युद्ध काण्ड अध्याय 91

राम का शासन-प्रशासन

राम के राज्याभिषेक के पश्चात वे धर्मपूर्वक राज्य का संचालन करते हैं। वे प्रजा के हित में नीतियाँ बनाते हैं और आदर्श राजा के रूप में शासन करते हैं।

विवरण

राम के राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में रामराज्य की स्थापना हुई। इस सर्ग में राम के शासन और प्रशासन का विस्तृत वर्णन है। राम प्रातःकाल उठकर नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर सभा में जाते थे और प्रजा की समस्याएँ सुनते थे। उन्होंने मंत्रियों और विद्वानों की एक सभा बनाई जो धर्म, अर्थ और नीति में निपुण थे। राम ने राज्य के लिए सात अंगों (स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोश, दुर्ग, राष्ट्र, बल) का पालन किया। वे प्रजा के सुख में अपना सुख मानते थे। उनके शासन में कोई दुःखी नहीं था, कोई कर वसूली से पीड़ित नहीं था, सब धर्मपरायण थे। राम ने न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ किया और अपराधियों को दंड देने में कभी पक्षपात नहीं किया। उन्होंने वर्णाश्रम धर्म की रक्षा की और सभी को उनके कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा दी। इस प्रकार राम का शासन आदर्श शासन का प्रतीक बना।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९१

(राम का शासन-प्रशासन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथैकनवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राज्याभिषेक के पश्चात् राम ने अयोध्या की बागडोर संभाली। इस सर्ग में उनके दैनंदिन शासन, नीति-निपुणता और प्रजापालन का वर्णन है।

🏛️ राम की दैनिक दिनचर्या और सभा (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः प्रभाते विमले कृतकौतुकमङ्गलः ।
रामः सभां समाविश्य पूजितो मुनिभिस्तदा ॥
वसिष्ठप्रमुखैर्विप्रैः सचिवैश्च समन्वितः ।
शुश्राव प्रार्थितं सर्वं प्रजानां हितकाम्यया ॥
न कश्चिद् दुःखितो लोके न च व्यसनसंयुतः ।
रामे शासति धर्मेण सर्वे धर्मपरायणाः ॥
📖 भावार्थ : प्रातःकाल जब दिन निकला, राम ने मंगल कार्य करके सभा में प्रवेश किया। वहाँ वसिष्ठ आदि मुनियों और मंत्रियों से घिरे, उन्होंने प्रजा की सभी याचनाएँ सुनीं और उनके हित की कामना से उचित निर्णय लिए। राम के धर्मपूर्वक शासन करने पर संसार में कोई दुःखी नहीं था, न ही कोई व्यसनों में फँसा था। सभी प्रजाजन धर्मपरायण हो गए थे। राम का शासन इतना प्रभावी था कि प्रजा स्वतः धर्म के मार्ग पर चलती थी। वे प्रतिदिन सभा में आकर नगर के समाचार सुनते, गुप्तचरों से राज्य की गतिविधियों की जानकारी लेते और आवश्यक आदेश देते। उनका उद्देश्य केवल प्रजा का सुख था, न कि स्वयं का भोग। यही कारण था कि उनका राज्य रामराज्य कहलाया।

⚖️ न्याय और दंड नीति (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
यदा कश्चित् प्रजानां हि व्यवहारं समागतः ।
धर्मेण तं विनिश्चित्य रामः शास्ति न संशयः ॥
न मित्रे दण्डमासज्जेन्न द्वेष्ये प्रीतिमाचरेत् ।
समः सर्वेषु भूतेषु रामः शास्ति महीयसीम् ॥
अष्टकाः पञ्चकाश्चैव सभ्याः सदसि संगताः ।
धर्मार्थसहितं वाक्यं ब्रुवते नात्र संशयः ॥
📖 भावार्थ : जब भी प्रजा में कोई विवाद या व्यवहार आता, राम धर्मपूर्वक उसका निर्णय करते थे। वे किसी मित्र पर अतिरिक्त दंड नहीं देते थे और न ही शत्रु से प्रीति रखते थे। सभी प्राणियों में सम भाव रखकर राम पृथ्वी का शासन करते थे। सभा में आठ या पाँच सभ्य (न्यायाधीश) एकत्र होते थे जो धर्म और अर्थ से युक्त वचन बोलते थे, इसमें संदेह नहीं। राम ने न्याय प्रणाली को इस प्रकार सुदृढ़ किया कि कोई भी अपराधी दंड से बच न सके। वे स्वयं भी न्याय के प्रति सजग रहते और कभी भी क्रोध या मोह में आकर न्याय नहीं करते थे। उनके न्यायालय में झूठ बोलने का साहस कोई नहीं करता था, क्योंकि राम की प्रतिज्ञा थी कि वे असत्य को कभी सहन नहीं करेंगे।

💰 राजकोष और कर नीति (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
नातिकर्षति राजा तु प्रजाः स्वेभ्यः पदेभ्यः ।
धर्मेण कोशमाहार्षीत् पालयामास च प्रजाः ॥
न कस्यचिद् भयं तत्र न चौरेभ्यो न राष्ट्रतः ।
सर्वे धर्मपरा लोकाः रामे शासति नित्यशः ॥
षड्भागं धर्मतो राजा प्रजाभ्यः प्रतिपद्यते ।
स चापि धर्मतः कोशे रक्ष्यते परिपाल्यते ॥
📖 भावार्थ : राजा राम प्रजा पर अत्यधिक कर का बोझ नहीं डालते थे। वे धर्मपूर्वक कोष एकत्र करते और उसी से प्रजा का पालन करते थे। उनके राज्य में किसी को भय नहीं था—न चोरों से, न शत्रुओं से। सभी लोग धर्मपरायण थे क्योंकि राम सदा धर्म से शासन करते थे। राजा धर्मतः प्रजा से छठा भाग कर के रूप में लेते थे और उसे धर्मपूर्वक कोष में रखकर संरक्षित करते थे। राम ने कर वसूली में कभी अन्याय नहीं किया। वे जानते थे कि कर प्रजा की सहमति से लिया जाना चाहिए और उसका उपयोग प्रजा के कल्याण में होना चाहिए। इसलिए उन्होंने सिंचाई, सड़क, किले, मंदिर आदि के निर्माण पर कोष व्यय किया। प्रजा भी प्रसन्न थी कि उनका कर सही जगह लग रहा है। इस प्रकार रामराज्य में कोई भी कर से पीड़ित नहीं था।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 आदर्श राजा

राम ने दिखाया कि एक राजा का कर्तव्य केवल कर वसूलना नहीं, बल्कि प्रजा के सुख-दुःख में भागीदार होना है। उनका जीवन प्रजा के लिए समर्पित था।

💡 धर्म की सर्वोच्चता

राम के शासन में धर्म ही सर्वोच्च था। वे स्वयं धर्म का पालन करते और प्रजा को भी धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते थे।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि शासन का मूल उद्देश्य प्रजा का कल्याण है। राजा को न्यायप्रिय, दयालु और धर्मपरायण होना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकनवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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