युद्ध काण्ड अध्याय 87

भरत द्वारा राम को पादुकाएँ लौटाना

भरत विनम्रतापूर्वक राम को उनकी पादुकाएँ लौटाते हैं और राज्य ग्रहण करने का अनुरोध करते हैं।

विवरण

मिलन के पश्चात भरत राम के समक्ष वे पादुकाएँ रखते हैं जिन्हें उन्होंने चौदह वर्षों तक सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया था। वे राम से निवेदन करते हैं कि अब वे स्वयं राज्य का भार संभालें। भरत के इस निःस्वार्थ त्याग से राम अत्यंत प्रसन्न होते हैं। इस सर्ग में भरत के चरित्र की महानता और उनके समर्पण का वर्णन है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ८७

(भरत द्वारा राम को पादुकाएँ लौटाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्ताशीतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : मिलन के पश्चात भरत ने वे पादुकाएँ, जिन्हें वे चौदह वर्षों तक सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर राज्य का संचालन करते रहे, राम के समक्ष रख दीं। यह पादुकाएँ राम की अनुपस्थिति में उनके प्रतीक के रूप में पूजित थीं। अब वे उन्हें लौटाकर राम से राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना करते हैं।

👣 श्लोक १-५ : भरत का पादुकाएँ लाना

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः भरतः धर्मज्ञः पादुके तेजसा युते।
आदाय प्रयतो भूत्वा रामं वचनमब्रवीत्॥
इमे भ्रातः त्वया दत्ते पादुके राज्यशासने।
मया धृताः सदा राजन् त्वदधीनं च मे मनः॥
एते मूर्ध्नि मया धार्ये नियोगात् तव धीमतः।
प्रतिगृहाण भद्रं ते यथाकालमरिन्दम॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; भरतः = भरत; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; पादुके = पादुकाएँ; तेजसा = तेज से; युते = युक्त; आदाय = लेकर; प्रयतः = प्रयत्नपूर्वक; भूत्वा = होकर; रामम् = राम से; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; इमे = ये; भ्रातः = हे भाई; त्वया = तुम्हारे द्वारा; दत्ते = दी गई; पादुके = पादुकाएँ; राज्यशासने = राज्य के शासन में; मया = मेरे द्वारा; धृताः = धारण की गई; सदा = सदा; राजन् = हे राजन्; त्वदधीनम् = तुम्हारे अधीन; च = और; मे = मेरा; मनः = मन; एते = ये; मूर्ध्नि = सिर पर; मया = मेरे द्वारा; धार्ये = धारण की गई; नियोगात् = आज्ञा से; तव = तुम्हारी; धीमतः = बुद्धिमान; प्रतिगृहाण = ग्रहण करो; भद्रम् = कल्याण; ते = तुम्हारा; यथाकालम् = उचित समय पर; अरिन्दम = शत्रुओं का दमन करने वाले।
📖 भावार्थ : इन श्लोकों में भरत राम के समक्ष वे पादुकाएँ रखते हैं जिन्हें उन्होंने राम के वनवास काल में सिंहासन पर स्थापित करके राज्य का संचालन किया था। भरत कहते हैं कि इन पादुकाओं को उन्होंने अपने सिर पर धारण किया और राम की आज्ञा का पालन करते हुए राज्य की रक्षा की। अब राम की वापसी पर वे उन्हें लौटा रहे हैं। भरत का यह कृत्य उनकी अनन्य निष्ठा और कर्तव्यपरायणता का प्रतीक है। उन्होंने कभी भी राज्य पर अपना अधिकार नहीं जमाया, बल्कि इसे राम की धरोहर समझकर संभाला।

