युद्ध काण्ड अध्याय 95

राम द्वारा सेवकों और मित्रों को उपहार देना

राम अपने सभी सेवकों, मित्रों, और सहयोगियों को उनकी सेवा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए बहुमूल्य उपहार देते हैं।

विवरण

राम ने राज्याभिषेक के बाद उन सभी को याद किया जिन्होंने उनकी सहायता की थी—वानर सेना के प्रमुख, राक्षस जो उनके पक्ष में आए (जैसे विभीषण), अयोध्या के मंत्री, दास-दासियाँ, और अन्य सेवक। उन्होंने सभी को यथोचित धन, रत्न, वस्त्र और आभूषण देकर सम्मानित किया। विशेष रूप से हनुमान, सुग्रीव, अंगद, जाम्बवान, नल-नील आदि को उनके पराक्रम के अनुसार पुरस्कृत किया। विभीषण को विशेष सम्मान मिला। इस सर्ग में राम की उदारता और साम्राज्य के प्रति उनके समावेशी दृष्टिकोण का वर्णन है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९५

(राम द्वारा सेवकों और मित्रों को उपहार देना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चनवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने अपने राज्याभिषेक के बाद उन सभी का आभार प्रकट किया जिन्होंने उनके कार्य में सहयोग किया। यह सर्ग उपहार वितरण और कृतज्ञता का है।

🐵 वानरवीरों को उपहार (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः सुग्रीवमाहूय रामः सत्यपराक्रमः ।
प्रददौ रत्नमुख्यानि वस्त्राणि विविधानि च ॥
हनूमते च रत्नानि मणिमुक्तादि शोभनम् ।
अङ्गदाय च चित्राणि केयूराणि शुभानि च ॥
जाम्बवन्ते च ददौ राजा मणिवरान् बहून् ।
नलनीलादिभ्यश्चैव यथार्हं प्रददौ वसु ॥
📖 भावार्थ : फिर सत्यपराक्रमी राम ने सुग्रीव को बुलाकर उत्तम रत्न और विविध वस्त्र प्रदान किए। हनुमान को मणि-मुक्ता आदि शोभन रत्न दिए। अंगद को चित्र-विचित्र केयूर (बाजूबंद) दिए। राजा ने जाम्बवान को अनेक मणियाँ दीं। नल, नील आदि को यथायोग्य धन दिया। राम ने सभी वानरवीरों के पराक्रम की प्रशंसा की। सुग्रीव को विशेष रूप से सम्मानित किया गया, क्योंकि उन्होंने अपनी वानर सेना के साथ राम की सहायता की थी। हनुमान को उनके अद्वितीय कार्यों के लिए—लंका दहन, सीता की खोज, संजीवनी लाना—विशेष पुरस्कार मिला। अंगद को उनकी वीरता और दूतत्व के लिए सम्मानित किया गया। जाम्बवान ने अपनी बुद्धि से मार्गदर्शन दिया था।

🧝 विभीषण और राक्षस गण (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
विभीषणं च राजानं लङ्कायाः परमार्चितम् ।
रामः परमया प्रीत्या सम्मान्य प्रददौ वसु ॥
राक्षसेभ्यश्च सर्वेभ्यः प्रददौ विविधं धनम् ।
ये रामं शरणं प्राप्ता ये च युद्धेऽन्वपद्यत ॥
ते सर्वे हृष्टमनसः प्राप्य रामप्रसादजम् ।
धनं धान्यं च वस्त्रं च मुदिताः प्रत्यपूजयन् ॥
📖 भावार्थ : राम ने लंका के राजा विभीषण का परम प्रीति से सम्मान किया और उन्हें धन दिया। उन राक्षसों को भी जो राम की शरण में आए थे या युद्ध में साथ दिए थे, विविध धन दिया। वे सब राम के प्रसाद से प्रसन्नचित्त होकर धन, धान्य और वस्त्र पाकर मुदित हुए और राम की पूजा की। विभीषण को राम ने लंका का राज्य सौंपा था और अब उन्हें और भी उपहार दिए। राम ने उनके त्याग और धर्मनिष्ठा की प्रशंसा की। अन्य राक्षसों में जो राम के पक्ष में लड़े, जैसे विभीषण के अनुयायी, उन्हें भी पुरस्कृत किया गया। इससे यह संदेश गया कि राम सभी के प्रति न्यायप्रिय और उदार हैं, चाहे वे किसी भी जाति या समुदाय से हों।

👥 मंत्री, सेवक और प्रजाजन (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः सुमन्त्रं सचिवं वसिष्ठं च महामुनिम् ।
रामः सम्मान्य विधिवत् प्रददौ बहु दक्षिणाम् ॥
दासानां च सहस्राणि दासीनां च शतानि च ।
अलंचकार वस्त्रैश्च भूषणैश्च महाधनैः ॥
प्रजाश्च सर्वाः संहृष्टा रामस्यानुमते तदा ।
लब्ध्वा प्रियं धनं धान्यं पूजयन्ति स्म राघवम् ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने मंत्री सुमंत्र और महामुनि वसिष्ठ का विधिवत सम्मान कर बहुत दक्षिणा दी। हजारों दास और सैकड़ों दासियों को वस्त्र और महाधन भूषणों से अलंकृत किया। राम की आज्ञा से सभी प्रजाजन प्रसन्न हुए और प्रिय धन-धान्य पाकर राघव की पूजा करने लगे। सुमंत्र ने वनवास के समय रथ हाँका था और सदा राम के प्रति निष्ठावान रहे। वसिष्ठ ने सभी धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए। दास-दासियों ने भी राज्याभिषेक और अन्य कार्यों में सेवा की। राम ने किसी को नहीं भुलाया। उन्होंने प्रजा के सभी वर्गों को उपहार देकर यह दिखाया कि एक आदर्श राजा सबका कल्याण चाहता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🎁 उदारता का आदर्श

राम ने सभी सहायकों को उचित सम्मान देकर यह सिद्ध किया कि एक सफल नेता वही है जो अपने साथियों की उपेक्षा न करे।

🤝 समावेशिता

चाहे वानर हों, राक्षस हों या मनुष्य—सभी को राम के राज्य में समान रूप से सम्मान मिला। यही सच्ची समावेशिता है।

🎯 शिक्षा : हमें अपने जीवन में भी उन सभी के प्रति आभार प्रकट करना चाहिए जिन्होंने हमारी सफलता में योगदान दिया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चनवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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