युद्ध काण्ड अध्याय 88

राम का अयोध्या में प्रवेश

राम, सीता, लक्ष्मण और वानर सेना के साथ अयोध्या में भव्य प्रवेश करते हैं। पूरी नगरी उत्सव से सजाई जाती है।

विवरण

राम के अयोध्या आगमन पर नगरी को दिव्य रूप से सजाया जाता है। नागरिक उत्साह से राम का स्वागत करते हैं। माताएँ, कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी भी राम को देखकर आनंदित होती हैं। राम पुष्पक विमान से उतरकर नगर का भ्रमण करते हैं और प्रजा को आशीर्वाद देते हैं। यह सर्ग अयोध्या के उल्लास और राम के प्रति प्रजा के प्रेम का वर्णन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ८८

(राम का अयोध्या में प्रवेश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टाशीतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : भरत से मिलने और पादुकाएँ लौटाने के पश्चात अब राम अयोध्या में प्रवेश करने वाले हैं। समस्त नगरी उत्सव के रंग में रंगी हुई है। राम का भव्य स्वागत होता है, और प्रजा अपने प्रिय राजा के दर्शनों के लिए उमड़ पड़ती है।

🎉 श्लोक १-५ : अयोध्या की सजावट और नागरिकों का उत्साह

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः पुरी अयोध्या आसीत् समुत्सुका दिदृक्षया।
रामस्यागमनं श्रुत्वा प्रहर्षोत्फुल्ललोचना॥
सर्वे जनाः समायान्ति पुरुषाः स्त्रिय एव च।
द्रष्टुकामा महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्॥
राजमार्गः सुसंश्लिष्टः पताकाभिः समन्ततः।
चन्दनोदकसेकेन प्रकीर्णकुसुमोत्करः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; पुरी = नगरी; अयोध्या = अयोध्या; आसीत् = थी; समुत्सुका = उत्सुक; दिदृक्षया = देखने की इच्छा से; रामस्य = राम के; आगमनम् = आगमन को; श्रुत्वा = सुनकर; प्रहर्षोत्फुल्ललोचना = हर्ष से खिले नेत्रों वाली; सर्वे = सब; जनाः = लोग; समायान्ति = आते हैं; पुरुषाः = पुरुष; स्त्रियः = स्त्रियाँ; एव = ही; च = और; द्रष्टुकामाः = देखने की इच्छा वाले; महात्मानम् = महात्मा; रामम् = राम को; सत्यपराक्रमम् = सत्य पराक्रम वाले; राजमार्गः = राजमार्ग; सुसंश्लिष्टः = सुशोभित; पताकाभिः = ध्वजाओं से; समन्ततः = चारों ओर; चन्दनोदकसेकेन = चंदन जल के छिड़काव से; प्रकीर्णकुसुमोत्करः = बिखरे हुए फूलों के समूह से।
📖 भावार्थ : पहले पाँच श्लोक अयोध्या के उत्सवपूर्ण वातावरण का वर्णन करते हैं। राम के आगमन का समाचार सुनते ही समस्त नगरी खुशी से झूम उठती है। स्त्री-पुरुष सभी नागरिक अपने प्रिय राजा के दर्शन के लिए सड़कों पर उमड़ पड़ते हैं। राजमार्गों को ध्वजाओं, पताकाओं और फूलों से सजाया जाता है। चंदन जल का छिड़काव होता है, और हर ओर उल्लास का वातावरण होता है। यह दृश्य राम की लोकप्रियता और प्रजा के उनके प्रति अगाध प्रेम को दर्शाता है।

🚶 श्लोक ६-१० : राम का नगर प्रवेश और माताओं का आशीर्वाद

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः रामः सह भ्रात्रा पुष्पकात् अवरुह्य च।
प्रविवेश पुरीं रम्यां जनौघैः समभिष्टुतः॥
कौशल्या च सुमित्रा च कैकेयी च यशस्विनी।
ददृशुः राममायान्तं प्रहर्षोत्फुल्ललोचनाः॥
रामः मातॄः नमस्कृत्य भरतेन सहानघः।
ययौ राजगृहं श्रीमान् पूज्यमानः सुरैरिव॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रामः = राम; सह = साथ; भ्रात्रा = भाई के; पुष्पकात् = पुष्पक विमान से; अवरुह्य = उतरकर; च = और; प्रविवेश = प्रवेश किया; पुरीम् = नगरी में; रम्याम् = सुंदर; जनौघैः = जनसमूहों से; समभिष्टुतः = स्तुत किए हुए; कौशल्या = कौशल्या; च = और; सुमित्रा = सुमित्रा; च = और; कैकेयी = कैकेयी; च = और; यशस्विनी = यशस्विनी; ददृशुः = देखा; रामम् = राम को; आयान्तम् = आते हुए; प्रहर्षोत्फुल्ललोचनाः = हर्ष से खिले नेत्रों वाली; रामः = राम; मातॄः = माताओं को; नमस्कृत्य = प्रणाम करके; भरतेन = भरत के साथ; सह = साथ; अनघः = पापरहित; ययौ = गए; राजगृहम् = राजमहल को; श्रीमान् = श्रीमान्; पूज्यमानः = पूजित होते हुए; सुरैः = देवताओं से; इव = समान।
📖 भावार्थ : इस खंड में राम का पुष्पक विमान से उतरकर नगर में प्रवेश करना वर्णित है। वे भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के साथ नगर की ओर बढ़ते हैं। मार्ग में जनसमूह उनकी जय-जयकार करता है। राजमहल में पहुँचने पर माताएँ—कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी—अपने पुत्रों को देखकर हर्ष से भर जाती हैं। राम सभी माताओं को प्रणाम करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। कैकेयी भी इस अवसर पर प्रसन्न होती हैं, और राम उन्हें भी उसी श्रद्धा से प्रणाम करते हैं। यह दृश्य राम के समान भाव से सबके प्रति सम्मान को दर्शाता है।

