युद्ध काण्ड अध्याय 81

भरद्वाज ऋषि के आश्रम में आगमन

राम, सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान तथा वानर सेना पुष्पक विमान से अयोध्या लौटते समय भरद्वाज ऋषि के आश्रम पर उतरते हैं और उनसे भेंट करते हैं।

विवरण

रावण का वध करके राम ने सीता को मुक्त किया और अयोध्या लौटने का निश्चय किया। विभीषण द्वारा प्रदत्त पुष्पक विमान पर सवार होकर राम, सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवान, अंगद और अन्य वानर प्रमुख अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं। आकाश मार्ग से जाते हुए वे प्रयाग के समीप भरद्वाज ऋषि के आश्रम को देखते हैं। राम ऋषि के दर्शन की इच्छा से विमान वहाँ उतारने का आदेश देते हैं। ऋषि भरद्वाज राम को देखकर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और उचित आदर-सत्कार करते हैं। वे राम से अयोध्या के समाचार पूछते हैं और राम उन्हें वनवास, सीता हरण, सुग्रीव से मित्रता, वानर सेना द्वारा सेतु निर्माण, रावण वध तथा सीता की अग्निपरीक्षा की संक्षिप्त कथा सुनाते हैं। ऋषि राम की विजय पर हर्ष व्यक्त करते हैं और अयोध्या शीघ्र पहुँचने का आशीर्वाद देते हैं। राम ऋषि से विदा लेकर पुनः विमान पर सवार हो अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं।

(भरद्वाज ऋषि के आश्रम में आगमन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकाशीतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावणवध के पश्चात राम अयोध्या लौट रहे हैं। मार्ग में वे भरद्वाज ऋषि के आश्रम पर रुकते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह सर्ग राम की विनम्रता और ऋषियों के प्रति उनके आदर को दर्शाता है।

🚁 पुष्पक विमान से प्रयाग आगमन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततस्ते राक्षसं हत्वा लङ्कायां सह वानराः।
पुष्पकेण विमानेन प्रयाता उत्तरामुखाः॥
गच्छन्तस्ते यदा प्राप्ताः प्रयागं धर्मवत्सलाः।
ददृशुर्भरद्वाजस्य तपोवनमनुत्तमम्॥
तदाश्रमपदं दृष्ट्वा रामः सुग्रीवमब्रवीत्।
अत्र वत्स्यामहे सर्वे मुनिं द्रष्टुं तपोधनम्॥
तथेति सुग्रीववचः श्रुत्वा रामो विमानपः।
अवातरत् सहामात्यैः पुष्पकात् तदनन्तरम्॥
अवतीर्णं तु रामं तं दृष्ट्वा भरद्वाजस्तदा।
सह शिष्यैः समुत्थाय पूजयामास धर्मवित्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ते = वे; राक्षसम् = राक्षस को; हत्वा = मारकर; लङ्कायाम् = लंका में; सह = साथ; वानराः = वानर; पुष्पकेण = पुष्पक द्वारा; विमानेन = विमान से; प्रयाताः = गए; उत्तरामुखाः = उत्तर की ओर मुख किए; गच्छन्तः = जाते हुए; ते = वे; यदा = जब; प्राप्ताः = पहुँचे; प्रयागम् = प्रयाग; धर्मवत्सलाः = धर्मप्रिय; ददृशुः = देखा; भरद्वाजस्य = भरद्वाज का; तपोवनम् = तपोवन; अनुत्तमम् = उत्तम; तत् = उस; आश्रमपदम् = आश्रम को; दृष्ट्वा = देखकर; रामः = राम; सुग्रीवम् = सुग्रीव से; अब्रवीत् = बोले; अत्र = यहाँ; वत्स्यामहे = ठहरेंगे; सर्वे = सब; मुनिम् = मुनि को; द्रष्टुम् = देखने के लिए; तपोधनम् = तपोधन को; तथा = ऐसा; इति = कहकर; सुग्रीववचः = सुग्रीव के वचन; श्रुत्वा = सुनकर; रामः = राम; विमानपः = विमान के स्वामी; अवातरत् = उतरे; सहामात्यैः = मंत्रियों सहित; पुष्पकात् = पुष्पक से; तदनन्तरम् = उसके बाद; अवतीर्णम् = उतरे हुए; तु = तो; रामम् = राम को; तम् = उनको; दृष्ट्वा = देखकर; भरद्वाजः = भरद्वाज; तदा = तब; सह = साथ; शिष्यैः = शिष्यों के; समुत्थाय = उठकर; पूजयामास = पूजा की; धर्मवित् = धर्मज्ञ।
📖 भावार्थ : इन पाँच श्लोकों में राम के भरद्वाज आश्रम में आगमन का वर्णन है। रावण का वध करने के बाद राम, सीता, लक्ष्मण और वानर सेना पुष्पक विमान द्वारा अयोध्या लौट रहे थे। जब वे प्रयाग क्षेत्र में पहुँचे, तो उन्होंने भरद्वाज ऋषि का आश्रम देखा। यह आश्रम अत्यन्त रमणीय और तपोभूमि था। राम को ऋषि के दर्शन की इच्छा हुई, इसलिए उन्होंने सुग्रीव से कहा कि हम सब यहाँ ठहरें और मुनि से मिलें। सुग्रीव ने सहर्ष स्वीकार किया। तब राम ने विमान को आश्रम के समीप उतारा। भरद्वाज ऋषि ने जब राम को उतरते देखा, तो वे अपने शिष्यों सहित तुरन्त उठे और उनका पूजन किया। यह दृश्य राम के चरित्र की विनम्रता और ऋषियों के प्रति उनकी श्रद्धा को दर्शाता है। राम एक महान योद्धा और राजा होते हुए भी ऋषियों का आदर करना नहीं भूलते। इस प्रकार प्रथम पाँच श्लोक राम के आगमन की सुंदर तैयारी प्रस्तुत करते हैं।

