युद्ध काण्ड अध्याय 94

राम द्वारा लक्ष्मण, शत्रुघ्न और सीता का सत्कार

राम अपने भाइयों लक्ष्मण और शत्रुघ्न तथा पत्नी सीता का विशेष सत्कार करते हैं। वे उनके त्याग और समर्पण की प्रशंसा करते हैं।

विवरण

राम ने राज्य स्थापना के बाद अपने अनुजों और सीता के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। लक्ष्मण ने वनवास में उनकी सेवा की थी, शत्रुघ्न ने भी अनेक कष्ट सहे थे, और सीता ने राम के साथ सब दुख सहे। राम ने सभा में सबके सामने उनके गुणों का बखान किया और उन्हें बहुमूल्य उपहार दिए। लक्ष्मण को उन्होंने विशेष आभूषण और वस्त्र प्रदान किए, शत्रुघ्न को भी यथोचित सम्मान मिला, और सीता को नाना प्रकार के रत्न और वस्त्र भेंट किए। इस सर्ग में राम के हृदय की उदारता और पारिवारिक मूल्यों पर प्रकाश पड़ता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९४

(राम द्वारा लक्ष्मण, शत्रुघ्न और सीता का सत्कार)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्नवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम अपने परिजनों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। यह सर्ग उनके स्नेह और उदारता को दर्शाता है।

👏 लक्ष्मण की प्रशंसा और सत्कार (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामः सभामध्ये लक्ष्मणं प्रियदर्शनम् ।
उवाच परमप्रीतः स्नेहेन परवीरहा ॥
त्वया लक्ष्मण धर्मज्ञ वने वन्येन जीवता ।
सुखदुःखसहायेन मया प्राप्तं महद्यशः ॥
इदं ते हेमरत्नाढ्यं केयूरं मणिदंशितम् ।
प्रतीच्छ भ्रातरिष्टं मे धर्मज्ञ वरमुत्तमम् ॥
📖 भावार्थ : फिर राम ने सभा के मध्य में प्रियदर्शन लक्ष्मण को देखकर अत्यंत प्रसन्न होकर स्नेहपूर्वक कहा: "हे धर्मज्ञ लक्ष्मण! वन में वन्य फलों पर जीवन बिताकर तुमने मेरे सुख-दुःख में साथ दिया। तुम्हारे कारण ही मुझे महान यश प्राप्त हुआ। यह सोने और रत्नों से जड़ा केयूर (बाजूबंद) मुझसे ग्रहण करो, हे प्रिय भ्राता, यह मेरी ओर से उत्तम वर है।" राम ने लक्ष्मण के त्याग और सेवा को सबके सामने सराहा। लक्ष्मण ने चौदह वर्षों तक बिना किसी स्वार्थ के राम और सीता की सेवा की थी। राम ने उन्हें बहुमूल्य आभूषण, वस्त्र और भूमि प्रदान की। लक्ष्मण ने विनयपूर्वक उन्हें स्वीकार किया, किंतु उनके मन में राम के प्रति और अधिक भक्ति जाग्रत हुई।

🛡️ शत्रुघ्न का सम्मान (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः शत्रुघ्नमाहूय रामः सत्यपराक्रमः ।
प्रीतिपूर्वमिदं वाक्यमुवाच भरतानुजम् ॥
त्वमपि धर्मनिरतो मम कार्येषु नित्यशः ।
भरतेन सह स्नेहात् पालितं राज्यमुत्तमम् ॥
गृहाणेदं धनं श्रेष्ठं रत्नानि विविधानि च ।
वस्त्राणि च महार्हाणि शत्रुघ्न त्वं मम प्रियः ॥
📖 भावार्थ : तब सत्यपराक्रमी राम ने शत्रुघ्न को बुलाकर प्रीतिपूर्वक कहा: "तुम भी धर्मनिरत हो और सदा मेरे कार्यों में तत्पर रहते हो। भरत के साथ मिलकर तुमने स्नेहपूर्वक इस उत्तम राज्य का पालन किया। यह श्रेष्ठ धन, विविध रत्न और महार्ह वस्त्र ग्रहण करो, हे मेरे प्रिय शत्रुघ्न।" शत्रुघ्न ने भी वनवास काल में अयोध्या की रक्षा और भरत की सहायता की थी। राम ने उनके योगदान को मान्यता दी। शत्रुघ्न को भी उपहार मिले, और उन्होंने राम को प्रणाम कर स्वीकार किया। राम ने यह भी कहा कि शत्रुघ्न की निष्ठा और कर्तव्यपरायणता उनके लिए गौरव की बात है।

👸 सीता का सत्कार (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः सीतां समाहूय रामः प्रियतमां सतीम् ।
उवाच परमप्रीतः स्नेहेन च समन्वितः ॥
त्वया सीते मया सार्धं वने दुःखमनुव्रता ।
तत्सर्वं सफलं मन्ये यत्त्वं प्राप्ता पतिव्रता ॥
इदं रत्नसहस्रं ते वस्त्राणि विविधानि च ।
भूषणानि च सर्वाणि प्रतीच्छ त्वं वरानने ॥
📖 भावार्थ : फिर राम ने अपनी प्रियतमा पतिव्रता सीता को बुलाकर परम प्रीतिपूर्वक कहा: "हे सीते! तुम मेरे साथ वन में दुःख सहने वाली हो। मैं उस सबको सफल मानता हूँ क्योंकि तुम पतिव्रता होकर मुझे प्राप्त हुई। यह हजारों रत्न, विविध वस्त्र और सभी आभूषण ग्रहण करो, हे वरानने।" सीता ने राम का सत्कार विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया। राम ने सीता के समर्पण और कष्टों को याद किया—वनवास, रावण द्वारा हरण, अशोक वाटिका में कष्ट, और अग्निपरीक्षा। उन्होंने सीता को सर्वोच्च स्थान दिया। सीता के लिए विशेष वस्त्र और गहने लाए गए, और दासियों को भी उपहार दिए गए। यह सत्कार राम के हृदय की गहरी कृतज्ञता का प्रतीक था।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💞 कृतज्ञता का भाव

राम ने सार्वजनिक रूप से अपने परिजनों के योगदान को स्वीकार कर एक आदर्श प्रस्तुत किया—हमें अपने करीबियों के त्याग को कभी नहीं भूलना चाहिए।

👨‍👩‍👧‍👦 पारिवारिक मूल्य

यह सर्ग पारिवारिक एकता और प्रेम का उदाहरण है। राम के राज्य में परिवार के सभी सदस्यों को सम्मान मिला।

🎯 शिक्षा : हमें अपने परिवार और मित्रों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए और उनके सहयोग की सराहना करनी चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे चतुर्नवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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