🏰 श्लोक ११-१५ : राजमहल में स्वागत और प्रजा का आशीर्वाद

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तत्र तं पूजयित्वा तु वाचा मधुरया नृपः।
उवाच परमोदारो रामं सत्यपराक्रमम्॥
धन्योऽस्मि यस्य मे पुत्रः त्वमागत इहाच्युत।
इत्युक्त्वा मूर्ध्नि चाघ्राय परिष्वज्य च राघवम्॥
रामः सर्वान् समाश्वास्य प्रजाः पितृवदात्मवान्।
निवेशयामास तदा यथार्हं सर्वमानवान्॥
🔹 पदच्छेद : तत्र = वहाँ; तम् = उसे; पूजयित्वा = पूजा करके; तु = तो; वाचा = वाणी से; मधुरया = मधुर; नृपः = राजा (दशरथ की आत्मा या कौशल्या?); उवाच = बोले; परमोदारः = परम उदार; रामम् = राम से; सत्यपराक्रमम् = सत्य पराक्रमी; धन्यः = धन्य; अस्मि = हूँ; यस्य = जिसके; मे = मेरे; पुत्रः = पुत्र; त्वम् = तुम; आगतः = आए; इह = यहाँ; अच्युत = अच्युत; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; मूर्ध्नि = सिर पर; च = और; आघ्राय = सूँघकर; परिष्वज्य = गले लगाकर; च = और; राघवम् = राघव को; रामः = राम; सर्वान् = सभी; समाश्वास्य = आश्वस्त करके; प्रजाः = प्रजा को; पितृवत् = पिता के समान; आत्मवान् = संयमी; निवेशयामास = ठहराया; तदा = तब; यथार्हम् = यथोचित; सर्वमानवान् = सभी मनुष्यों को।
📖 भावार्थ : अंतिम श्लोकों में राम का राजमहल में स्वागत और प्रजा के प्रति उनके कर्तव्य का वर्णन है। माताएँ राम को आशीर्वाद देती हैं और उनके सिर को सूँघकर अपना स्नेह व्यक्त करती हैं। राम प्रजा को पिता के समान आश्वासन देते हैं और सबको यथोचित स्थान पर ठहराते हैं। यह राम के लोकतांत्रिक दृष्टिकोण और प्रजा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। वे किसी को भी उपेक्षित नहीं करते। इस प्रकार अयोध्या में राम का प्रवेश एक ऐतिहासिक क्षण बन जाता है, जहाँ प्रजा और राजा का भावनात्मक संबंध सुदृढ़ होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏮 नगर का उत्सव

अयोध्या की सजावट और नागरिकों का उत्साह दर्शाता है कि राम केवल राजा नहीं, बल्कि प्रजा के प्राण थे। यह उत्सव उनके लंबे वनवास के अंत और सुखद आगमन की खुशी में मनाया गया।

👪 माताओं का प्रेम

कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी का राम के प्रति स्नेह सभी माताओं के समान भाव को दर्शाता है। कैकेयी का भी आशीर्वाद देना यह सिद्ध करता है कि राम ने किसी के प्रति द्वेष नहीं रखा।

🤴 राम का व्यवहार

राम का प्रजा को पिता के समान आश्वासन देना उनके आदर्श शासक होने का प्रमाण है। वे जनता के सुख-दुःख को समझते हैं।

🌺 आगामी राज्याभिषेक

यह सर्ग राज्याभिषेक की पूर्व पीठिका है। अगले सर्ग में राम का विधिवत राज्याभिषेक होगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि एक सच्चा नेता वही है जो अपनी प्रजा के दिलों में बसता है। राम का अयोध्या प्रवेश हमें यह भी बताता है कि कर्तव्यपालन के बाद मिलने वाला सम्मान ही सबसे बड़ा होता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे अष्टाशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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