राम द्वारा सुग्रीव, विभीषण और हनुमान् का सम्मान
राम अपने तीन प्रमुर्ण सहयोगियों—सुग्रीव, विभीषण और हनुमान—को विशेष रूप से सम्मानित करते हैं और उन्हें बहुमूल्य उपहार प्रदान करते हैं।
विवरण
पिछले सर्ग में राम ने सभी वानरों और राक्षसों का सामूहिक रूप से सत्कार किया। अब वे अपने तीन सबसे महत्वपूर्ण सहयोगियों—सुग्रीव, विभीषण और हनुमान—को अलग-अलग बुलाकर उनका विशेष सम्मान करते हैं। राम सुग्रीव को राजसी वस्त्र, आभूषण और अनेक बहुमूल्य उपहार देते हैं तथा उनकी मित्रता की प्रशंसा करते हैं। विभीषण को वे लंका के राज्य का आशीर्वाद देते हैं और उन्हें धर्मपूर्वक शासन करने का निर्देश देते हैं। हनुमान को वे अपने हृदय से लगाते हैं और उनके अद्वितीय पराक्रम एवं सेवा के लिए धन्यवाद देते हैं। यह सर्ग राम की गहरी कृतज्ञता और उनके नेतृत्व गुणों को और अधिक स्पष्ट करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९७
(राम द्वारा सुग्रीव, विभीषण और हनुमान् का सम्मान)
🔆 प्रस्तावना : सामूहिक सत्कार के पश्चात् राम अपने तीन प्रमुख सहयोगियों को विशेष रूप से सम्मानित करते हैं। यह सर्ग उनके प्रति राम के गहरे स्नेह और कृतज्ञता को उजागर करता है।
👑 सुग्रीव का राजसी सम्मान (श्लोक १-१०)
उवाच प्रीतमनसा वाक्यं स्नेहसमन्वितम् ॥
त्वया मित्रेण वीरेण साहाय्यं कृतमुत्तमम् ।
राज्यं प्राप्तं च वाली च निहतः सबलानुगः ॥
तव प्रसादात्सम्प्राप्तः सीता च जनकात्मजा ।
तस्मात्त्वं प्रतिगृह्णीष्व वासांसि विविधानि च ॥
प्रणम्य शिरसा रामं स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥
रामोऽपि परमप्रीतः सुग्रीवं परिषस्वजे ।
पुनः पुनः समाश्लिष्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥
गच्छ सुग्रीव मित्र त्वं कीश्किन्धां पालय प्रजाः ।
मम स्नेहेन ते राज्यं सुखं भोक्तुं सदा क्षमम् ॥
🔱 विभीषण को लंका का राज्य और आशीर्वाद (श्लोक ११-२०)
आहूय प्रीतमनसा वाक्यमेतदुवाच ह ॥
त्वया धर्मो महान् रक्षन् रावणं परितत्य वै ।
मामेव शरणं प्राप्तो धर्मज्ञो धर्मवत्सलः ॥
तस्मात्त्वं राक्षसेन्द्रोऽसि लङ्कायाः सुसमृद्धया ।
राज्यं कुरु यथान्यायं ममाज्ञां शिरसा वहन् ॥
प्रणम्य शिरसा रामं स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥
रामोऽपि तं समाश्लिष्य ददौ राज्यं सनातनम् ।
लङ्कायाः सर्वरत्नानि सर्वसम्पदमुत्तमाम् ॥
ततो विभीषणो राजा राममेवान्वपद्यत ।
सर्वकामैः सुपूर्णार्थो राघवस्यानुशासनात् ॥
🙏 हनुमान को हृदय से लगाना (श्लोक २१-३०)
आहूय परया प्रीत्या परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥
हनूमन् मम कार्याणि त्वयैवैकेन साधिताः ।
सीता च त्वत्प्रसादेन लब्धा दुष्प्राप्यराक्षसी ॥
त्वामृते मम कार्याणि कोऽन्यः साधयितुं क्षमः ।
तस्मात्त्वं सर्वथा वन्द्यो मम प्राणैरपि प्रियः ॥
प्रणम्य शिरसा रामं स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥
रामोऽपि तं समाश्लिष्य ददौ हारं महाधनम् ।
यः सीतायाः करे दत्तः पुरा रामेण धीमता ॥
हनूमान् तं गृहीत्वैव रामचन्द्रस्य शासनात् ।
मुमुदे परया प्रीत्या राघवेण समागतः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 राम की कृतज्ञता की पराकाष्ठा
इस सर्ग में राम अपने तीन प्रमुख सहयोगियों को अलग-अलग सम्मान देकर यह दर्शाते हैं कि वे प्रत्येक के योगदान को कितना महत्त्व देते हैं।
💎 हनुमान का आदर्श भक्त
हनुमान को मिला सम्मान यह बताता है कि निस्वार्थ सेवा और भक्ति ही सर्वोच्च पुरस्कार है। राम ने उन्हें अपने हृदय से लगाकर भक्ति के मार्ग को गौरव प्रदान किया।