🙏 ऋषि का सत्कार और राम का वृत्तांत (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
रामं सीतां च लक्ष्मणं सुग्रीवं च महाबलम्।
हनूमन्तं च जाम्बवन्तमङ्गदं च महाकपिम्॥
पूजयित्वा यथान्यायं फलमूलैस्तपोधनः।
कुशलं परिपप्रच्छ रामं दशरथात्मजम्॥
कच्चित्ते कुशलं राम वानरैः सहितस्य वै।
कच्चिद्रावणमासाद्य न ते व्यसनमागतम्॥
ततः कथयतो राज्ञः सर्वं वृत्तमशेषतः।
यथा वधः कृतस्तेन रावणस्य दुरात्मनः॥
यथा सीता परित्राता यथा सेतुः समुद्रिणि।
सर्वं शुश्राव धर्मात्मा भरद्वाजो महामुनिः॥
📖 भावार्थ : भरद्वाज ऋषि ने राम, सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवान और अंगद आदि सभी प्रमुख वानरों का विधिवत पूजन किया और उन्हें फल-मूल अर्पित किए। तदनन्तर उन्होंने राम से कुशलक्षेम पूछा। उन्होंने प्रश्न किया कि हे राम, वानरों सहित तुम्हारा कल्याण हो? रावण जैसे दुष्ट राक्षस का सामना करने पर तुम पर कोई संकट तो नहीं आया? इस प्रश्न के उत्तर में राम ने ऋषि को सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार उन्होंने सुग्रीव से मित्रता की, वानर सेना एकत्र की, समुद्र पर सेतु बाँधा, लंका में प्रवेश कर रावण का वध किया और सीता को मुक्त कराया। धर्मात्मा भरद्वाज ने यह सब सुना और अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्हें राम की विजय पर गर्व हुआ। यह संवाद राम के वीरतापूर्ण कार्यों का सार है और ऋषि की जिज्ञासा को शान्त करता है। साथ ही यह दर्शाता है कि राम अपनी उपलब्धियों का श्रेय दूसरों को देते हैं और विनम्रतापूर्वक सब कुछ कहते हैं।

🕉️ आशीर्वाद और विदाई (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
श्रुत्वा तु निहतं रक्षो रामेणाक्लिष्टकर्मणा।
भरद्वाजो महातेजा इदं वचनमब्रवीत्॥
धन्योऽसि राम सुप्रीतो यत्त्वया दानवो हतः।
यशस्ते रोचते लोके सूर्यस्येव प्रभा सदा॥
अद्यप्रभृति वैदेही पतिव्रता सुखी भव।
पुनर्द्रक्ष्यसि सौमित्रिं भरतं च सलक्ष्मणम्॥
गच्छ त्वं निर्भयो राजन् स्वपुरं पुनरागतः।
अयोध्यायां महात्मानो वानरास्त्वां द्रक्ष्यन्ति च॥
इत्युक्त्वा भगवान् विप्रः प्रदक्षिणमथाकरोत्।
आशीर्भिर्योजयामास रामं सीतां च लक्ष्मणम्॥
📖 भावार्थ : राम के मुख से रावण वध का समाचार सुनकर महातेजस्वी भरद्वाज ऋषि ने उन्हें आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा कि हे राम, तुम धन्य हो जिसने इस दुष्ट राक्षस का वध किया। तुम्हारी कीर्ति सूर्य के समान संसार में सदा प्रकाशित रहेगी। उन्होंने सीता को पतिव्रता धर्म में स्थिर रहने का आशीर्वाद दिया और कहा कि वे सुखी रहें। ऋषि ने राम को आश्वासन दिया कि वे शीघ्र ही लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न से मिलेंगे। उन्होंने कहा कि निर्भय होकर अपनी राजधानी जाएँ, वहाँ महात्मा वानर भी उनके दर्शन करेंगे। इतना कहकर ऋषि ने राम, सीता और लक्ष्मण की परिक्रमा की और उन्हें आशीर्वाद दिया। यह आशीर्वाद राम के आगामी राज्याभिषेक और सुखमय जीवन की पुष्टि करता है। ऋषि का यह व्यवहार गुरु-शिष्य के पवित्र सम्बन्ध को दर्शाता है, जहाँ गुरु शिष्य की सफलता पर प्रसन्न होता है और उसे उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ देता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राम की विनम्रता

राम ने विजयी होने पर भी ऋषि के आश्रम में जाकर उनका आशीर्वाद लिया, जो उनकी विनम्रता और गुरुभक्ति का परिचायक है।

🌊 पुष्पक विमान का ऐतिहासिक महत्त्व

यह विमान कुबेर से रावण ने छीना था और अब राम इसका उपयोग कर रहे हैं। इसका उल्लेख भविष्य में राम के द्वारा कुबेर को लौटाने का भी है।

🧘 भरद्वाज ऋषि की तपोभूमि

प्रयाग का यह आश्रम धार्मिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है, जहाँ राम ने वनवास काल में भी भेंट की थी। यह स्थान त्रिवेणी संगम के निकट है।

🔜 अयोध्या प्रवेश की प्रस्तावना

यह सर्ग अयोध्या पहुँचने से पूर्व की अंतिम भेंट है, जो राम के राज्याभिषेक की ओर अग्रसर करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि सफलता के बाद भी हमें अपने गुरुजनों और बड़ों का सम्मान करना चाहिए। राम ने विजय के अहंकार में न आकर ऋषि का आशीर्वाद लिया, जो एक आदर्श है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकाशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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