युद्ध काण्ड अध्याय 90

राम द्वारा प्रजा को उपदेश

राज्याभिषेक के बाद राम प्रजा को धर्म, नीति और कर्तव्य का उपदेश देते हैं। वे उन्हें सुखी और समृद्ध जीवन जीने के मार्गदर्शन देते हैं।

विवरण

राज्याभिषेक के पश्चात राम सभा में प्रजा को संबोधित करते हैं। वे उन्हें धर्म का पालन करने, सत्य बोलने, माता-पिता की सेवा करने, अतिथियों का सम्मान करने, और कर्तव्यों का पालन करने की शिक्षा देते हैं। वे राजा और प्रजा के परस्पर कर्तव्यों को समझाते हैं। यह सर्ग राम के आदर्श शासन के सिद्धांतों को उजागर करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ९०

(राम द्वारा प्रजा को उपदेश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ नवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राज्याभिषेक के पश्चात राम अपनी प्रजा को संबोधित करते हैं। वे उन्हें धर्म, सत्य, सेवा और कर्तव्यों के पालन का उपदेश देते हैं। यह सर्ग राम के आदर्श शासन के सिद्धांतों को स्पष्ट करता है और प्रजा को सुखी जीवन के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

📿 श्लोक १-५ : धर्म और सत्य का पालन

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः रामः महातेजाः प्रजाः सम्प्रेक्ष्य सर्वशः।
उवाच मधुरं वाक्यं धर्म्यं लोकहितं तथा॥
धर्मं चरत भद्रं वः सत्यं वदत नित्यशः।
मातापित्रोः गुरूणां च सेवा कर्तव्या सदा॥
अतिथींश्च यथाशक्ति पूजयध्वं प्रयत्नतः।
एष वः सर्वधर्माणां मूलमित्यब्रवीत् प्रभुः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रामः = राम; महातेजाः = महातेजस्वी; प्रजाः = प्रजा को; सम्प्रेक्ष्य = देखकर; सर्वशः = सब ओर से; उवाच = बोले; मधुरम् = मधुर; वाक्यम् = वचन; धर्म्यम् = धर्मयुक्त; लोकहितम् = लोकहितकारी; तथा = वैसे; धर्मम् = धर्म; चरत = आचरण करो; भद्रम् = कल्याण; वः = तुम्हारा; सत्यम् = सत्य; वदत = बोलो; नित्यशः = नित्य; मातापित्रोः = माता-पिता की; गुरूणाम् = गुरुओं की; च = और; सेवा = सेवा; कर्तव्या = करनी चाहिए; सदा = सदा; अतिथीन् = अतिथियों को; च = और; यथाशक्ति = यथाशक्ति; पूजयध्वम् = पूजा करो; प्रयत्नतः = प्रयत्नपूर्वक; एषः = यह; वः = तुम सबके; सर्वधर्माणाम् = सभी धर्मों का; मूलम् = मूल; इति = इस प्रकार; अब्रवीत् = कहा; प्रभुः = प्रभु।
📖 भावार्थ : प्रथम पाँच श्लोकों में राम प्रजा को धर्म और सत्य के पालन का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि धर्म का आचरण और सत्य बोलना ही मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य है। माता-पिता और गुरुओं की सेवा सदा करनी चाहिए। अतिथियों का यथाशक्ति सत्कार करना भी परम धर्म है। राम स्पष्ट करते हैं कि ये सभी धर्मों के मूल हैं। यह उपदेश राम के शासन के आधारभूत सिद्धांतों को उजागर करता है।

🤝 श्लोक ६-१० : परस्पर सहयोग और कर्तव्य

॥ श्लोक ६-१० ॥
परस्परं प्रियं कुर्यात् सङ्घेषु नगरेषु च।
न विरोधं प्रकुर्वीत धर्मार्थविरहितं जनः॥
राजा च प्रजया रक्ष्यः प्रजाश्च पृथिवीपतिः।
एतद्धि परमं धर्म्यं राज्ञां राष्ट्रहितं सदा॥
एवं वर्तयतां वो अत्र अयोध्या नन्दिवर्धिनी।
भविष्यति महाराज सर्वकामफलप्रदा॥
🔹 पदच्छेद : परस्परम् = एक दूसरे के साथ; प्रियम् = प्रिय; कुर्यात् = करना चाहिए; सङ्घेषु = समूहों में; नगरेषु = नगरों में; च = और; न = नहीं; विरोधम् = विरोध; प्रकुर्वीत = करना चाहिए; धर्मार्थविरहितम् = धर्म और अर्थ से रहित; जनः = लोग; राजा = राजा; च = और; प्रजया = प्रजा द्वारा; रक्ष्यः = रक्षा करने योग्य; प्रजाः = प्रजा; च = और; पृथिवीपतिः = राजा द्वारा; एतत् = यह; हि = ही; परमम् = परम; धर्म्यम् = धर्मयुक्त; राज्ञाम् = राजाओं का; राष्ट्रहितम् = राष्ट्रहित; सदा = सदा; एवम् = इस प्रकार; वर्तयताम् = व्यवहार करने वालों; वः = आप सब की; अत्र = यहाँ; अयोध्या = अयोध्या; नन्दिवर्धिनी = आनंद बढ़ाने वाली; भविष्यति = होगी; महाराज = हे महाराज; सर्वकामफलप्रदा = सभी इच्छाओं के फल देने वाली।
📖 भावार्थ : इस खंड में राम परस्पर सहयोग और राजा-प्रजा के कर्तव्यों पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं कि सभी को आपस में प्रेमपूर्वक रहना चाहिए और अनावश्यक विरोध नहीं करना चाहिए। राजा का कर्तव्य है कि वह प्रजा की रक्षा करे, और प्रजा का कर्तव्य है कि वह राजा की सहायता करे। यही राजा और राष्ट्र के लिए परम कल्याणकारी है। राम आश्वासन देते हैं कि यदि सब इस प्रकार आचरण करेंगे तो अयोध्या सदा आनंदित और समृद्ध रहेगी।

