युद्ध काण्ड अध्याय 82

भरद्वाज ऋषि द्वारा राम का सत्कार

भरद्वाज ऋषि राम और उनके साथियों का विधिवत सत्कार करते हैं, उनके लिए दिव्य भोजन की व्यवस्था करते हैं और रात्रि विश्राम का आयोजन करते हैं।

विवरण

भरद्वाज ऋषि राम के प्रति अत्यन्त श्रद्धा रखते हैं। वे अपने तपोबल से विश्वकर्मा का स्मरण करते हैं और एक मनोरम नगरी का निर्माण करवाते हैं जहाँ राम एवं वानर सेना ठहर सके। ऋषि के आदेश पर नदियाँ स्वच्छ जल प्रवाहित करती हैं, वृक्ष मीठे फलों से लद जाते हैं, और देवांगनाएँ नृत्य करती हैं। राम इस भव्य सत्कार से अभिभूत होते हैं और ऋषि की महिमा की स्तुति करते हैं। ऋषि राम से अगले दिन प्रस्थान करने का आग्रह करते हैं।

(भरद्वाज ऋषि द्वारा राम का सत्कार)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्व्यशीतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : भरद्वाज ऋषि राम के आगमन से अत्यन्त प्रसन्न हैं। वे अपने तपोबल से एक दिव्य नगरी बनाकर राम और वानर सेना का अभूतपूर्व सत्कार करते हैं। यह सर्ग ऋषि की भक्ति और राम के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

🌟 दिव्य नगरी का निर्माण (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः भरद्वाजो धीमान् रामं दृष्ट्वा कृताञ्जलिम्।
उवाच परमप्रीतो विश्वकर्माणमाह्वयन्॥
सृजाशु मम तपसा नगरीं रमणीयकाम्।
यत्र रामः सुखं वसेद्वानरैः सहितः प्रभुः॥
तथेत्युक्त्वा विश्वकर्मा निर्ममे नगरीं शुभाम्।
हेमप्राकारसंयुक्तां दिव्योद्यानसमन्विताम्॥
तां दृष्ट्वा राघवो राजा विस्मितो वाक्यमब्रवीत्।
अहो मुनेस्तपोबलं यन्मया दृष्टमद्भुतम्॥
📖 भावार्थ : भरद्वाज ऋषि ने राम को हाथ जोड़े देखा और अत्यन्त प्रसन्न होकर विश्वकर्मा का स्मरण किया। उन्होंने कहा, "मेरे तपोबल से शीघ्र एक रमणीय नगरी का निर्माण करो, जहाँ राम वानरों सहित सुखपूर्वक रह सकें।" विश्वकर्मा ने तथास्तु कहकर एक सुन्दर नगरी बनाई, जो स्वर्ण-प्राकार और दिव्य उद्यानों से युक्त थी। उसे देखकर राम आश्चर्यचकित हुए और बोले, "अहो, मुनि का तपोबल कितना अद्भुत है जो मैंने देखा।" यहाँ ऋषि के तप की महिमा का वर्णन है।

🍇 भोजन और सुविधाएँ (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
नद्यः प्रसन्नसलिलाः फलवन्तो नगोत्तमाः।
मधु मांसं च पानीयं रामार्थं समकल्पयन्॥
अप्सरसो ननृतुश्च जगुर्गन्धर्वकिन्नराः।
वानराः पायसं चक्रुः सर्वकामैरलंकृताः॥
रामः सीतया सार्धं भुक्त्वा पीत्वा सुखं स्थितः।
लक्ष्मणेन च सुग्रीवैर्हनूमत्प्रमुखैस्तथा॥
📖 भावार्थ : नदियाँ स्वच्छ जल से प्रवाहित हुईं, वृक्ष फलों से लद गए। राम के लिए मधु, मांस और पेय पदार्थों की व्यवस्था हुई। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं, गन्धर्व और किन्नर गाने लगे। वानरों ने पायस (खीर) बनाई और सभी सुख-सुविधाओं से सज्जित हुए। राम ने सीता के साथ भोजन किया, पान किया, और लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान आदि के साथ सुखपूर्वक विश्राम किया। ऋषि ने कोई कसर नहीं छोड़ी।

🙌 राम की स्तुति और प्रस्थान का आग्रह (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
प्रभाते रामः सुप्रीतो मुनिं प्रणम्य संयतः।
उवाच भगवन् धन्यो यन्मया दृष्टमीदृशम्॥
आशीर्वादं प्रयच्छस्व गमिष्यामि स्वकं पुरम्।
भरद्वाजस्तदा प्राह गच्छ राजन् सुखी भव॥
सीता लक्ष्मण सुग्रीव हनूमन्तश्च रक्षिताः।
पुनरागमनं तेऽस्तु धर्म एव हि ते गतिः॥
📖 भावार्थ : प्रातःकाल राम अत्यन्त प्रसन्न होकर मुनि को प्रणाम करते हैं और कहते हैं, "हे भगवन्, मैं धन्य हूँ कि मैंने आपका यह अद्भुत सत्कार देखा। अब मुझे आशीर्वाद दीजिए, मैं अपने नगर जाना चाहता हूँ।" भरद्वाज ने कहा, "हे राजन्, सुखपूर्वक जाओ। सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान सभी सुरक्षित रहें। तुम्हारा पुनः आगमन हो, धर्म ही तुम्हारी गति है।" ऋषि ने राम को विदा किया। यहाँ ऋषि का आशीर्वाद और राम की कृतज्ञता प्रकट होती है।

🔍 गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧘 तपोबल की महिमा

भरद्वाज ऋषि ने केवल संकल्प मात्र से दिव्य नगरी रच दी, यह तपस्या के प्रभाव को दर्शाता है।

🙏 राम की कृतज्ञता

राम ऋषि के प्रति आभार प्रकट करते हैं, जो उनके विनम्र स्वभाव का प्रमाण है।

🍯 वानरों का सत्कार

वानरों के लिए विशेष भोजन और मधु की व्यवस्था उनके प्रति ऋषि के प्रेम को दर्शाती है।

🚩 अयोध्या प्रस्थान की तैयारी

यह सर्ग अगले सर्ग में हनुमान के भरत के पास जाने की भूमिका तैयार करता है।

🎯 शिक्षा : महापुरुषों का सत्कार करना चाहिए; ऋषि ने राम का जो आदर किया, वह आदर्श है। राम ने भी कृतज्ञता दिखाई।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे द्व्यशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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