युद्ध काण्ड अध्याय 89

राम का राज्याभिषेक

वशिष्ठ और अन्य ऋषियों द्वारा राम का विधिवत राज्याभिषेक किया जाता है। सीता का पट्टाभिषेक होता है। सभी वानर और राक्षस उपहार प्राप्त करते हैं।

विवरण

अयोध्या में राम के प्रवेश के पश्चात राज्याभिषेक की तैयारियाँ प्रारंभ होती हैं। गुरु वशिष्ठ राम, सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न को स्नान कराते हैं। मंगल कर्मकांड संपन्न होते हैं। राम को सिंहासन पर बिठाया जाता है और सीता का राज्याभिषेक होता है। सुग्रीव, हनुमान, विभीषण आदि सभी को बहुमूल्य उपहार दिए जाते हैं। समस्त प्रजा आनंदित है। यह सर्ग रामराज्य की स्थापना का प्रतीक है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ८९

(राम का राज्याभिषेक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोननवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के अयोध्या आगमन के बाद अब उनका राज्याभिषेक होने जा रहा है। गुरु वशिष्ठ के निर्देशन में समस्त तैयारियाँ पूर्ण हो चुकी हैं। यह सर्ग राम और सीता के भव्य अभिषेक का वर्णन करता है, जो चौदह वर्षों के वनवास के अंत और धर्मराज्य की स्थापना का प्रतीक है।

🛕 श्लोक १-५ : राज्याभिषेक की तैयारी और मंगलाचरण

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः वशिष्ठः धर्मज्ञः ऋत्विग्भिः सहितस्तदा।
रामस्याभिषेकार्थं च पौरान् आहूय सत्वरम्॥
स्वस्ति वाच्य द्विजैः सर्वैः मङ्गलालापपूर्वकम्।
सिंहासनं महार्हं च कारयामास शिल्पिभिः॥
सर्वं नगरमालोक्य सम्भारान् समुपाहरत्।
रत्नानि विविधानि च वासांसि विविधानि च॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; वशिष्ठः = वशिष्ठ; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; ऋत्विग्भिः = ऋत्विजों के साथ; सहितः = सहित; तदा = तब; रामस्य = राम के; अभिषेकार्थम् = अभिषेक के लिए; च = और; पौरान् = नागरिकों को; आहूय = बुलाकर; सत्वरम् = शीघ्र; स्वस्ति = स्वस्ति; वाच्य = पढ़कर; द्विजैः = द्विजों द्वारा; सर्वैः = सभी; मङ्गलालापपूर्वकम् = मंगल गान के साथ; सिंहासनम् = सिंहासन; महार्हम् = अत्यंत मूल्यवान; च = और; कारयामास = करवाया; शिल्पिभिः = शिल्पियों से; सर्वम् = सब; नगरम् = नगर को; आलोक्य = देखकर; सम्भारान् = सामग्री; समुपाहरत् = एकत्रित की; रत्नानि = रत्न; विविधानि = अनेक प्रकार के; च = और; वासांसि = वस्त्र; विविधानि = अनेक प्रकार के; च = और।
📖 भावार्थ : प्रथम पाँच श्लोकों में राज्याभिषेक की तैयारियों का वर्णन है। गुरु वशिष्ठ ऋत्विजों और नागरिकों को बुलाकर अभिषेक का आदेश देते हैं। मंगलाचरण और स्वस्तिवाचन के बाद एक भव्य सिंहासन का निर्माण कराया जाता है। नगर को सजाया जाता है और अभिषेक के लिए आवश्यक सभी सामग्री—रत्न, वस्त्र, गंध, पुष्प आदि—एकत्रित की जाती है। यह तैयारी इस बात का प्रतीक है कि राम का राज्याभिषेक कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि एक दिव्य उत्सव है।