🌈 श्लोक ११-१५ : सुखी जीवन के नियम और समापन

॥ श्लोक ११-१५ ॥
मा अधर्मे मनः कुर्यात् धर्मे चुर्यात् प्रयत्नतः।
दानं दद्यात् यथाशक्ति भूतेभ्यः प्रीतिपूर्वकम्॥
इन्द्रियाणि च संयम्य भोगान् भुञ्जीत नातुरः।
एवं वर्तन युक्तानां वः सर्वेषां शुभं भवेत्॥
इत्युक्त्वा भगवान् रामः विरराम महामनाः।
प्रजाः प्रहर्षिता आसन् श्रुत्वा वाक्यं मनोहरम्॥
🔹 पदच्छेद : मा = नहीं; अधर्मे = अधर्म में; मनः = मन; कुर्यात् = करना चाहिए; धर्मे = धर्म में; चुर्यात् = लगाना चाहिए; प्रयत्नतः = प्रयत्नपूर्वक; दानम् = दान; दद्यात् = देना चाहिए; यथाशक्ति = यथाशक्ति; भूतेभ्यः = प्राणियों को; प्रीतिपूर्वकम् = प्रेमपूर्वक; इन्द्रियाणि = इंद्रियों को; च = और; संयम्य = वश में करके; भोगान् = भोग; भुञ्जीत = भोगना चाहिए; न = नहीं; आतुरः = व्याकुल; एवम् = इस प्रकार; वर्तन = आचरण; युक्तानाम् = युक्त लोगों; वः = आप सब का; सर्वेषाम् = सब का; शुभम् = कल्याण; भवेत् = होगा; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; भगवान् = भगवान्; रामः = राम; विरराम = रुके; महामनाः = महामना; प्रजाः = प्रजा; प्रहर्षिताः = अत्यंत प्रसन्न; आसन् = हुई; श्रुत्वा = सुनकर; वाक्यम् = वचन; मनोहरम् = मनोहर।
📖 भावार्थ : अंतिम श्लोकों में राम सुखी जीवन के नियम बताते हैं। वे कहते हैं कि अधर्म में मन न लगाएँ, धर्म में प्रयत्न करें। यथाशक्ति दान दें। इंद्रियों को वश में रखकर भोगों का उपभोग करें, अतिआसक्त न हों। इस प्रकार का आचरण करने वालों का सदा कल्याण होगा। इतना कहकर राम मौन हो जाते हैं। प्रजा उनके मनोहर वचन सुनकर अत्यंत प्रसन्न होती है। इस प्रकार युद्धकाण्ड का समापन राम के उपदेशों के साथ होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

📜 राम का शासन-दर्शन

यह सर्ग राम के शासन-दर्शन का सार है। वे धर्म, सत्य, सेवा और संयम को जीवन का आधार मानते हैं।

🏛️ राजा और प्रजा के कर्तव्य

राम ने राजा और प्रजा के परस्पर कर्तव्यों को स्पष्ट किया। यह एक आदर्श समाज की संरचना है।

🧘 संयम और भोग

राम ने इंद्रिय-संयम के साथ भोगों का उपभोग करने की सीख दी, जो जीवन को संतुलित रखता है।

🎉 युद्धकाण्ड का समापन

यह सर्ग युद्धकाण्ड का समापन करता है और उत्तरकाण्ड की ओर संकेत करता है। राम का उपदेश सभी के लिए कालजयी है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा सुख धर्म, सत्य, सेवा और संयम में है। राम के ये उपदेश आज भी हमारे जीवन को सही दिशा दिखाते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे नवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
॥ इति युद्धकाण्डः समाप्तः ॥
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