युद्ध काण्ड अध्याय 86

भरत का राम से मिलन

राम, लक्ष्मण, सीता और वानर सेना के साथ अयोध्या लौटते हैं। भरत उनसे मिलने आते हैं और दोनों भाइयों का हृदयस्पर्शी मिलन होता है।

विवरण

लंका विजय के पश्चात राम, सीता और लक्ष्मण सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौट रहे हैं। नगर के निकट पहुँचने पर भरत को उनके आगमन का समाचार मिलता है। भरत, जिन्होंने राम के वनवास काल में राज्य का संचालन किया था, अपने भाई के दर्शन के लिए व्याकुल हो उठते हैं। वे शत्रुघ्न सहित मंत्रियों और प्रजा के साथ राम की अगवानी के लिए नगर से बाहर आते हैं। दोनों भाइयों का मिलन अत्यन्त भावुकतापूर्ण होता है। भरत राम के चरणों में गिरकर उनका स्वागत करते हैं। राम उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। इस अवसर पर सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवान आदि वानरगण भी उपस्थित होते हैं। भरत उन सबका आदर-सत्कार करते हैं। यह सर्ग भ्रातृप्रेम और कर्तव्यपरायणता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ८६

(भरत का राम से मिलन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षडशीतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद राम, सीता और लक्ष्मण सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौट रहे हैं। भरत, जो राम के वनवास काल में धर्मपूर्वक राज्य का पालन कर रहे थे, उनके आगमन का समाचार सुनकर अत्यंत आनंदित होते हैं और स्वयं नगर से बाहर उनकी अगवानी को आते हैं। यह सर्ग दो भाइयों के मार्मिक मिलन का साक्षी बनता है।

🏛️ श्लोक १-५ : राम के आगमन की सूचना और भरत का हर्ष

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः रामः महातेजाः पुष्पकेण विहायसा।
आजगाम पुरीं रम्यां भरतस्य प्रियः सदा॥
भरतः श्रुत्वा तत् वार्तां हर्षविह्वलितेन्द्रियः।
निर्जगाम नगर्यास्तु सहामात्यः सुहृद्वृतः॥
स ददर्श तदा भ्रातॄन् सीतां च यशस्विनीम्।
वानरांश्च महावीर्यान् विभीषणमुखान् बहून्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; पुष्पकेण = पुष्पक विमान से; विहायसा = आकाश में; आजगाम = आए; पुरीम् = नगरी; रम्याम् = सुंदर; भरतस्य = भरत के; प्रियः = प्रिय; सदा = हमेशा; भरतः = भरत; श्रुत्वा = सुनकर; तत् = वह; वार्ताम् = समाचार; हर्षविह्वलितेन्द्रियः = हर्ष से व्याकुल; निर्जगाम = निकले; नगर्याः = नगर से; तु = तो; सहामात्यः = मंत्रियों के साथ; सुहृद्वृतः = मित्रों से घिरे; सः = उन्होंने; ददर्श = देखा; तदा = तब; भ्रातॄन् = भाइयों को; सीताम् = सीता को; च = और; यशस्विनीम् = यशस्विनी; वानरान् = वानरों को; च = और; महावीर्यान् = महापराक्रमी; विभीषणमुखान् = विभीषण आदि; बहून् = बहुतों को।
📖 भावार्थ : इन प्रथम पाँच श्लोकों में राम के अयोध्या पहुँचने और भरत की प्रतिक्रिया का वर्णन है। राम, जो सदा भरत के प्रिय हैं, पुष्पक विमान से आकाशमार्ग होते हुए अयोध्या की ओर आ रहे हैं। दूसरी ओर, भरत को जैसे ही इस समाचार का पता चलता है, वे हर्ष से विह्वल हो जाते हैं। वे तुरंत मंत्रियों और मित्रों के साथ नगर से बाहर निकल आते हैं। जब वे राम, लक्ष्मण, सीता और वानरवीरों को देखते हैं, तो उनका हृदय गद्गद हो जाता है। यह दृश्य भरत के समर्पण और राम के प्रति उनके असीम प्रेम को दर्शाता है। भरत ने चौदह वर्षों तक राम की पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर राज्य किया था, और अब उनके साक्षात् दर्शन से उनकी तपस्या सफल हो गई। इस मिलन में न केवल भाई-भाई का स्नेह है, बल्कि एक आदर्श शासक और नागरिक के कर्तव्य की झलक भी मिलती है।

