युद्ध काण्ड अध्याय 80

विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान

राम, सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव और वानरों सहित पुष्पक विमान से अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं। वे आकाश मार्ग से जाते हुए विभिन्न स्थानों का अवलोकन करते हैं और अन्त में अयोध्या पहुँचते हैं।

विवरण

पुष्पक विमान राम और उनके साथियों को लेकर अयोध्या की ओर रवाना होता है। वे आकाश में उड़ते हुए अनेक सुन्दर स्थानों, नदियों, पर्वतों, नगरों को देखते हैं। राम सीता को उन स्थानों का परिचय देते हैं, जहाँ उन्होंने वनवास के दौरान निवास किया था – चित्रकूट, पम्पा सरोवर, ऋष्यमूक पर्वत, पंचवटी आदि। सीता भी उन स्थानों को देखकर भावुक हो जाती हैं। धीरे-धीरे विमान अयोध्या के समीप पहुँचता है। राम को अयोध्या की सीमा में प्रवेश करते देख नगरवासी हर्षित होते हैं। यह सर्ग युद्धकाण्ड का अन्तिम सर्ग है, जो राम की अयोध्या वापसी के साथ समाप्त होता है।

(विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अशीतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : विभीषण से विदा लेने के पश्चात् राम पुष्पक विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं। यह युद्धकाण्ड का अन्तिम सर्ग है, जिसमें राम की विजय यात्रा और वनवास के स्थानों के दर्शन का वर्णन है। अयोध्या वापसी की प्रसन्नता सभी के मन में है।

🚀 विमान का अयोध्या के लिए प्रस्थान (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः स रामः सीतां च लक्ष्मणं च महाबलम् ।
आरोप्य पुष्पकं दिव्यं सुग्रीवसहितस्तदा ॥
प्रायात् स्वनिलयं राजा हर्षयन् वानरर्षभान् ।
विमानेन विशालेन कामगेन महात्मना ॥
स तु देशान् समुद्रांश्च नदीश्च विविधान् गिरीन् ।
ददर्श रामः सीता च लक्ष्मणश्च महाबलः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सः = वह; रामः = राम; सीताम् = सीता को; च = और; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; च = और; महाबलम् = महाबली; आरोप्य = बैठाकर; पुष्पकम् = पुष्पक विमान में; दिव्यम् = दिव्य; सुग्रीवसहितः = सुग्रीव सहित; तदा = तब; प्रायात् = चले; स्वनिलयम् = अपने निवास (अयोध्या) को; राजा = राजा; हर्षयन् = हर्षित करते हुए; वानरर्षभान् = वानरश्रेष्ठों को; विमानेन = विमान से; विशालेन = विशाल; कामगेन = इच्छानुसार गति करने वाले; महात्मना = महान; सः = वह; तु = तो; देशान् = देशों को; समुद्रांश्च = समुद्रों को; नदीः = नदियों को; च = और; विविधान् = विविध; गिरीन् = पर्वतों को; ददर्श = देखा; रामः = राम ने; सीता = सीता ने; च = और; लक्ष्मणः = लक्ष्मण ने; च = और; महाबलः = महाबली ने।
📖 भावार्थ : तब राम ने सीता और महाबली लक्ष्मण को उस दिव्य पुष्पक विमान पर बैठाया और सुग्रीव के साथ वानरश्रेष्ठों को हर्षित करते हुए अपने निवास (अयोध्या) के लिए प्रस्थान किया। उस विशाल, इच्छानुसार गति करने वाले महान विमान द्वारा राम, सीता और लक्ष्मण ने अनेक देशों, समुद्रों, नदियों और विविध पर्वतों को देखा।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ततस्ते वानराः सर्वे रामं दृष्ट्वा विहायसा ।
प्रयान्तं मुदिताः सर्वे पूजयामासुरञ्जसा ॥
रामोऽपि वानरान् सर्वान् दृष्ट्वा प्रीतो महामनाः ।
उवाच मधुरं वाक्यं सीतां सम्प्रेक्ष्य लक्ष्मणम् ॥
अयोध्यां पश्य सीते त्वं दूरादेव समुत्सुका ।
यत्र राजा दशरथो निवसन् स्म सुखं पुरा ॥
📖 भावार्थ : तब वे सभी वानर राम को आकाश मार्ग से जाते देख अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनका पूजन किया। राम भी महामना होकर सब वानरों को देखकर प्रसन्न हुए और सीता तथा लक्ष्मण की ओर देखकर मधुर वचन बोले: "हे सीता, तुम दूर से ही अयोध्या को देखो, जिसे देखने की तुम उत्सुक हो। जहाँ पहले राजा दशरथ सुखपूर्वक निवास करते थे।"

