युद्ध काण्ड अध्याय 97

राम द्वारा सुग्रीव, विभीषण और हनुमान् का सम्मान

राम अपने तीन प्रमुर्ण सहयोगियों—सुग्रीव, विभीषण और हनुमान—को विशेष रूप से सम्मानित करते हैं और उन्हें बहुमूल्य उपहार प्रदान करते हैं।

विवरण

पिछले सर्ग में राम ने सभी वानरों और राक्षसों का सामूहिक रूप से सत्कार किया। अब वे अपने तीन सबसे महत्वपूर्ण सहयोगियों—सुग्रीव, विभीषण और हनुमान—को अलग-अलग बुलाकर उनका विशेष सम्मान करते हैं। राम सुग्रीव को राजसी वस्त्र, आभूषण और अनेक बहुमूल्य उपहार देते हैं तथा उनकी मित्रता की प्रशंसा करते हैं। विभीषण को वे लंका के राज्य का आशीर्वाद देते हैं और उन्हें धर्मपूर्वक शासन करने का निर्देश देते हैं। हनुमान को वे अपने हृदय से लगाते हैं और उनके अद्वितीय पराक्रम एवं सेवा के लिए धन्यवाद देते हैं। यह सर्ग राम की गहरी कृतज्ञता और उनके नेतृत्व गुणों को और अधिक स्पष्ट करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९७

(राम द्वारा सुग्रीव, विभीषण और हनुमान् का सम्मान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तनवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सामूहिक सत्कार के पश्चात् राम अपने तीन प्रमुख सहयोगियों को विशेष रूप से सम्मानित करते हैं। यह सर्ग उनके प्रति राम के गहरे स्नेह और कृतज्ञता को उजागर करता है।

👑 सुग्रीव का राजसी सम्मान (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः सुग्रीवमाहूय रामः परमधार्मिकः ।
उवाच प्रीतमनसा वाक्यं स्नेहसमन्वितम् ॥
त्वया मित्रेण वीरेण साहाय्यं कृतमुत्तमम् ।
राज्यं प्राप्तं च वाली च निहतः सबलानुगः ॥
तव प्रसादात्सम्प्राप्तः सीता च जनकात्मजा ।
तस्मात्त्वं प्रतिगृह्णीष्व वासांसि विविधानि च ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; आहूय = बुलाकर; रामः = राम; परमधार्मिकः = परम धार्मिक; उवाच = बोले; प्रीतमनसा = प्रसन्न मन से; वाक्यम् = वचन; स्नेहसमन्वितम् = स्नेह से युक्त; त्वया = तुमने; मित्रेण = मित्र ने; वीरेण = वीर ने; साहाय्यम् = सहायता; कृतम् = की; उत्तमम् = उत्तम; राज्यम् = राज्य; प्राप्तम् = प्राप्त हुआ; च = और; वाली = वाली; च = भी; निहतः = मारा गया; सबलानुगः = बल और अनुचरों सहित; तव = तुम्हारे; प्रसादात् = प्रसाद से; सम्प्राप्तः = प्राप्त हुई; सीता = सीता; च = और; जनकात्मजा = जनक की पुत्री; तस्मात् = इसलिए; त्वम् = तुम; प्रतिगृह्णीष्व = ग्रहण करो; वासांसि = वस्त्र; विविधानि = अनेक प्रकार के; च = और।