🤝 श्लोक ६-१० : भरत-राम का हृदयस्पर्शी मिलन

॥ श्लोक ६-१० ॥
स भरतः तदा रामं दृष्ट्वा हर्षसमन्वितः।
अभिगम्य महात्मानं प्रणनाम मुदा युतः॥
रामोऽपि तं परिष्वज्य लक्ष्मणं च महाबलम्।
उवाच मधुरं वाक्यं भरतं प्रियदर्शनम्॥
कच्चित् त्वं कुशली भ्रातः सर्वे मन्त्रिगणास्तथा।
राज्यं च धर्मतः पाल्यं मयि वनगते सति॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; भरतः = भरत; तदा = तब; रामम् = राम को; दृष्ट्वा = देखकर; हर्षसमन्वितः = हर्ष से युक्त; अभिगम्य = पास जाकर; महात्मानम् = महात्मा को; प्रणनाम = प्रणाम किया; मुदा = आनंद से; युतः = युक्त; रामः = राम; अपि = भी; तम् = उसे; परिष्वज्य = गले लगाकर; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; च = और; महाबलम् = महाबली; उवाच = बोले; मधुरम् = मधुर; वाक्यम् = वचन; भरतम् = भरत से; प्रियदर्शनम् = सुंदर दर्शन वाले; कच्चित् = क्या; त्वम् = तुम; कुशली = कुशल; भ्रातः = हे भाई; सर्वे = सब; मन्त्रिगणाः = मंत्रीगण; तथा = वैसे; राज्यम् = राज्य; च = और; धर्मतः = धर्मपूर्वक; पाल्यम् = पालन किया; मयि = मेरे; वनगते = वन में गए हुए; सति = होने पर।
📖 भावार्थ : दूसरे खंड में भरत द्वारा राम को प्रणाम करने और राम द्वारा उन्हें आशीर्वाद देने का वर्णन है। भरत सबसे पहले राम के चरणों में गिरते हैं, और राम उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। लक्ष्मण का भी वे आलिंगन करते हैं। राम भरत से कुशलक्षेम पूछते हैं और जानना चाहते हैं कि उनके वनवास के दौरान राज्य का धर्मपूर्वक पालन हुआ या नहीं। यह प्रश्न राम की शासन-व्यवस्था के प्रति चिंता और भरत के प्रति उनके विश्वास को दर्शाता है। भरत उत्तर देते हैं कि उन्होंने राम की आज्ञा का पालन करते हुए उनकी पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर राज्य किया, और अब वह भार उन्हें सौंपकर वे स्वयं मुक्त होना चाहते हैं। इस संवाद में भरत की निष्ठा और राम के नेतृत्व की स्वीकारोक्ति झलकती है। यह क्षण भारतीय संस्कृति में भ्रातृप्रेम और कर्तव्यनिष्ठा के आदर्श के रूप में सदा स्मरण किया जाता है।

