युद्ध काण्ड अध्याय 96

राम द्वारा वानरों और राक्षसों का सत्कार

रावण के वध के बाद, राम सभी वानरों और राक्षसों का सत्कार करते हैं, उनके योगदान की सराहना करते हैं और उन्हें आशीर्वाद देते हैं।

विवरण

रावण का वध हो जाने के पश्चात्, सम्पूर्ण लंका में हर्ष का वातावरण है। राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ विभीषण के राज्याभिषेक की तैयारी करते हैं। इसी बीच, वे उन सभी वानरों एवं राक्षसों का आदर-सत्कार करते हैं जिन्होंने युद्ध में उनकी सहायता की थी। राम सुग्रीव को गले लगाते हैं और उनकी मित्रता और अटूट समर्थन के लिए धन्यवाद देते हैं। हनुमान को उनके अद्भुत कार्यों के लिए विशेष रूप से सम्मानित किया जाता है। अंगद, जाम्बवान्, नल, नील और अन्य प्रमुख वानर योद्धाओं को भी उनके योगदान के अनुसार उपहार और आशीर्वाद दिए जाते हैं। राम उन राक्षसों का भी स्वागत करते हैं जो विभीषण के साथ उनके पक्ष में आ गए थे। यह सर्ग राम की कृतज्ञता और उदारता को दर्शाता है तथा विजय के पश्चात सभी सहयोगियों के सम्मान का महत्त्व बताता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९६

(राम द्वारा वानरों और राक्षसों का सत्कार)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षण्णवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के वध के पश्चात् राम ने सभी वानरों एवं राक्षसों का अभिनन्दन किया। यह सर्ग राम के आभार प्रदर्शन और उनकी उदार नीति का सुन्दर वर्णन करता है।