📖 भावार्थ (200 शब्द): राम ने सबसे पहले अपने परम मित्र सुग्रीव को बुलाया। सुग्रीव ने ऋष्यमूक पर्वत पर राम से मित्रता की थी और तब से लेकर अब तक उनका साथ कभी नहीं छोड़ा। राम ने उन्हें स्नेह से देखा और कहा, "हे वीर मित्र सुग्रीव, तुमने जो सहायता की, वह अतुलनीय है। तुम्हारे कारण ही मैंने राज्य प्राप्त किया, वाली का वध हुआ, और सीता का पता लगा। तुम्हारे बिना यह सब असम्भव था। अतः मैं तुम्हें ये बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण भेंट करता हूँ।" राम ने सुग्रीव को दिव्य वस्त्र, हार, कंगन और अन्य आभूषण दिए। सुग्रीव ने विनम्रता से उन्हें स्वीकार किया और राम के चरणों में प्रणाम किया। उसने कहा, "हे प्रभु, आपकी सेवा करना ही मेरा सौभाग्य है। आपने जो दिया है, उससे मैं धन्य हो गया।" राम ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि वह सदा कीश्किन्धा का सुखपूर्वक राज्य करे। इस प्रकार सुग्रीव का विशेष सम्मान हुआ।
॥ श्लोक ६-१० ॥
सुग्रीवोऽपि महातेजा रामाद्गृह्य महाधनम् ।
प्रणम्य शिरसा रामं स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥
रामोऽपि परमप्रीतः सुग्रीवं परिषस्वजे ।
पुनः पुनः समाश्लिष्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥
गच्छ सुग्रीव मित्र त्वं कीश्किन्धां पालय प्रजाः ।
मम स्नेहेन ते राज्यं सुखं भोक्तुं सदा क्षमम् ॥
🔹 पदच्छेद : सुग्रीवः = सुग्रीव; अपि = भी; महातेजाः = महान तेजस्वी; रामात् = राम से; गृह्य = प्राप्त करके; महाधनम् = महान धन; प्रणम्य = प्रणाम करके; शिरसा = सिर से; रामम् = राम को; स्थितः = खड़े हुए; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़े; अग्रतः = सामने; रामः = राम; अपि = भी; परमप्रीतः = अत्यन्त प्रसन्न; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; परिषस्वजे = गले लगाया; पुनः पुनः = बार-बार; समाश्लिष्य = आलिंगन कर; वाक्यम् = वचन; एतत् = यह; उवाच = बोले; ह = निश्चय ही; गच्छ = जाओ; सुग्रीव = हे सुग्रीव; मित्र = मित्र; त्वम् = तुम; कीश्किन्धाम् = किष्किन्धा को; पालय = पालन करो; प्रजाः = प्रजा; मम = मेरे; स्नेहेन = स्नेह से; ते = तुम्हारा; राज्यम् = राज्य; सुखम् = सुखपूर्वक; भोक्तुम् = भोगने के लिए; सदा = सदा; क्षमम् = योग्य।
📖 भावार्थ (200 शब्द): सुग्रीव ने राम से वे बहुमूल्य उपहार प्राप्त किए और फिर हाथ जोड़कर सिर झुकाकर राम को प्रणाम किया। वह राम के सामने खड़ा रहा। राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने सुग्रीव को बार-बार गले लगाया। फिर राम ने कहा, "हे मित्र सुग्रीव, अब तुम किष्किन्धा जाओ और अपनी प्रजा का पालन करो। मेरे स्नेह के कारण तुम्हारा राज्य सदा सुखपूर्वक चलेगा।" राम के इन वचनों ने सुग्रीव के नेत्रों में आँसू ला दिए। वह बोला, "प्रभु, आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। किन्तु आपके बिना मुझे सुख नहीं मिलेगा। आप जब तक लंका में हैं, मैं भी यहीं रहूँगा।" राम ने उसे समझाया कि अब उसे अपने राज्य के कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। अन्ततः सुग्रीव राम की आज्ञा मानकर किष्किन्धा लौटने को तैयार हुआ, किन्तु उसने वचन लिया कि वह राम के बुलावे पर पुनः आएगा। राम ने उसे आशीर्वाद दिया और विदा किया।

