डे = युद्धकाण्ड में; उत्तमः = उत्तम; रामोपदेशनिर्देशी = राम के उपदेश का निर्देश करने वाला; श्रोतॄणाम् = श्रोताओं के लिए; हितकारकः = हितकारी।
📖 भावार्थ (200 शब्द): इस प्रकार राम ने सभा को सम्बोधित किया और सबको उपदेश देने के पश्चात् सभा का समापन किया। सभी वानर और राक्षस राम के वचनों से प्रभावित हुए और प्रसन्न होकर वहाँ से गए। उन्होंने राम की बुद्धि, धर्मपरायणता और सत्यविक्रम की प्रशंसा की। राम ने सबको आशीर्वाद दिया और उनसे कहा कि वे अपने-अपने स्थानों पर जाकर सुखपूर्वक रहें। यह सर्ग राम के राजनीतिक ज्ञान और धर्मदर्शन का अद्भुत उदाहरण है। राम ने जो उपदेश दिए, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। यह सर्ग युद्धकाण्ड के उपसंहार का एक महत्वपूर्ण भाग है, जो राम के आदर्श राजा के रूप में चरित्र को और अधिक उजागर करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

📚 राजधर्म का सार

राम ने इस सर्ग में राजधर्म का जो उपदेश दिया, वह वाल्मीकि रामायण का एक महत्वपूर्ण नीति-खण्ड है। यह राजा के कर्तव्यों, प्रजापालन, न्याय, और मित्रता के महत्त्व को रेखांकित करता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकोनशततमः सर्गः ॥
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