🏹 सुग्रीव और हनुमान का विशेष सम्मान (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामो महातेजाः सुग्रीवं परिषस्वजे ।
हनूमन्तं च सम्प्रीत्या वाक्यमेतदुवाच ह ॥
त्वया सुग्रीव मित्रेण यत्कृतं तन्महत्कृतम् ।
सुहृद्भावेन धर्मज्ञ साहाय्यं च कृतं मम ॥
हनूमन् त्वत्कृतेनैव कार्यमेतत्समापितम् ।
लङ्का दग्धा त्वया वीर सीता च परिसान्त्विता ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; परिषस्वजे = गले लगाया; हनूमन्तम् = हनुमान को; च = और; सम्प्रीत्या = अत्यन्त प्रेम से; वाक्यम् = वचन; एतत् = यह; उवाच = बोले; ह = निश्चय ही; त्वया = तुम्हारे द्वारा; सुग्रीव = हे सुग्रीव; मित्रेण = मित्र ने; यत् = जो; कृतम् = किया; तत् = वह; महत्कृतम् = महान कार्य है; सुहृद्भावेन = मित्रभाव से; धर्मज्ञ = हे धर्मज्ञ; साहाय्यम् = सहायता; च = और; कृतम् = की; मम = मेरी; हनूमन् = हे हनुमान; त्वत्कृतेन = आपके द्वारा; एव = ही; कार्यम् = कार्य; एतत् = यह; समापितम् = पूरा हुआ; लङ्का = लंका; दग्धा = जलाई गई; त्वया = आपके द्वारा; वीर = हे वीर; सीता = सीता; च = और; परिसान्त्विता = सांत्वना दी गई।
📖 भावार्थ (200 शब्द): रावण के वध के पश्चात्, राम ने सर्वप्रथम अपने परम मित्र सुग्रीव को हृदय से लगाया। सुग्रीव ने ऋष्यमूक पर्वत पर प्रथम भेंट से लेकर इस युद्ध तक सदैव राम का साथ दिया। उसने अपनी विशाल वानर सेना के साथ न केवल सेतु निर्माण में सहायता की, बल्कि स्वयं अनेक राक्षसों का वध किया। राम ने कहा, "हे सुग्रीव, तुमने जो मित्रता निभाई, वह अतुलनीय है। तुम्हारे बिना यह विजय सम्भव नहीं थी।" फिर राम ने हनुमान की ओर देखा। हनुमान वहीं नम्र भाव से खड़े थे। राम ने उन्हें भी हृदय से लगाया और कहा, "हे वीर हनुमान, तुम्हारे पराक्रम ने ही इस कार्य को सफल बनाया। तुमने लंका का दहन करके राक्षसों के अभिमान को चूर-चूर कर दिया, और सीता को ढूँढ़कर उन्हें सान्त्वना दी। तुम्हारी सेवा और वीरता के लिए मैं सदा ऋणी रहूँगा।" राम के ऐसे वचन सुनकर सुग्रीव और हनुमान दोनों के नेत्र भर आए। इस प्रकार राम ने अपने दो प्रमुख सहायकों का यथोचित सम्मान किया। यह दृश्य देखकर वहाँ उपस्थित सभी वानर और राक्षस भाव-विभोर हो गए।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ततो रामो महातेजा विभीषणमुवाच ह ।
राज्यं तुभ्यं मया दत्तं लङ्कायां राक्षसेश्वर ॥
धर्मेण पालयामासुः प्रजाश्च परिपालय ।
त्वत्प्रसादेन सर्वे हि राक्षसाः सुखिनः सदा ॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा श्रीमान् परमया मुदा ।
अभिषेकं विभीषणस्य चकार विधिवत्तदा ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; विभीषणम् = विभीषण से; उवाच = बोले; ह = निश्चय ही; राज्यम् = राज्य; तुभ्यम् = तुम्हें; मया = मेरे द्वारा; दत्तम् = दिया गया; लङ्कायाम् = लंका में; राक्षसेश्वर = हे राक्षसराज; धर्मेण = धर्म से; पालयामासुः = पालना करो; प्रजाः = प्रजा; च = और; परिपालय = पालन करो; त्वत्प्रसादेन = तुम्हारी कृपा से; सर्वे = सभी; हि = निश्चय ही; राक्षसाः = राक्षस; सुखिनः = सुखी; सदा = सदा; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; राघवः = राघव; राजा = राजा; श्रीमान् = श्रीमान्; परमया = परम; मुदा = हर्ष से; अभिषेकम् = अभिषेक; विभीषणस्य = विभीषण का; चकार = किया; विधिवत् = विधिपूर्वक; तदा = तब।
📖 भावार्थ (200 शब्द): सुग्रीव और हनुमान के बाद, राम ने विभीषण की ओर देखा। विभीषण ने रावण का साथ छोड़कर धर्म का मार्ग अपनाया था और पूरे युद्ध में राम का मार्गदर्शन किया था। राम ने उन्हें अपने पास बुलाकर कहा, "हे राक्षसराज विभीषण, मैंने तुम्हें लंका का राज्य सौंप दिया है। अब तुम इसका धर्मपूर्वक पालन करो और अपनी प्रजा की रक्षा करो। तुम्हारे नेतृत्व में सभी राक्षस सुखी रहेंगे।" यह कहकर राम ने विधिवत् विभीषण का राज्याभिषेक करने का आदेश दिया। लक्ष्मण, सुग्रीव और अन्य सभी लोगों ने मिलकर विभीषण का अभिषेक किया। राम ने स्वयं विभीषण को मुकुट पहनाया और राजसिंहासन पर बैठाया। सभी राक्षसों ने हर्षध्वनि की। विभीषण राम के चरणों में गिर पड़े और बोले, "प्रभु, आपने मुझे यह राज्य देकर न केवल मेरा, बल्कि सम्पूर्ण राक्षस कुल का उद्धार कर दिया है। मैं सदा आपका ऋणी रहूँगा।" राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि वे सदा धर्म पर चलें। यह अभिषेक लंका के इतिहास में एक नए युग का प्रतीक बन गया।

