विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान
राम, सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव और वानरों सहित पुष्पक विमान से अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं। वे आकाश मार्ग से जाते हुए विभिन्न स्थानों का अवलोकन करते हैं और अन्त में अयोध्या पहुँचते हैं।
विवरण
पुष्पक विमान राम और उनके साथियों को लेकर अयोध्या की ओर रवाना होता है। वे आकाश में उड़ते हुए अनेक सुन्दर स्थानों, नदियों, पर्वतों, नगरों को देखते हैं। राम सीता को उन स्थानों का परिचय देते हैं, जहाँ उन्होंने वनवास के दौरान निवास किया था – चित्रकूट, पम्पा सरोवर, ऋष्यमूक पर्वत, पंचवटी आदि। सीता भी उन स्थानों को देखकर भावुक हो जाती हैं। धीरे-धीरे विमान अयोध्या के समीप पहुँचता है। राम को अयोध्या की सीमा में प्रवेश करते देख नगरवासी हर्षित होते हैं। यह सर्ग युद्धकाण्ड का अन्तिम सर्ग है, जो राम की अयोध्या वापसी के साथ समाप्त होता है।
(विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान)
🔆 प्रस्तावना : विभीषण से विदा लेने के पश्चात् राम पुष्पक विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं। यह युद्धकाण्ड का अन्तिम सर्ग है, जिसमें राम की विजय यात्रा और वनवास के स्थानों के दर्शन का वर्णन है। अयोध्या वापसी की प्रसन्नता सभी के मन में है।
🚀 विमान का अयोध्या के लिए प्रस्थान (श्लोक १-१०)
आरोप्य पुष्पकं दिव्यं सुग्रीवसहितस्तदा ॥
प्रायात् स्वनिलयं राजा हर्षयन् वानरर्षभान् ।
विमानेन विशालेन कामगेन महात्मना ॥
स तु देशान् समुद्रांश्च नदीश्च विविधान् गिरीन् ।
ददर्श रामः सीता च लक्ष्मणश्च महाबलः ॥
प्रयान्तं मुदिताः सर्वे पूजयामासुरञ्जसा ॥
रामोऽपि वानरान् सर्वान् दृष्ट्वा प्रीतो महामनाः ।
उवाच मधुरं वाक्यं सीतां सम्प्रेक्ष्य लक्ष्मणम् ॥
अयोध्यां पश्य सीते त्वं दूरादेव समुत्सुका ।
यत्र राजा दशरथो निवसन् स्म सुखं पुरा ॥
🏞️ मार्ग में वनवास के स्थानों का दर्शन (श्लोक ११-२५)
यस्यास्तीरे मया दृष्टा भवती राक्षसीवृता ॥
एष पम्पा शुभजला यत्र सख्यं मया सह ।
सुग्रीवेण पुरा वृत्तं हनूमान् यत्र मैथिलि ॥
एष चित्रकूटो नाम गिरिराजो महोदयः ।
यत्र निवासो भवत्या वने वनगतैः सह ॥
उवाच परमोदारा रामं सर्वत्र दर्शिनम् ॥
धन्यास्ते रघुशार्दूल ये त्वया सह संगताः ।
वने वन्येन वर्तन्तो द्रक्ष्यन्ति नगरीमिमाम् ॥
अहं तु राम भद्रं ते द्रक्ष्यामि नगरीं शुभाम् ।
यत्र राजा दशरथो भ्रातृभिः सह मोदते ॥
विमानमगमच्छीघ्रं सरय्वाः पुलिनं शुभम् ॥
ततो ददर्श रामस्तु नगरीमयोध्यां पुरीम् ।
हृष्टः सीतामुवाचेदं पश्य सीते पितुर्मम ॥
राजधानी महार्हेयं गुप्ता भरतभूभुजा ।
अदूरे वर्तते चापि भरतो भ्रातृवत्सलः ॥
🎉 अयोध्या के समीप पहुँचना और नगरवासियों का हर्ष (श्लोक २६-४०)
मुमुदुः परमप्रीता नगरस्थाश्च मानवाः ॥
रामं समागतं श्रुत्वा भरतः सह मन्त्रिभिः ।
निर्ययौ तूर्णमुद्युक्तो द्रष्टुकामो नरर्षभम् ॥
ततो रामो विमानस्थो ददर्श भरतं तदा ।
अवतीर्य विमानात्तु समालिङ्ग्य चिरागतम् ॥
हनूमन्तं च संप्रेक्ष्य भरतः परिषस्वजे ॥
विभीषणं च धर्मज्ञं जाम्बवन्तं च वानरम् ।
अङ्गदं च महात्मानं सर्वांश्चान्यान् यथाक्रमम् ॥
ततस्ते मुदिताः सर्वे रामं दृष्ट्वा समागतम् ।
ववन्दिरे महात्मानं प्रहृष्टा भरतादयः ॥
वसिष्ठं च महात्मानं राज्ञश्चान्यान् समागतान् ॥
ततः प्रविश्य नगरीं वन्दितां सर्वतो जनैः ।
राजवेश्म समासाद्य मातृभिः संनिवेदितः ॥
एवं युद्धकाण्डेऽस्मिन् रामस्य विजयो महान् ।
सम्प्राप्तश्च यथान्यायं युद्धकाण्डस्तथोच्यते ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🏁 युद्धकाण्ड की समाप्ति
यह सर्ग युद्धकाण्ड का अन्तिम सर्ग है, जो राम की अयोध्या वापसी के साथ समाप्त होता है। यह राम के वनवास के अन्त और राज्यारोहण की पूर्व पीठिका है।
🚁 आकाश यात्रा का रोमांच
विमान से यात्रा के दौरान वनवास के स्थानों का दर्शन पाठकों को राम के सम्पूर्ण अभियान की याद दिलाता है।
👨👩👧👦 परिवार मिलन
भरत से मिलन, माताओं से भेंट – यह परिवार के पुनर्मिलन की हार्दिक भावना को दर्शाता है।
🌟 विजय का पर्व
राम की विजय केवल रावण पर नहीं, बल्कि धर्म की विजय है, जो अयोध्या में हर्षोल्लास का कारण बनती है।
🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि संघर्ष के बाद मिलने वाली विजय और प्रियजनों से मिलन अत्यन्त सुखद होता है। राम का अयोध्या पहुँचना धर्म की विजय का प्रतीक है।