युद्ध काण्ड अध्याय 98

राम द्वारा अंगद, जाम्बवान् आदि का सम्मान

राम अंगद, जाम्बवान्, नल, नील और अन्य प्रमुख वानर योद्धाओं का सम्मान करते हैं और उनके योगदान की सराहना करते हैं।

विवरण

राम ने सुग्रीव, विभीषण और हनुमान का विशेष सम्मान करने के बाद अब अन्य प्रमुख वानर योद्धाओं की ओर ध्यान दिया। उन्होंने अंगद को बुलाया, जो वाली के पुत्र थे और जिन्होंने दूत के रूप में रावण के दरबार में जाकर साहस दिखाया था। जाम्बवान्, जो वानरों के सबसे वृद्ध और बुद्धिमान थे, को भी विशेष रूप से सम्मानित किया गया। नल और नील, जिन्होंने सेतु निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, को भी उपहार दिए गए। इसके अलावा, गज, घोर, मैन्द, द्विविद आदि अन्य वीरों को भी उनके पराक्रम के अनुसार सम्मानित किया गया। यह सर्ग राम की उदारता और प्रत्येक योद्धा के योगदान को स्वीकार करने की भावना को प्रदर्शित करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९८

(राम द्वारा अंगद, जाम्बवान् आदि का सम्मान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टनवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : प्रमुख सहयोगियों के बाद राम ने अन्य वानर वीरों को भी सम्मानित किया। इस सर्ग में अंगद, जाम्बवान्, नल-नील आदि का सत्कार वर्णित है।

🦁 अंगद – वालीनन्दन का सत्कार (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततोऽङ्गदं महातेजा रामः सत्यपराक्रमः ।
आहूय परया प्रीत्या परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥
अङ्गद त्वं महाबाहो वालिपुत्र पराक्रमी ।
त्वया दूत्यं कृतं वीर रावणस्य सभागतः ॥
सीतायाश्च परिज्ञानं त्वयैव सुकृतं महत् ।
युद्धे च विविधा वीरा निहतास्त्वत्पराक्रमात् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; अङ्गदम् = अंगद को; महातेजाः = महान तेजस्वी; रामः = राम; सत्यपराक्रमः = सत्यपराक्रमी; आहूय = बुलाकर; परया = परम; प्रीत्या = प्रीति से; परिष्वज्य = गले लगाकर; इदम् = यह; अब्रवीत् = बोले; अङ्गद = हे अंगद; त्वम् = तुम; महाबाहो = महाबाहु; वालिपुत्र = वाली के पुत्र; पराक्रमी = पराक्रमी; त्वया = तुमने; दूत्यम् = दूत का कार्य; कृतम् = किया; वीर = हे वीर; रावणस्य = रावण के; सभागतः = सभा में जाकर; सीतायाः = सीता का; च = और; परिज्ञानम् = पता लगाना; त्वया = तुमने; एव = ही; सुकृतम् = अच्छी तरह किया; महत् = महान; युद्धे = युद्ध में; च = और; विविधाः = अनेक; वीराः = वीर; निहताः = मारे गए; त्वत्पराक्रमात् = तुम्हारे पराक्रम से।