🦍 अंगद, जाम्बवान् और अन्य वानरवीरों का सत्कार (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो रामः सह भ्रात्रा अंगदं परिषस्वजे ।
जाम्बवन्तं च वृद्धं च प्रीतिपूर्वमुवाच ह ॥
अंगद त्वं महाबाहो वालिपुत्र पराक्रमी ।
त्वया युद्धे कृतं कर्म अतिमानुषमद्भुतम् ॥
जाम्बवन् ज्ञानसम्पन्न बुद्ध्या च परया युतः ।
त्वदुपदेशतः सर्वं कार्यं निर्विघ्नमाप्तवान् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; सह = साथ; भ्रात्रा = भाई (लक्ष्मण के); अंगदम् = अंगद को; परिषस्वजे = गले लगाया; जाम्बवन्तम् = जाम्बवान् को; च = और; वृद्धम् = वृद्ध; च = भी; प्रीतिपूर्वम् = प्रेमपूर्वक; उवाच = बोले; ह = निश्चय ही; अंगद = हे अंगद; त्वम् = तुम; महाबाहो = महाबाहु; वालिपुत्र = वाली के पुत्र; पराक्रमी = पराक्रमी; त्वया = तुमने; युद्धे = युद्ध में; कृतम् = किया; कर्म = कार्य; अतिमानुषम् = अलौकिक; अद्भुतम् = अद्भुत; जाम्बवन् = हे जाम्बवान्; ज्ञानसम्पन्न = ज्ञान से सम्पन्न; बुद्ध्या = बुद्धि से; च = और; परया = उत्तम; युतः = युक्त; त्वदुपदेशतः = तुम्हारे उपदेश से; सर्वम् = सब; कार्यम् = कार्य; निर्विघ्नम् = बिना विघ्न के; आप्तवान् = पाया।
📖 भावार्थ (200 शब्द): फिर राम ने अंगद को बुलाया। अंगद वाली का पुत्र था और सुग्रीव का भतीजा। वह अत्यन्त वीर था और उसने रावण के दरबार में जाकर सीता की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। युद्ध में भी उसने अद्भुत पराक्रम दिखाया था। राम ने उसे हृदय से लगाया और कहा, "हे अंगद, तुमने जो पराक्रम दिखाया, वह अतुलनीय है। तुम अपने पिता के समान ही वीर हो।" अंगद राम के चरणों में झुक गया। इसके बाद राम ने जाम्बवान् की ओर देखा। जाम्बवान् वृद्ध थे, लेकिन उनकी बुद्धि और ज्ञान अद्वितीय था। उन्होंने ही हनुमान को उनकी शक्तियों का स्मरण दिलाया था और पूरे युद्ध में राम को सलाह देते रहे थे। राम ने उन्हें प्रणाम किया और कहा, "हे जाम्बवान्, आपके ज्ञान और उपदेशों के कारण ही हम सफल हुए। आपने हमेशा सही मार्गदर्शन दिया। मैं आपका आभारी हूँ।" जाम्बवान् ने राम को आशीर्वाद दिया। इस प्रकार राम ने युवा और वृद्ध सभी का समान रूप से सम्मान किया।
॥ श्लोक १६-२० ॥
नलं नीलं च सेनान्यौ प्रशस्य रघुनन्दनः ।
ददौ ताभ्यां महार्हाणि वासांसि विविधानि च ॥
गजं घोरं च मैन्दं च द्विविदं च महाबलम् ।
परिष्वज्य यथान्यायं प्रीतिमानिदमब्रवीत् ॥
भवद्भिः साह्यकरणात्कृतं कार्यं महात्मभिः ।
राज्यं सुग्रीवलब्धं च भवतां प्रियकाम्यया ॥
🔹 पदच्छेद : नलम् = नल को; नीलम् = नील को; च = और; सेनान्यौ = सेनापतियों को; प्रशस्य = प्रशंसा करके; रघुनन्दनः = रघुनन्दन राम; ददौ = दिए; ताभ्याम् = उन दोनों को; महार्हाणि = अत्यन्त मूल्यवान; वासांसि = वस्त्र; विविधानि = अनेक प्रकार के; च = भी; गजम् = गज को; घोरम् = घोर को; च = और; मैन्दम् = मैन्द को; च = और; द्विविदम् = द्विविद को; च = और; महाबलम् = महाबली; परिष्वज्य = गले लगाकर; यथान्यायम् = न्यायानुसार; प्रीतिमान् = प्रेम से भरे; इदम् = यह; अब्रवीत् = बोले; भवद्भिः = आप सबने; साह्यकरणात् = सहायता करने से; कृतम् = किया; कार्यम् = कार्य; महात्मभिः = महानुभावों ने; राज्यम् = राज्य; सुग्रीवलब्धम् = सुग्रीव को प्राप्त; च = और; भवताम् = आप लोगों की; प्रियकाम्यया = प्रिय की कामना से।
📖 भावार्थ (200 शब्द): इसके पश्चात् राम ने सेनापति नल और नील को बुलाया। नल ने सेतु निर्माण में अपनी कला से समुद्र पर पुल बनाया था, जिससे वानर सेना लंका तक पहुँच सकी। नील ने भी अद्भुत वीरता दिखाई थी। राम ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और उन्हें बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण भेंट किए। फिर राम ने गज, घोर, मैन्द और द्विविद जैसे महाबली वानर योद्धाओं को बुलाया। इन सबने युद्ध में राक्षसों से लोहा लिया था। राम ने उन्हें भी गले लगाया और कहा, "आप सभी महानुभावों ने जो सहायता की, उसी से हम यह विजय प्राप्त कर सके। सुग्रीव को राज्य भी आप सबके प्रयासों से ही मिला है। मैं आप सबका हृदय से आभारी हूँ।" राम के ऐसे उद्गार सुनकर सभी वानर भावुक हो गए। उन्होंने राम को धन्यवाद दिया और कहा कि वे तो केवल राम की आज्ञा का पालन कर रहे थे। राम ने उन्हें आश्वस्त किया कि उनका योगदान सदा स्मरण किया जाएगा।