🤲 श्लोक ६-१० : भरत का राज्य त्याग का प्रस्ताव

॥ श्लोक ६-१० ॥
यथा त्वं मां समादिश्य गतः काननमीश्वरः।
तथा पालितमत्यन्तं त्वद्वाक्यमकुतोभयम्॥
इदं राज्यं हि विपुलं मया त्वत्प्रतिपालितम्।
प्रतिगृह्णीष्व धर्मज्ञ न हि राज्यं विना त्वया॥
त्वयि जीवति धर्मज्ञ नाहं राज्यं कथंचन।
प्रशासितुं हि शक्तोऽस्मि सत्येनैव ब्रवीमि ते॥
🔹 पदच्छेद : यथा = जैसे; त्वम् = तुम; माम् = मुझे; समादिश्य = आज्ञा देकर; गतः = गए; काननम् = वन को; ईश्वरः = स्वामी; तथा = वैसे; पालितम् = पालन किया; अत्यन्तम् = अत्यंत; त्वद्वाक्यम् = तुम्हारे वचन; अकुतोभयम् = निर्भय; इदम् = यह; राज्यम् = राज्य; हि = ही; विपुलम् = विशाल; मया = मेरे द्वारा; त्वत्प्रतिपालितम् = तुम्हारे लिए पालित; प्रतिगृह्णीष्व = ग्रहण करो; धर्मज्ञ = हे धर्मज्ञ; न = नहीं; हि = ही; राज्यम् = राज्य; विना = बिना; त्वया = तुम्हारे; त्वयि = तुम्हारे; जीवति = जीवित रहते; धर्मज्ञ = हे धर्मज्ञ; न = नहीं; अहम् = मैं; राज्यम् = राज्य; कथंचन = किसी भी तरह; प्रशासितुम् = शासन करने; हि = ही; शक्तः = समर्थ; अस्मि = हूँ; सत्येन = सत्य से; एव = ही; ब्रवीमि = कहता हूँ; ते = तुमसे।
📖 भावार्थ : इस खंड में भरत स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने केवल राम की आज्ञा से राज्य संभाला था। वे कहते हैं कि राम के जीवित रहते वे स्वयं राज्य पर अधिकार नहीं जमा सकते। यह भरत की विनम्रता और राम के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा को दर्शाता है। वे यह भी कहते हैं कि राज्य वास्तव में राम का है और उन्हें अब उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। भरत का यह प्रस्ताव किसी भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से परे है; यह केवल धर्म और कर्तव्य की भावना से प्रेरित है।

🌟 श्लोक ११-१५ : राम का उत्तर और आशीर्वाद

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रामः प्रीतमनाभवत्।
उवाच च महातेजाः भरतं प्रियदर्शनम्॥
यत्त्वया कृतमत्यन्तं भ्रातृवत्सल निस्तुलम्।
प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते सत्यसन्धस्य धीमतः॥
एवमुक्त्वा तु रामस्तु भरतं परिषस्वजे।
उवाच च पुनर्वाक्यं राज्यभारे नियोजयन्॥
🔹 पदच्छेद : तस्य = उसके; तद्वचनम् = उस वचन को; श्रुत्वा = सुनकर; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्न मन वाले; अभवत् = हुए; उवाच = बोले; च = और; महातेजाः = महातेजस्वी; भरतम् = भरत से; प्रियदर्शनम् = सुंदर दर्शन वाले; यत् = जो; त्वया = तुमने; कृतम् = किया; अत्यन्तम् = अत्यंत; भ्रातृवत्सल = भाई के स्नेही; निस्तुलम् = अतुलनीय; प्रीतः = प्रसन्न; अस्मि = हूँ; तव = तुमसे; भद्रम् = कल्याण; ते = तुम्हारा; सत्यसन्धस्य = सत्य का पालन करने वाले; धीमतः = बुद्धिमान; एवम् = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; तु = तो; रामः = राम; तु = तो; भरतम् = भरत को; परिषस्वजे = गले लगाया; उवाच = बोले; च = और; पुनः = फिर; वाक्यम् = वचन; राज्यभारे = राज्य के भार में; नियोजयन् = नियुक्त करते हुए।
📖 भावार्थ : अंतिम श्लोकों में राम भरत के त्याग और समर्पण से अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वे भरत को भ्रातृवत्सल और सत्यसन्ध कहकर संबोधित करते हैं और उनके कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। फिर वे भरत को हृदय से लगा लेते हैं। राम यह स्वीकार करते हैं कि भरत के समान भाई पाकर वे धन्य हैं। वे अब राज्यभार ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाते हैं, किंतु साथ ही यह भी कहते हैं कि भरत ही उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन करते रहेंगे। यह संवाद राम और भरत के मध्य अटूट विश्वास और प्रेम को पुष्ट करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙏 त्याग की पराकाष्ठा

भरत द्वारा पादुकाएँ लौटाना त्याग का चरम उदाहरण है। उन्होंने चौदह वर्षों तक केवल कर्तव्यवश राज्य किया और जब स्वामी लौटे, तो बिना किसी संकोच के सब कुछ समर्पित कर दिया।

📿 प्रतीक के रूप में पादुकाएँ

पादुकाएँ राम की सत्ता का प्रतीक थीं। भरत ने उन्हें सिंहासन पर रखकर शासन किया, यह दर्शाता है कि वे केवल राम के प्रतिनिधि थे, स्वयं राजा नहीं।

⚖️ धर्म और कर्तव्य

यह सर्ग धर्म और कर्तव्य के प्रति अडिग निष्ठा को प्रदर्शित करता है। भरत ने राज्य के लोभ से दूर रहकर अपने धर्म का पालन किया।

🕊️ राम का आशीर्वाद

राम का भरत को आशीर्वाद और आलिंगन इस बात का प्रतीक है कि सच्चा त्याग ही सच्चा सम्मान अर्जित करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा भाई वही है जो स्वार्थ से ऊपर उठकर कर्तव्य का पालन करे। भरत का जीवन हमें निःस्वार्थ सेवा और त्याग का पाठ पढ़ाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्ताशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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