📖 भावार्थ (200 शब्द): राम ने अंगद को बुलाया और हृदय से लगा लिया। अंगद वाली के पुत्र थे, अत्यन्त वीर और पराक्रमी। राम ने कहा, "हे अंगद, तुमने रावण के दरबार में दूत बनकर जो साहस दिखाया, वह अद्वितीय था। तुमने उसकी सभा में जाकर सीता की खोज का संदेश दिया और उसे युद्ध की चुनौती दी। तुमने ही सीता का पता लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। युद्ध में भी तुमने अनेक राक्षसों का वध किया। तुम्हारा पराक्रम अतुलनीय है।" अंगद ने विनम्रता से राम के चरण स्पर्श किए और कहा, "प्रभु, आपकी सेवा करना मेरा सौभाग्य है। मेरे पिता वाली का वध आपने किया, किन्तु उससे मुझे कोई द्वेष नहीं, क्योंकि वह उसके कर्मों का फल था। आपने मुझे स्नेह दिया, यही मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।" राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया और बहुमूल्य वस्त्र एवं आभूषण भेंट किए।
॥ श्लोक ६-१० ॥
अङ्गदोऽपि तदा रामाद्गृह्य वस्त्राण्यनेकशः ।
प्रणम्य शिरसा रामं स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥
रामोऽपि तं समाश्लिष्य पुनः पुनरुदैक्षत ।
प्रीतिपूर्वं च वाक्यानि व्याजहार महायशाः ॥
त्वं राज्यं कुरु वत्साद्य सुग्रीवानुमतः सदा ।
मम स्नेहाच्च ते राज्यं भविष्यति न संशयः ॥
🔹 पदच्छेद : अङ्गदः = अंगद; अपि = भी; तदा = तब; रामात् = राम से; गृह्य = प्राप्त करके; वस्त्राणि = वस्त्र; अनेकशः = अनेक; प्रणम्य = प्रणाम करके; शिरसा = सिर से; रामम् = राम को; स्थितः = खड़े हुए; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़े; अग्रतः = सामने; रामः = राम; अपि = भी; तम् = उन्हें; समाश्लिष्य = गले लगाकर; पुनः पुनः = बार-बार; उदैक्षत = देखा; प्रीतिपूर्वम् = प्रेमपूर्वक; च = और; वाक्यानि = वचन; व्याजहार = बोले; महायशाः = महायशस्वी; त्वम् = तुम; राज्यम् = राज्य; कुरु = करो; वत्स = हे वत्स; अद्य = आज; सुग्रीवानुमतः = सुग्रीव की आज्ञा से; सदा = सदा; मम = मेरा; स्नेहात् = स्नेह से; च = और; ते = तुम्हारा; राज्यम् = राज्य; भविष्यति = होगा; न = नहीं; संशयः = संशय।
📖 भावार्थ (200 शब्द): अंगद ने राम से वस्त्र और उपहार ग्रहण किए, फिर हाथ जोड़कर सिर झुकाया और राम के सामने खड़े रहे। राम ने उन्हें पुनः गले लगाया और बार-बार उनकी ओर स्नेह से देखा। फिर राम ने कहा, "हे वत्स अंगद, अब तुम सुग्रीव की आज्ञा से राज्य का कार्य करो। मेरे स्नेह के कारण तुम्हारा राज्य सदा सुखपूर्वक चलेगा। तुम युवराज के रूप में किष्किन्धा की शोभा बढ़ाओगे।" राम के इन शब्दों ने अंगद को गौरवान्वित किया। उन्होंने राम से विनती की कि वे कभी-कभी किष्किन्धा आकर उन्हें दर्शन दें। राम ने मुस्कुराकर कहा कि अवश्य आएँगे। अंगद ने राम से आशीर्वाद लिया और सुग्रीव के पास जा बैठे। इस प्रकार राम ने युवा अंगद का भी उचित सम्मान किया, जिससे उनका मनोबल बढ़ा।