👹 राक्षस सहयोगियों का सम्मान (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततो राक्षसवीराणां विभीषणपुरस्सरम् ।
सत्कारं परमं कृत्वा वासोभिर्भूषणैस्तथा ॥
उवाच रामः प्रीतात्मा सर्वानेवाभिनन्द्य च ।
भवन्तो यदनुष्ठानं कृतवन्तः सहैव मे ॥
तेनाहं परितुष्टोऽस्मि कृतकृत्योऽस्मि राक्षसाः ।
यूयं सर्वे सदा सौम्या मम प्रियहिते रताः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; राक्षसवीराणाम् = राक्षस वीरों का; विभीषणपुरस्सरम् = विभीषण को आगे करके; सत्कारम् = सत्कार; परमम् = उत्तम; कृत्वा = करके; वासोभिः = वस्त्रों से; भूषणैः = आभूषणों से; तथा = वैसे ही; उवाच = बोले; रामः = राम; प्रीतात्मा = प्रसन्नचित्त; सर्वान् = सभी; एव = ही; अभिनन्द्य = अभिनन्दन कर; च = और; भवन्तः = आप लोग; यत् = जो; अनुष्ठानम् = कार्य; कृतवन्तः = किया; सहैव = साथ ही; मे = मेरे; तेन = उससे; अहम् = मैं; परितुष्टः = सन्तुष्ट; अस्मि = हूँ; कृतकृत्यः = कृतकृत्य; अस्मि = हूँ; राक्षसाः = हे राक्षसों; यूयम् = आप; सर्वे = सभी; सदा = सदा; सौम्याः = सौम्य; मम = मेरे; प्रियहिते = प्रिय और हित में; रताः = तत्पर।
📖 भावार्थ (200 शब्द): वानरों के पश्चात् राम ने उन राक्षसों की ओर ध्यान दिया जिन्होंने विभीषण का अनुसरण करते हुए राम का पक्ष लिया था। ये राक्षस बहुत वीर थे और इन्होंने युद्ध में अपने ही भाइयों के विरुद्ध लड़कर धर्म का साथ दिया था। राम ने उन्हें भी बुलाया और उनका भव्य सत्कार किया। उन्हें उत्तम वस्त्र और आभूषण भेंट किए। फिर राम ने प्रसन्न होकर कहा, "हे राक्षस वीरों, तुम सबने मेरे साथ मिलकर जो यह अद्भुत कार्य किया है, उससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। मैं अपने को कृतकृत्य मानता हूँ कि मुझे आप जैसे धर्मपरायण सहायक मिले। आप सभी सदा मेरे प्रिय और हित में लगे रहेंगे।" राम के इन वचनों ने उन राक्षसों के मन में भक्ति और समर्पण की भावना भर दी। उन्होंने राम को प्रणाम किया और विभीषण के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई। इस प्रकार राम ने सबका समान भाव से सत्कार करके यह सिद्ध कर दिया कि वे सबके प्रिय हैं और उनके हृदय में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है।
॥ श्लोक २६-३० ॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा सर्वानेवान्वमोदत ।
विसर्जयामास तदा स्वं स्वं भवनमागतान् ॥
ते सर्वे हृष्टमनसो रामस्यानुमते स्थिताः ।
प्रशशंसुर्महात्मानं राघवं सत्यविक्रमम् ॥
इत्येष षण्णवतितमः सर्गो युद्धकाण्ड उत्तमः ।
रामसत्कारनिर्देशी श्रोतॄणां सुखदः सदा ॥
