राम का शासन-प्रशासन
राम के राज्याभिषेक के पश्चात वे धर्मपूर्वक राज्य का संचालन करते हैं। वे प्रजा के हित में नीतियाँ बनाते हैं और आदर्श राजा के रूप में शासन करते हैं।
विवरण
राम के राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में रामराज्य की स्थापना हुई। इस सर्ग में राम के शासन और प्रशासन का विस्तृत वर्णन है। राम प्रातःकाल उठकर नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर सभा में जाते थे और प्रजा की समस्याएँ सुनते थे। उन्होंने मंत्रियों और विद्वानों की एक सभा बनाई जो धर्म, अर्थ और नीति में निपुण थे। राम ने राज्य के लिए सात अंगों (स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोश, दुर्ग, राष्ट्र, बल) का पालन किया। वे प्रजा के सुख में अपना सुख मानते थे। उनके शासन में कोई दुःखी नहीं था, कोई कर वसूली से पीड़ित नहीं था, सब धर्मपरायण थे। राम ने न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ किया और अपराधियों को दंड देने में कभी पक्षपात नहीं किया। उन्होंने वर्णाश्रम धर्म की रक्षा की और सभी को उनके कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा दी। इस प्रकार राम का शासन आदर्श शासन का प्रतीक बना।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९१
(राम का शासन-प्रशासन)
🔆 प्रस्तावना : राज्याभिषेक के पश्चात् राम ने अयोध्या की बागडोर संभाली। इस सर्ग में उनके दैनंदिन शासन, नीति-निपुणता और प्रजापालन का वर्णन है।
🏛️ राम की दैनिक दिनचर्या और सभा (श्लोक १-५)
रामः सभां समाविश्य पूजितो मुनिभिस्तदा ॥
वसिष्ठप्रमुखैर्विप्रैः सचिवैश्च समन्वितः ।
शुश्राव प्रार्थितं सर्वं प्रजानां हितकाम्यया ॥
न कश्चिद् दुःखितो लोके न च व्यसनसंयुतः ।
रामे शासति धर्मेण सर्वे धर्मपरायणाः ॥
⚖️ न्याय और दंड नीति (श्लोक ६-१०)
धर्मेण तं विनिश्चित्य रामः शास्ति न संशयः ॥
न मित्रे दण्डमासज्जेन्न द्वेष्ये प्रीतिमाचरेत् ।
समः सर्वेषु भूतेषु रामः शास्ति महीयसीम् ॥
अष्टकाः पञ्चकाश्चैव सभ्याः सदसि संगताः ।
धर्मार्थसहितं वाक्यं ब्रुवते नात्र संशयः ॥
💰 राजकोष और कर नीति (श्लोक ११-१५)
धर्मेण कोशमाहार्षीत् पालयामास च प्रजाः ॥
न कस्यचिद् भयं तत्र न चौरेभ्यो न राष्ट्रतः ।
सर्वे धर्मपरा लोकाः रामे शासति नित्यशः ॥
षड्भागं धर्मतो राजा प्रजाभ्यः प्रतिपद्यते ।
स चापि धर्मतः कोशे रक्ष्यते परिपाल्यते ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 आदर्श राजा
राम ने दिखाया कि एक राजा का कर्तव्य केवल कर वसूलना नहीं, बल्कि प्रजा के सुख-दुःख में भागीदार होना है। उनका जीवन प्रजा के लिए समर्पित था।
💡 धर्म की सर्वोच्चता
राम के शासन में धर्म ही सर्वोच्च था। वे स्वयं धर्म का पालन करते और प्रजा को भी धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते थे।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि शासन का मूल उद्देश्य प्रजा का कल्याण है। राजा को न्यायप्रिय, दयालु और धर्मपरायण होना चाहिए।