🐻 जाम्बवान् – ज्ञानवृद्ध का सत्कार (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो जाम्बवतो वृद्धं रामः सत्यपराक्रमः ।
अभिगम्य महातेजाः प्रणम्येदमुवाच ह ॥
त्वया जाम्बवन् धर्मज्ञ बुद्ध्या च परया युता ।
हनूमान् बोधितः सम्यक् स्वबलं च प्रदर्शितम् ॥
युद्धे च साह्यकरणात् कृतं कार्यं महात्मना ।
त्वदुपदेशतः सर्वं सिद्धिमाप्तमनुत्तमाम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; जाम्बवतः = जाम्बवान् को; वृद्धम् = वृद्ध; रामः = राम; सत्यपराक्रमः = सत्यपराक्रमी; अभिगम्य = पास जाकर; महातेजाः = महान तेजस्वी; प्रणम्य = प्रणाम करके; इदम् = यह; उवाच = बोले; ह = निश्चय ही; त्वया = तुमने; जाम्बवन् = हे जाम्बवान्; धर्मज्ञ = धर्मज्ञ; बुद्ध्या = बुद्धि से; च = और; परया = उत्तम; युता = युक्त; हनूमान् = हनुमान; बोधितः = स्मरण दिलाया; सम्यक् = भली-भाँति; स्वबलम् = अपना बल; च = और; प्रदर्शितम् = प्रदर्शित किया; युद्धे = युद्ध में; च = और; साह्यकरणात् = सहायता करने से; कृतम् = किया; कार्यम् = कार्य; महात्मना = महात्मा ने; त्वदुपदेशतः = तुम्हारे उपदेश से; सर्वम् = सब; सिद्धिम् = सिद्धि; आप्तम् = प्राप्त हुई; अनुत्तमाम् = उत्तम।
📖 भावार्थ (200 शब्द): राम ने जाम्बवान् के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया। जाम्बवान् वानरों में सबसे वृद्ध और बुद्धिमान थे। राम ने कहा, "हे जाम्बवान्, आप धर्म के ज्ञाता हैं और आपकी बुद्धि अद्वितीय है। आपने ही हनुमान को उनकी शक्तियों का स्मरण दिलाया, जिससे वे समुद्र लाँघ सके। युद्ध में आपने लगातार मार्गदर्शन दिया। आपके उपदेशों के कारण ही हम सफल हुए। आपका ज्ञान और अनुभव हमारे लिए अमूल्य रहा।" जाम्बवान् ने विनम्रता से कहा, "हे राम, आप स्वयं भगवान हैं, हम तो केवल आपके आदेश के सेवक हैं। आपकी कृपा से ही हमें यह अवसर मिला।" राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उनके ज्ञान की प्रशंसा की।
॥ श्लोक १६-२० ॥
जाम्बवानपि तद्वाक्यं श्रुत्वा रामस्य धीमतः ।
प्रणम्य शिरसा रामं स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥
रामोऽपि तं समाश्लिष्य ददौ वस्त्राणि भूषणम् ।
यथार्हं च महाबाहुः पूजयामास धर्मवित् ॥
जाम्बवान् प्रीतिमान् भूत्वा रामचन्द्रमपूजयत् ।
आशीर्भिश्च समस्ताभिर्वर्धयामास राघवम् ॥
🔹 पदच्छेद : जाम्बवान् = जाम्बवान्; अपि = भी; तत् = उस; वाक्यम् = वचन को; श्रुत्वा = सुनकर; रामस्य = राम के; धीमतः = बुद्धिमान; प्रणम्य = प्रणाम करके; शिरसा = सिर से; रामम् = राम को; स्थितः = खड़े हुए; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़े; अग्रतः = सामने; रामः = राम; अपि = भी; तम् = उन्हें; समाश्लिष्य = गले लगाकर; ददौ = दिए; वस्त्राणि = वस्त्र; भूषणम् = आभूषण; यथार्हम् = योग्य; च = और; महाबाहुः = महाबाहु; पूजयामास = पूजा की; धर्मवित् = धर्मज्ञ; जाम्बवान् = जाम्बवान्; प्रीतिमान् = प्रसन्न; भूत्वा = होकर; रामचन्द्रम् = रामचन्द्र को; अपूजयत् = पूजा; आशीर्भिः = आशीर्वाद से; च = और; समस्ताभिः = सब प्रकार; वर्धयामास = सराहा; राघवम् = राघव को।
📖 भावार्थ (200 शब्द): जाम्बवान् ने राम के वचन सुने और सिर झुकाकर प्रणाम किया। राम ने उन्हें गले लगाया और उन्हें उत्तम वस्त्र एवं आभूषण भेंट किए। राम ने उनकी योग्यता के अनुसार पूजा की। जाम्बवान् अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने राम की स्तुति की। उन्होंने राम को आशीर्वाद दिया कि वे सदा धर्म की रक्षा करें और उनकी कीर्ति अक्षय रहे। राम ने उनका आदरपूर्वक विदा किया। जाम्बवान् ने राम से प्रार्थना की कि वे सदा उनके भक्त बने रहें। इस प्रकार राम ने वृद्ध जाम्बवान् का भी उचित सम्मान किया, जिससे यह सिद्ध हुआ कि राम के लिए ज्ञान और अनुभव भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि युवा शक्ति।

