युद्ध काण्ड अध्याय 93

राम द्वारा भरत को युवराज बनाना

राम अपने अनुज भरत को युवराज पद पर नियुक्त करते हैं और उन्हें राज्य का उत्तरदायित्व सौंपते हैं। भरत विनम्रतापूर्वक इसे स्वीकार करते हैं।

विवरण

राम ने सोचा कि राज्य के प्रशासन को और सुदृढ़ करने के लिए एक युवराज की नियुक्ति आवश्यक है। उन्होंने भरत को बुलाकर यह प्रस्ताव रखा। भरत ने पहले विनयपूर्वक मना किया, क्योंकि वे राम को ही सर्वस्व मानते थे। किंतु राम के आग्रह और वसिष्ठ के समझाने पर उन्होंने युवराज पद स्वीकार कर लिया। राम ने विधिवत अभिषेक करवाया और भरत को राज्य के कार्यों में सहयोगी बनाया। यह सर्ग भरत के त्याग और राम के नेतृत्व कौशल को दर्शाता है। भरत ने राम की आज्ञा का पालन करते हुए युवराज का दायित्व संभाला, लेकिन सदा राम को ही राजा मानते रहे।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९३

(राम द्वारा भरत को युवराज बनाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिनवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राज्य के प्रबंधन में सहायता हेतु राम ने भरत को युवराज बनाने का निश्चय किया। भरत की विनय और राम का प्रेम इस सर्ग में देखने को मिलता है।

🤴 युवराज नियुक्ति का प्रस्ताव (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः कालेन महता रामः सत्यपराक्रमः ।
भरतं प्रेषयामास युवराजोऽस्तु मे मतः ॥
स समानीय तं राजा भरतं प्रियदर्शनम् ।
उवाच वचनं धीमान् धर्मार्थसहितं हितम् ॥
त्वं हि मे प्रिय भ्राता च राज्यभारश्च वर्तते ।
युवराजो भवानद्य मम राज्येऽभिषिच्यताम् ॥
📖 भावार्थ : फिर बहुत समय बाद सत्यपराक्रमी राम ने भरत को बुलवाया और कहा कि वे उन्हें युवराज बनाना चाहते हैं। राजा राम ने प्रियदर्शन भरत को बुलाकर धर्म और अर्थयुक्त हितकारी वचन कहे: "तुम मेरे प्रिय भाई हो और राज्य का भार भी तुम पर है। आज से तुम मेरे राज्य में युवराज के रूप में अभिषिक्त होओ।" राम ने यह निर्णय भरत की योग्यता और राज्यहित में लिया। वे जानते थे कि भरत में सभी गुण हैं—विनय, शौर्य, बुद्धि, और धर्मनिष्ठा। भरत ने चौदह वर्षों तक राम की पादुकाएँ सिंहासन पर रखकर शासन किया था, इसलिए वे पहले से ही प्रशासन में निपुण थे। राम ने यह भी सोचा कि राज्य के विस्तार और सुरक्षा के लिए एक सह-शासक होना आवश्यक है।

🙏 भरत का विनय और अस्वीकार (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
तच्छ्रुत्वा भरतो वाक्यं प्राञ्जलिः प्रणतोऽब्रवीत् ।
नार्हस्त्वं मादृशं राजन् युवराजं प्रशासितुम् ॥
त्वमेव राजा धर्मज्ञ त्वमेव गतिरव्ययः ।
पादुकाभ्यां मया राज्यं पालितं त्वत्प्रसादतः ॥
इदानीं त्वयि राजेन्द्रे वर्तमाने महायशः ।
कथं युवराजः स्यामहं त्वत्प्रसादजः ॥
📖 भावार्थ : भरत ने राम के वचन सुनकर हाथ जोड़कर और झुककर कहा: "हे राजन्! आप मुझ जैसे को युवराज बनाने का आदेश न दें। आप ही राजा हैं, आप ही धर्मज्ञ हैं, आप ही अव्यय गति हैं। मैंने आपकी पादुकाओं के द्वारा आपके प्रसाद से राज्य पाला था। अब जब आप स्वयं राज्य कर रहे हैं, महायशस्वी राजेन्द्र, तो मैं आपके प्रसाद से युवराज कैसे बनूँ?" भरत का यह उत्तर उनकी निष्काम भक्ति और त्याग को दर्शाता है। वे राम को ही सर्वस्व मानते थे, उनके सामने किसी पद की इच्छा नहीं थी। उन्होंने चौदह वर्षों तक केवल राम के प्रतिनिधि के रूप में शासन किया था, स्वयं राजा बनने की कभी कामना नहीं की। यह भरत का चरित्र रामायण का सबसे उदात्त चरित्र है।

💬 वसिष्ठ का उपदेश और अभिषेक (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः वसिष्ठः प्रोवाच भरतं प्रियदर्शनम् ।
युवराजो भवान् राज्ञो रामस्यानुमते स्थितः ॥
धर्मो हि महानेष यदाज्ञापयते गुरुः ।
तस्मात् त्वमपि धर्मज्ञ शिरसा तत् समाचर ॥
रामाज्ञया ततो भरतोऽभिषेकं च गृह्यताम् ।
मन्त्रिवृद्धैः समेतैश्च क्रियतां शिरसा स्वयम् ॥
📖 भावार्थ : तब वसिष्ठ ने भरत से कहा: "हे प्रियदर्शन भरत! तुम राम की आज्ञा से युवराज बनो। यह महान धर्म है कि गुरु की आज्ञा का पालन किया जाए। इसलिए तुम धर्मज्ञ हो, उसे शिरोधार्य करो। राम की आज्ञा से अभिषेक ग्रहण करो और मंत्रियों तथा वृद्धजनों के साथ मिलकर उसे संपन्न करो।" वसिष्ठ के उपदेश से भरत समझ गए कि यह राम की इच्छा है और इसे स्वीकार करना उनका कर्तव्य है। तब राम ने विधिवत भरत का अभिषेक किया। सभा में मंगल वाद्य बजे, ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया, और भरत युवराज बने। भरत ने युवराज पद ग्रहण करते हुए भी राम की आज्ञा का पालन करने की प्रतिज्ञा की। उन्होंने राम को सदा राजा माना और स्वयं को सेवक।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙇 भरत का त्याग

भरत का त्याग और राम के प्रति समर्पण अद्वितीय है। वे पद और प्रतिष्ठा से ऊपर उठकर भाईचारे और धर्म को महत्व देते हैं।

🧭 राम का नेतृत्व

राम ने योग्य व्यक्ति को उचित पद देकर अपनी दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। वे सत्ता के केन्द्रीकरण के पक्षधर नहीं थे।

🎯 शिक्षा : हमें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, चाहे वह पद ग्रहण करना हो या त्यागना। गुरु और बड़ों की आज्ञा का पालन धर्म है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे त्रिनवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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