🔹 पदच्छेद : इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; राघवः = राघव; राजा = राजा; सर्वान् = सभी को; एव = ही; अन्वमोदत = आनन्दित किया; विसर्जयामास = विदा किया; तदा = तब; स्वम् स्वम् = अपने-अपने; भवनम् = घर को; आगतान् = आए हुए; ते = वे; सर्वे = सभी; हृष्टमनसः = प्रसन्न मन वाले; रामस्य = राम की; अनुमते = आज्ञा में; स्थिताः = स्थित; प्रशशंसुः = प्रशंसा की; महात्मानम् = महात्मा की; राघवम् = राघव की; सत्यविक्रमम् = सत्य पराक्रमी की; इत्येष = इस प्रकार यह; षण्णवतितमः = छियानवेवाँ; सर्गः = सर्ग; युद्धकाण्डे = युद्धकाण्ड में; उत्तमः = उत्तम; रामसत्कारनिर्देशी = राम के सत्कार का निर्देश करने वाला; श्रोतॄणाम् = श्रोताओं के लिए; सुखदः = सुखदायी; सदा = सदा।
📖 भावार्थ (200 शब्द): इस प्रकार राम ने सभी वानरों और राक्षसों का अभिनन्दन करने के पश्चात् उन्हें विदा किया। सभी अपने-अपने स्थानों को लौट गए, किन्तु उनके हृदय में राम के प्रति असीम श्रद्धा और प्रेम था। वे राम की सत्यविक्रम की प्रशंसा करते हुए वहाँ से गए। राम ने सबको आशीर्वाद दिया और कहा कि वे सदा उनके साथ हैं। यह सर्ग राम की उदारता और कृतज्ञता का अद्भुत चित्रण करता है। राम ने यह सिद्ध कर दिया कि एक आदर्श राजा के लिए अपने सहयोगियों का सम्मान करना कितना आवश्यक है। उन्होंने किसी के साथ भेदभाव नहीं किया, चाहे वह वानर हो या राक्षस। इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सफलता में सभी का योगदान होता है और उसे स्वीकार करना चाहिए। राम के इस व्यवहार ने सभी के मन को जीत लिया और वे सदा उनके भक्त बने रहे। यह सर्ग युद्धकाण्ड के मधुर उपसंहार का प्रारम्भ है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राम का नेतृत्व

राम ने अपने सहयोगियों का सत्कार करके एक कुशल नेता का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने सबके योगदान को सराहा और उन्हें सम्मान दिया, जिससे सबका मनोबल बढ़ा।

💡 कृतज्ञता का महत्त्व

यह सर्ग कृतज्ञता के महत्त्व को रेखांकित करता है। राम ने बिना किसी भेदभाव के सभी को धन्यवाद दिया, जो एक आदर्श मानवीय गुण है।

🧠 धर्म की विजय

राक्षसों का सत्कार यह दर्शाता है कि धर्म के मार्ग पर चलने वाला कोई भी प्राणी सम्मान का पात्र है, चाहे वह किसी भी कुल में जन्मा हो।

🌊 आगे की कथा

इस सर्ग के बाद राम विभीषण को उपदेश देंगे और सीता का सम्मान करेंगे, जिससे युद्धकाण्ड का समापन होगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सफलता का श्रेय केवल स्वयं को न देकर अपने साथियों को भी देना चाहिए। राम का यह व्यवहार आज भी प्रासंगिक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षण्णवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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