🛠️ नल-नील एवं अन्य वीरों का सत्कार (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततो नलं च नीलं च रामः सत्यपराक्रमः ।
आहूय परया प्रीत्या वाक्यमेतदुवाच ह ॥
युवाभ्यां सेतुबन्धश्च कृतो येन महोदधौ ।
तेन वानरसेनायाः पारमापादितं महत् ॥
युद्धे च विविधाः शूरा निहताश्च पराक्रमैः ।
तस्मात्प्रीतोऽस्मि वां वीरौ वरं दास्यामि वाञ्छितम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; नलम् = नल को; च = और; नीलम् = नील को; रामः = राम; सत्यपराक्रमः = सत्यपराक्रमी; आहूय = बुलाकर; परया = परम; प्रीत्या = प्रीति से; वाक्यम् = वचन; एतत् = यह; उवाच = बोले; ह = निश्चय ही; युवाभ्याम् = तुम दोनों ने; सेतुबन्धः = सेतु का बन्धन; च = और; कृतः = किया; येन = जिससे; महोदधौ = महासागर में; तेन = उससे; वानरसेनायाः = वानर सेना की; पारम् = पार; आपादितम् = कराया गया; महत् = महान; युद्धे = युद्ध में; च = और; विविधाः = अनेक; शूराः = शूरवीर; निहताः = मारे गए; च = और; पराक्रमैः = पराक्रम से; तस्मात् = इसलिए; प्रीतः = प्रसन्न; अस्मि = हूँ; वाम् = तुम दोनों से; वीरौ = हे वीरों; वरम् = वरदान; दास्यामि = दूँगा; वाञ्छितम् = इच्छित।
📖 भावार्थ (200 शब्द): राम ने नल और नील को बुलाया। ये दोनों वानर सेनापति थे। नल ने अपनी शिल्पकला से समुद्र पर पुल का निर्माण किया था, जिससे वानर सेना लंका पहुँच सकी। नील ने भी युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाया था। राम ने कहा, "हे वीरों, तुम दोनों ने समुद्र पर पुल बनाकर वानर सेना को पार उतारा। यह अद्भुत कार्य था। युद्ध में भी तुमने अनेक शूरवीर राक्षसों का वध किया। मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें कोई भी वरदान देना चाहता हूँ, जो तुम चाहो।" नल और नील ने विनम्रता से कहा, "हे प्रभु, आपकी सेवा करना ही हमारा वरदान है। हम और कुछ नहीं चाहते।" राम ने उन्हें गले लगाया और बहुमूल्य उपहार दिए।
॥ श्लोक २६-३० ॥
ततो गजं घोरं चैव मैन्दं द्विविदमेव च ।
अन्यांश्च वानरवीरान् परिष्वज्य महामतिः ॥
ददौ तेभ्यो यथाशक्ति वासांसि विविधानि च ।
आभूषणानि मुख्यानि मणिरत्नानि भूरिशः ॥
ते सर्वे हृष्टमनसो रामं सत्यपराक्रमम् ।
प्रशशंसुर्महात्मानं प्रणेमुश्च मुदान्विताः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; गजम् = गज को; घोरम् = घोर को; च = और; एव = ही; मैन्दम् = मैन्द को; द्विविदम् = द्विविद को; एव = ही; च = और; अन्यान् = अन्य; च = और; वानरवीरान् = वानर वीरों को; परिष्वज्य = गले लगाकर; महामतिः = महामति राम; ददौ = दिए; तेभ्यः = उनको; यथाशक्ति = यथाशक्ति; वासांसि = वस्त्र; विविधानि = अनेक प्रकार के; च = और; आभूषणानि = आभूषण; मुख्यानि = प्रमुख; मणिरत्नानि = मणि और रत्न; भूरिशः = बहुत सारे; ते = वे; सर्वे = सभी; हृष्टमनसः = प्रसन्न मन वाले; रामम् = राम को; सत्यपराक्रमम् = सत्यपराक्रमी; प्रशशंसुः = प्रशंसा की; महात्मानम् = महात्मा की; प्रणेमुः = प्रणाम किया; च = और; मुदान्विताः = हर्ष से युक्त।
📖 भावार्थ (200 शब्द): इसके बाद राम ने गज, घोर, मैन्द, द्विविद और अन्य सभी वानर वीरों को बुलाया। उन्होंने प्रत्येक को गले लगाया और उनकी शक्ति के अनुसार उन्हें उत्तम वस्त्र, आभूषण, मणि और रत्न भेंट किए। सभी वानर अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने राम की वीरता और उदारता की प्रशंसा की। वे सब राम को प्रणाम करके हर्षित हो गए। राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि वे सदा सुखी रहें। वानरों ने राम से निवेदन किया कि वे उन्हें कभी न भूलें। राम ने वचन दिया कि वह उनके ऋणी हैं और उनकी कीर्ति सदा रहेगी। इस प्रकार राम ने सभी वानर वीरों का यथोचित सम्मान करके उन्हें आनन्दित किया। यह सर्ग राम की उदारता और कृतज्ञता का अद्भुत उदाहरण है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤝 समान भाव से सम्मान

राम ने अंगद, जाम्बवान्, नल-नील और अन्य सभी वानरों को उनके योगदान के अनुसार सम्मान दिया। यह दर्शाता है कि राम के लिए सभी सहयोगी समान रूप से महत्वपूर्ण थे।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे अष्टनवतितमः सर्गः ॥
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