🔱 विभीषण को लंका का राज्य और आशीर्वाद (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो विभीषणं राजा रामः सत्यपराक्रमः ।
आहूय प्रीतमनसा वाक्यमेतदुवाच ह ॥
त्वया धर्मो महान् रक्षन् रावणं परितत्य वै ।
मामेव शरणं प्राप्तो धर्मज्ञो धर्मवत्सलः ॥
तस्मात्त्वं राक्षसेन्द्रोऽसि लङ्कायाः सुसमृद्धया ।
राज्यं कुरु यथान्यायं ममाज्ञां शिरसा वहन् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; विभीषणम् = विभीषण को; राजा = राजा; रामः = राम; सत्यपराक्रमः = सत्यपराक्रमी; आहूय = बुलाकर; प्रीतमनसा = प्रसन्न मन से; वाक्यम् = वचन; एतत् = यह; उवाच = बोले; ह = निश्चय ही; त्वया = तुमने; धर्मः = धर्म; महान् = महान; रक्षन् = रक्षा करते हुए; रावणम् = रावण को; परितत्य = छोड़कर; वै = निश्चय ही; माम् = मुझे; एव = ही; शरणम् = शरण में; प्राप्तः = प्राप्त किया; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; धर्मवत्सलः = धर्म पर प्रेम रखने वाले; तस्मात् = इसलिए; त्वम् = तुम; राक्षसेन्द्रः = राक्षसराज; असि = हो; लङ्कायाः = लंका के; सुसमृद्धया = समृद्ध; राज्यम् = राज्य; कुरु = करो; यथान्यायम् = न्यायानुसार; ममाज्ञाम् = मेरी आज्ञा को; शिरसा = सिर पर; वहन् = धारण करते हुए।
📖 भावार्थ (200 शब्द): फिर राम ने विभीषण को बुलाया। विभीषण ने रावण के अत्याचारों से दुःखी होकर धर्म का मार्ग अपनाया था और राम की शरण में आए थे। राम ने उन्हें स्नेह से देखा और कहा, "हे धर्मज्ञ विभीषण, तुमने धर्म की रक्षा के लिए अपने भाई रावण को त्याग दिया और मेरी शरण ली। तुम सच्चे धर्मवत्सल हो। इसलिए मैं तुम्हें लंका का राजा नियुक्त करता हूँ। अब तुम इस समृद्ध लंका का न्यायपूर्वक राज्य करो, और सदा मेरी आज्ञा का पालन करो।" विभीषण यह सुनकर भावुक हो गए। उन्होंने कहा, "हे प्रभु, आपने मुझे यह राज्य देकर मुझे धन्य कर दिया। मैं सदा आपके चरणों का दास बना रहूँगा।" राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि वे धर्म से शासन करें और प्रजा का पालन करें। विभीषण ने राम से वचन लिया कि वे कभी अधर्म नहीं करेंगे।
॥ श्लोक १६-२० ॥
विभीषणोऽपि तद्वाक्यं श्रुत्वा रामस्य धीमतः ।
प्रणम्य शिरसा रामं स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥
रामोऽपि तं समाश्लिष्य ददौ राज्यं सनातनम् ।
लङ्कायाः सर्वरत्नानि सर्वसम्पदमुत्तमाम् ॥
ततो विभीषणो राजा राममेवान्वपद्यत ।
सर्वकामैः सुपूर्णार्थो राघवस्यानुशासनात् ॥
🔹 पदच्छेद : विभीषणः = विभीषण; अपि = भी; तत् = उस; वाक्यम् = वचन को; श्रुत्वा = सुनकर; रामस्य = राम के; धीमतः = धीमान; प्रणम्य = प्रणाम करके; शिरसा = सिर से; रामम् = राम को; स्थितः = खड़े हुए; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़े; अग्रतः = सामने; रामः = राम; अपि = भी; तम् = उन्हें; समाश्लिष्य = गले लगाकर; ददौ = दिया; राज्यम् = राज्य; सनातनम् = शाश्वत; लङ्कायाः = लंका का; सर्वरत्नानि = सभी रत्न; सर्वसम्पदम् = सारी सम्पदा; उत्तमाम् = उत्तम; ततः = तब; विभीषणः = विभीषण; राजा = राजा; रामम् = राम की; एव = ही; अन्वपद्यत = अनुगमन करने लगे; सर्वकामैः = सभी कामनाओं से; सुपूर्णार्थः = पूर्ण अर्थ वाले; राघवस्य = राघव के; अनुशासनात् = आदेश से।
📖 भावार्थ (200 शब्द): राम के वचन सुनकर विभीषण ने उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। राम ने उन्हें गले लगाया और लंका का राज्य, सभी रत्न और सम्पदा उन्हें सौंप दी। उन्होंने विभीषण का राज्याभिषेक कर दिया और अब विभीषण लंका के नरेश बन गए। राम ने उनसे कहा कि वे सदा धर्म पर चलें और प्रजा का पालन करें। विभीषण ने राम की आज्ञा का पालन करने का वचन दिया। अब विभीषण राम के अनुगत होकर राज्य करने लगे। उनकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो गईं। विभीषण ने राम से निवेदन किया कि वे कुछ दिन लंका में रहकर उनका आतिथ्य स्वीकार करें, परन्तु राम ने विनम्रता से कहा कि उन्हें शीघ्र अयोध्या लौटना है। विभीषण ने राम की सेवा में सदा तत्पर रहने की प्रतिज्ञा की।