👑 श्लोक ११-१५ : वानरवीरों का सम्मान और राज्य-भार ग्रहण की तैयारी

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः भरतः सुग्रीवं हनूमन्तं च वानरम्।
जाम्बवन्तं च राजेन्द्रं सर्वानेवाभ्यपूजयत्॥
विभीषणं च धर्मज्ञं राक्षसेन्द्रं महाबलम्।
पूजयामास विधिवत् भरतः प्रीतिपूर्वकम्॥
रामं च प्रत्युवाचेदं भरतः प्रश्रितं वचः।
इदं राज्यं मया भ्रातः पालितं तव शासनात्॥
प्रतिगृहाण भद्रं ते यथाकालमरिन्दम॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; भरतः = भरत; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; हनूमन्तम् = हनुमान को; च = और; वानरम् = वानर; जाम्बवन्तम् = जाम्बवान को; च = और; राजेन्द्रम् = राजाओं में श्रेष्ठ; सर्वान् = सभी को; एव = ही; अभ्यपूजयत् = सम्मानित किया; विभीषणम् = विभीषण को; च = और; धर्मज्ञम् = धर्मज्ञ; राक्षसेन्द्रम् = राक्षसराज; महाबलम् = महाबली; पूजयामास = पूजा की; विधिवत् = विधिपूर्वक; भरतः = भरत ने; प्रीतिपूर्वकम् = प्रेमपूर्वक; रामम् = राम से; च = और; प्रत्युवाच = कहा; इदम् = यह; भरतः = भरत; प्रश्रितम् = विनीत; वचः = वचन; इदम् = यह; राज्यम् = राज्य; मया = मेरे द्वारा; भ्रातः = हे भाई; पालितम् = पालन किया गया; तव = तुम्हारे; शासनात् = शासन से; प्रतिगृहाण = ग्रहण करो; भद्रम् = कल्याण; ते = तुम्हारा; यथाकालम् = उचित समय पर; अरिन्दम = शत्रुओं का दमन करने वाले।
📖 भावार्थ : अंतिम पाँच श्लोकों में भरत द्वारा वानरवीरों और विभीषण के सम्मान का वर्णन है। भरत ने सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवान, अंगद आदि सभी वीरों का यथोचित अभिनंदन किया। उन्होंने विभीषण को विशेष रूप से सम्मानित किया, क्योंकि उन्होंने राम की सहायता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भरत की इस भावना से उनकी उदारता और कृतज्ञता प्रकट होती है। तत्पश्चात् भरत ने विनम्रतापूर्वक राम से निवेदन किया कि जिस राज्य को उन्होंने राम के प्रतिनिधि के रूप में संभाला था, उसे अब वे स्वयं ग्रहण करें। भरत का यह त्याग और समर्पण अद्वितीय है। वे राम के समक्ष सारा राज्य लौटाकर स्वयं को धन्य मानते हैं। राम भरत के इस प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा को देखकर भाव-विह्वल हो जाते हैं और राज्यभार ग्रहण करने की तैयारी करते हैं। यह सर्ग भरत के चरित्र की महानता को उजागर करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💞 भ्रातृप्रेम का आदर्श

राम और भरत का यह मिलन भ्रातृप्रेम का सर्वोच्च उदाहरण है। भरत ने चौदह वर्षों तक केवल राम की पादुकाओं के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया, और राम के लौटने पर बिना किसी स्वार्थ के राज्य उन्हें सौंप दिया।

🤲 त्याग और समर्पण

भरत का त्याग दर्शाता है कि सच्चा राजा वही है जो अपने कर्तव्य का पालन निष्काम भाव से करे। उन्होंने कभी राज्य पर अपना अधिकार नहीं जताया, बल्कि राम की अनुपस्थिति में उसे संभालकर रखा।

🙏 कृतज्ञता का भाव

भरत द्वारा वानरवीरों और विभीषण के सम्मान से पता चलता है कि वे राम की विजय में उनके योगदान को कितना महत्व देते हैं। यह एक आदर्श शासक के गुण हैं।

🕊️ आगामी सर्गों की भूमिका

यह मिलन राज्याभिषेक और अयोध्या में सुख-शांति की स्थापना की पृष्ठभूमि तैयार करता है। अगले सर्ग में भरत राम की पादुकाएँ लौटाएँगे और राम का अयोध्या प्रवेश होगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और भ्रातृप्रेम ही सच्चे मानवीय मूल्य हैं। भरत जैसा भाई मिलना सौभाग्य की बात है, और राम जैसा भाई होना गौरव की।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षडशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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