👑 श्लोक ६-१० : राम और सीता का अभिषेक

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः रामं महात्मानं सीतया सहितं तदा।
वशिष्ठः प्रयतो भूत्वा अभ्यषिञ्चद्विधानतः॥
सर्वे देवाः समागम्य प्रीयमाणाः सवासवाः।
ददुस्ते राज्यमव्यग्रं रामायाक्लिष्टकर्मणे॥
सीतापि कनकाभासा लक्ष्मीवद्रूपधारिणी।
अभिषिक्ता तदा राज्ञी रामेण सह भामिनी॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रामम् = राम को; महात्मानम् = महात्मा; सीतया = सीता के साथ; सहितम् = सहित; तदा = तब; वशिष्ठः = वशिष्ठ; प्रयतः = प्रयत्नपूर्वक; भूत्वा = होकर; अभ्यषिञ्चत् = अभिषेक किया; विधानतः = विधिपूर्वक; सर्वे = सब; देवाः = देवता; समागम्य = एकत्र होकर; प्रीयमाणाः = प्रसन्न होते हुए; सवासवाः = इंद्र सहित; ददुः = दिया; ते = उन्होंने; राज्यम् = राज्य; अव्यग्रम् = निर्विघ्न; रामाय = राम को; अक्लिष्टकर्मणे = सरल स्वभाव वाले; सीता = सीता; अपि = भी; कनकाभासा = सोने की आभा वाली; लक्ष्मीवत् = लक्ष्मी के समान; रूपधारिणी = रूप धारण करने वाली; अभिषिक्ता = अभिषिक्त; तदा = तब; राज्ञी = राज्ञी; रामेण = राम के साथ; सह = साथ; भामिनी = कांतिमती।
📖 भावार्थ : इस खंड में वशिष्ठ द्वारा राम और सीता के विधिवत अभिषेक का वर्णन है। वशिष्ठ मंत्रोच्चारण के साथ राम और सीता पर अभिषेक जल डालते हैं। देवता भी इस अवसर पर उपस्थित होते हैं और राम को आशीर्वाद देते हैं। सीता, जो स्वयं लक्ष्मी के समान हैं, राम के साथ सिंहासन पर विराजमान होती हैं। यह क्षण अयोध्या के इतिहास का सबसे गौरवशाली क्षण होता है। चौदह वर्षों के कष्टों के बाद राम को उनका उचित स्थान मिलता है, और सीता को रानी का पद।

🎁 श्लोक ११-१५ : वानरों और राक्षसों को उपहार

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः सुग्रीवमुख्यानां वानराणां महात्मनाम्।
ददौ रामः परान् भोगान् मणिरत्नानि भूरिशः॥
विभीषणाय धर्मज्ञो लङ्काराज्यमथाददात्।
प्रीतिपूर्वकमत्यर्थं रामः सत्यपराक्रमः॥
हनूमते च यत्नेन ददौ रामः परंतपः।
आभरणानि मुख्यानि वासांसि विविधानि च॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; सुग्रीवमुख्यानाम् = सुग्रीव आदि प्रमुख; वानराणाम् = वानरों को; महात्मनाम् = महात्माओं को; ददौ = दिया; रामः = राम ने; परान् = उत्तम; भोगान् = भोग; मणिरत्नानि = मणि-रत्न; भूरिशः = बहुत से; विभीषणाय = विभीषण को; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; लङ्काराज्यम् = लंका का राज्य; अथ = फिर; अददात् = दिया; प्रीतिपूर्वकम् = प्रेमपूर्वक; अत्यर्थम् = अत्यधिक; रामः = राम; सत्यपराक्रमः = सत्य पराक्रमी; हनूमते = हनुमान को; च = और; यत्नेन = यत्नपूर्वक; ददौ = दिया; रामः = राम; परंतपः = शत्रुतापन; आभरणानि = आभूषण; मुख्यानि = प्रमुख; वासांसि = वस्त्र; विविधानि = अनेक प्रकार के; च = और।
📖 भावार्थ : अंतिम श्लोकों में राम द्वारा अपने सहयोगियों को सम्मानित करने का वर्णन है। सुग्रीव को बहुमूल्य रत्न और भोग दिए जाते हैं। विभीषण को लंका का राज्य पुनः प्रदान किया जाता है, जिसकी पुष्टि राम करते हैं। हनुमान को विशेष रूप से आभूषण और वस्त्र भेंट किए जाते हैं। इस प्रकार राम अपने मित्रों और सहयोगियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। यह उनकी उदारता और नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। राज्याभिषेक के पश्चात अयोध्या में रामराज्य की स्थापना होती है, जहाँ सब सुखी और संतुष्ट हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राज्याभिषेक का महत्त्व

राम का राज्याभिषेक केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना का प्रतीक है। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव है।

🙌 मित्रों का सम्मान

राम ने सुग्रीव, विभीषण और हनुमान को उचित सम्मान देकर यह संदेश दिया कि सच्चे मित्र ही राज्य की नींव होते हैं।

🕊️ रामराज्य की अवधारणा

यह सर्ग रामराज्य की स्थापना का साक्षी है, जहाँ प्रजा सुखी, धन-धान्य से परिपूर्ण और न्यायपूर्ण शासन होता है।

🌟 सीता का स्थान

सीता का राम के साथ राज्याभिषेक होना यह दर्शाता है कि राम राज्य में पत्नी का भी उतना ही महत्व है। वे लक्ष्मी के अवतार हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा राजा वही है जो अपने कर्तव्यों का पालन करे, मित्रों का सम्मान करे और प्रजा के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहे। रामराज्य का आदर्श आज भी प्रासंगिक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकोननवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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