🏞️ मार्ग में वनवास के स्थानों का दर्शन (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
इयं सीते सरिच्छ्रेष्ठा गोदावरी सुशोभना ।
यस्यास्तीरे मया दृष्टा भवती राक्षसीवृता ॥
एष पम्पा शुभजला यत्र सख्यं मया सह ।
सुग्रीवेण पुरा वृत्तं हनूमान् यत्र मैथिलि ॥
एष चित्रकूटो नाम गिरिराजो महोदयः ।
यत्र निवासो भवत्या वने वनगतैः सह ॥
📖 भावार्थ : "हे सीता, यह श्रेष्ठ नदी गोदावरी है, अत्यन्त सुशोभित, जिसके तट पर मैंने आपको राक्षसियों से घिरा देखा था। यह पम्पा सरोवर है जिसका जल शुभ है, जहाँ मेरी सुग्रीव के साथ मैत्री हुई थी, और हे मैथिलि, जहाँ हनुमान (ने आपको खोजा था)। यह चित्रकूट नाम का महान् गिरिराज है, जहाँ वन में आपके साथ मेरा निवास था।"
॥ श्लोक १६-२० ॥
तच्छ्रुत्वा सीता रामस्य वचनं प्रीतिमानसा ।
उवाच परमोदारा रामं सर्वत्र दर्शिनम् ॥
धन्यास्ते रघुशार्दूल ये त्वया सह संगताः ।
वने वन्येन वर्तन्तो द्रक्ष्यन्ति नगरीमिमाम् ॥
अहं तु राम भद्रं ते द्रक्ष्यामि नगरीं शुभाम् ।
यत्र राजा दशरथो भ्रातृभिः सह मोदते ॥
📖 भावार्थ : राम के उन वचनों को सुनकर सीता प्रसन्नमना होकर सर्वदर्शी राम से बोलीं: "हे रघुशार्दूल, वे लोग धन्य हैं जो आपके साथ वन में वन्य भोजन करते हुए भी आपके संग रहे और अब इस नगरी (अयोध्या) को देखेंगे। किन्तु हे राम, आपका कल्याण हो, मैं तो उस शुभ नगरी को देखूँगी, जहाँ राजा दशरथ अपने भाइयों के साथ आनन्दित होते थे।"
॥ श्लोक २१-२५ ॥
एवं संवदतोस्तेषां रामसीतयोस्तदा ।
विमानमगमच्छीघ्रं सरय्वाः पुलिनं शुभम् ॥
ततो ददर्श रामस्तु नगरीमयोध्यां पुरीम् ।
हृष्टः सीतामुवाचेदं पश्य सीते पितुर्मम ॥
राजधानी महार्हेयं गुप्ता भरतभूभुजा ।
अदूरे वर्तते चापि भरतो भ्रातृवत्सलः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार राम और सीता के संवाद करते हुए ही विमान शीघ्र ही सरयू नदी के शुभ तट पर जा पहुँचा। तब राम ने अयोध्या नगरी को देखा, हर्षित होकर सीता से कहा: "हे सीता, देखो मेरे पिता की यह राजधानी है, जो महार्ह है और भरत द्वारा सुरक्षित है। तथा समीप ही भ्रातृवत्सल भरत भी हैं।"

🎉 अयोध्या के समीप पहुँचना और नगरवासियों का हर्ष (श्लोक २६-४०)