🙏 हनुमान को हृदय से लगाना (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततो हनूमन्तं वीरं रामः परमधार्मिकः ।
आहूय परया प्रीत्या परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥
हनूमन् मम कार्याणि त्वयैवैकेन साधिताः ।
सीता च त्वत्प्रसादेन लब्धा दुष्प्राप्यराक्षसी ॥
त्वामृते मम कार्याणि कोऽन्यः साधयितुं क्षमः ।
तस्मात्त्वं सर्वथा वन्द्यो मम प्राणैरपि प्रियः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; हनूमन्तम् = हनुमान को; वीरम् = वीर; रामः = राम; परमधार्मिकः = परम धार्मिक; आहूय = बुलाकर; परया = परम; प्रीत्या = प्रीति से; परिष्वज्य = गले लगाकर; इदम् = यह; अब्रवीत् = बोले; हनूमन् = हे हनुमान; मम = मेरे; कार्याणि = कार्य; त्वया = तुमने; एव = ही; एकेन = अकेले; साधिताः = सिद्ध किए; सीता = सीता; च = और; त्वत्प्रसादेन = तुम्हारी कृपा से; लब्धा = प्राप्त हुई; दुष्प्राप्यराक्षसी = दुष्प्राप्य राक्षसी से; त्वाम् = तुमको; ऋते = छोड़कर; मम = मेरे; कार्याणि = कार्य; कः = कौन; अन्यः = अन्य; साधयितुम् = सिद्ध करने को; क्षमः = समर्थ; तस्मात् = इसलिए; त्वम् = तुम; सर्वथा = सब प्रकार; वन्द्यः = वन्दनीय; मम = मेरे; प्राणैः = प्राणों से; अपि = भी; प्रियः = प्रिय।
📖 भावार्थ (200 शब्द): अन्त में राम ने हनुमान को बुलाया। हनुमान विनम्रता से खड़े थे। राम ने उन्हें हृदय से लगा लिया और कहा, "हे हनुमान, तुमने अकेले ही मेरे सारे कार्य सिद्ध कर दिए। तुम्हारे ही प्रयास से सीता का पता लगा, तुमने लंका दहन किया, और राक्षसों का भय समाप्त किया। तुम्हारे बिना यह सब असम्भव था। इसलिए तुम सदा वन्दनीय हो और मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो।" राम के इन वचनों ने हनुमान को अभिभूत कर दिया। वे राम के चरणों में गिर पड़े और बोले, "हे प्रभु, मैं तो केवल आपका दास हूँ। आपकी सेवा करना ही मेरा धर्म है। आपने मुझे इतना सम्मान दिया, मैं धन्य हो गया।" राम ने उन्हें उठाया और फिर से गले लगाया।
॥ श्लोक २६-३० ॥
हनूमानपि तद्वाक्यं श्रुत्वा रामस्य धीमतः ।
प्रणम्य शिरसा रामं स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥
रामोऽपि तं समाश्लिष्य ददौ हारं महाधनम् ।
यः सीतायाः करे दत्तः पुरा रामेण धीमता ॥
हनूमान् तं गृहीत्वैव रामचन्द्रस्य शासनात् ।
मुमुदे परया प्रीत्या राघवेण समागतः ॥
🔹 पदच्छेद : हनूमान् = हनुमान; अपि = भी; तत् = उस; वाक्यम् = वचन को; श्रुत्वा = सुनकर; रामस्य = राम के; धीमतः = बुद्धिमान; प्रणम्य = प्रणाम करके; शिरसा = सिर से; रामम् = राम को; स्थितः = खड़े हुए; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़े; अग्रतः = सामने; रामः = राम; अपि = भी; तम् = उन्हें; समाश्लिष्य = गले लगाकर; ददौ = दिया; हारम् = हार; महाधनम् = महान धन युक्त; यः = जो; सीतायाः = सीता के; करे = हाथ में; दत्तः = दिया गया था; पुरा = पहले; रामेण = राम द्वारा; धीमता = बुद्धिमान; हनूमान् = हनुमान; तम् = उसे; गृहीत्वा = ग्रहण करके; एव = ही; रामचन्द्रस्य = रामचन्द्र की; शासनात् = आज्ञा से; मुमुदे = आनन्दित हुए; परया = परम; प्रीत्या = प्रीति से; राघवेण = राघव के; समागतः = संग मिलकर।
📖 भावार्थ (200 शब्द): हनुमान ने राम के वचन सुनकर उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़े रहे। राम ने उन्हें गले लगाया और फिर अपने गले से एक बहुमूल्य हार उतारकर हनुमान को भेंट किया। वह हार वही था जो पहले राम ने सीता को दिया था। राम ने कहा, "हे हनुमान, यह हार मैं तुम्हें देता हूँ, क्योंकि तुमने सीता को सान्त्वना दी और उनकी रक्षा की।" हनुमान ने उसे विनम्रता से स्वीकार किया। उनके नेत्रों में आनन्द के आँसू थे। उन्होंने राम से प्रार्थना की कि वे सदा उनके चरणों में रहने की कृपा करें। राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि उनकी कीर्ति सदा अक्षय रहेगी। इस प्रकार राम ने हनुमान का अद्वितीय सम्मान किया, जो आगे चलकर भक्ति का आदर्श बना।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राम की कृतज्ञता की पराकाष्ठा

इस सर्ग में राम अपने तीन प्रमुख सहयोगियों को अलग-अलग सम्मान देकर यह दर्शाते हैं कि वे प्रत्येक के योगदान को कितना महत्त्व देते हैं।

💎 हनुमान का आदर्श भक्त

हनुमान को मिला सम्मान यह बताता है कि निस्वार्थ सेवा और भक्ति ही सर्वोच्च पुरस्कार है। राम ने उन्हें अपने हृदय से लगाकर भक्ति के मार्ग को गौरव प्रदान किया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्तनवतितमः सर्गः ॥
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