॥ श्लोक २६-३० ॥
ततस्ते वानराः सर्वे दृष्ट्वा राममुपस्थितम् ।
मुमुदुः परमप्रीता नगरस्थाश्च मानवाः ॥
रामं समागतं श्रुत्वा भरतः सह मन्त्रिभिः ।
निर्ययौ तूर्णमुद्युक्तो द्रष्टुकामो नरर्षभम् ॥
ततो रामो विमानस्थो ददर्श भरतं तदा ।
अवतीर्य विमानात्तु समालिङ्ग्य चिरागतम् ॥
📖 भावार्थ : तब वे सब वानर और नगर में स्थित मनुष्य राम को समीप आया देख अत्यन्त प्रसन्न हुए। राम के आगमन का समाचार सुनकर भरत मन्त्रियों सहित शीघ्र ही नरर्षभ राम के दर्शन के लिए निकले। तब विमान में स्थित राम ने भरत को देखा और विमान से उतरकर चिरकाल बाद आए भरत को आलिङ्गन किया।
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
ततः सीतां च सुग्रीवं लक्ष्मणं च महाबलम् ।
हनूमन्तं च संप्रेक्ष्य भरतः परिषस्वजे ॥
विभीषणं च धर्मज्ञं जाम्बवन्तं च वानरम् ।
अङ्गदं च महात्मानं सर्वांश्चान्यान् यथाक्रमम् ॥
ततस्ते मुदिताः सर्वे रामं दृष्ट्वा समागतम् ।
ववन्दिरे महात्मानं प्रहृष्टा भरतादयः ॥
📖 भावार्थ : तब भरत ने सीता, सुग्रीव, महाबली लक्ष्मण, हनुमान, धर्मज्ञ विभीषण, जाम्बवान, महात्मा अंगद और अन्य सभी का यथाक्रम आलिङ्गन किया। तब भरत आदि सभी राम को समागत देख अत्यन्त प्रसन्न हुए और महात्मा राम को प्रणाम किया।
॥ श्लोक ३६-४० ॥
ततो रामो महातेजा भरतं प्रत्यपूजयत् ।
वसिष्ठं च महात्मानं राज्ञश्चान्यान् समागतान् ॥
ततः प्रविश्य नगरीं वन्दितां सर्वतो जनैः ।
राजवेश्म समासाद्य मातृभिः संनिवेदितः ॥
एवं युद्धकाण्डेऽस्मिन् रामस्य विजयो महान् ।
सम्प्राप्तश्च यथान्यायं युद्धकाण्डस्तथोच्यते ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने भरत का, महात्मा वसिष्ठ का, और समागत अन्य राजाओं का पूजन किया। फिर नगरी में प्रवेश करके, सब ओर से जनों द्वारा वन्दित होते हुए, राजमहल में पहुँचकर माताओं से मिले। इस प्रकार इस युद्धकाण्ड में राम की महान विजय हुई, और यथान्याय युद्धकाण्ड की समाप्ति हुई।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏁 युद्धकाण्ड की समाप्ति

यह सर्ग युद्धकाण्ड का अन्तिम सर्ग है, जो राम की अयोध्या वापसी के साथ समाप्त होता है। यह राम के वनवास के अन्त और राज्यारोहण की पूर्व पीठिका है।

🚁 आकाश यात्रा का रोमांच

विमान से यात्रा के दौरान वनवास के स्थानों का दर्शन पाठकों को राम के सम्पूर्ण अभियान की याद दिलाता है।

👨‍👩‍👧‍👦 परिवार मिलन

भरत से मिलन, माताओं से भेंट – यह परिवार के पुनर्मिलन की हार्दिक भावना को दर्शाता है।

🌟 विजय का पर्व

राम की विजय केवल रावण पर नहीं, बल्कि धर्म की विजय है, जो अयोध्या में हर्षोल्लास का कारण बनती है।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि संघर्ष के बाद मिलने वाली विजय और प्रियजनों से मिलन अत्यन्त सुखद होता है। राम का अयोध्या पहुँचना धर्म की विजय का प्रतीक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे अशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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