युद्ध काण्ड अध्याय 79

राम का विभीषण से विदा लेना

अयोध्या प्रस्थान से पूर्व राम विभीषण से विदा लेते हैं। वे विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हैं, और उसे धर्मपूर्वक शासन करने का निर्देश देते हैं। विभीषण राम को अयोध्या तक चलने की इच्छा व्यक्त करते हैं, परन्तु राम उन्हें लंका में ही रहने को कहते हैं। दोनों का भावपूर्ण मिलन और विदाई।

विवरण

राम अब अयोध्या के लिए प्रस्थान करने वाले हैं। वे विभीषण को बुलाते हैं और उन्हें लंका के राज्य का दायित्व सौंपते हैं। राम कहते हैं कि तुम धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करो। विभीषण राम से प्रार्थना करते हैं कि वे भी उनके साथ अयोध्या चलना चाहते हैं, परन्तु राम समझाते हैं कि तुम्हें यहाँ रहकर लंका की प्रजा की रक्षा करनी है। तुम मेरे मित्र हो, और तुम्हारा कर्तव्य अब यहीं है। विभीषण राम के आदेश को शिरोधार्य करते हैं। वे राम से मिलने का समय-समय पर आग्रह करते हैं। राम उन्हें आश्वासन देते हैं कि तुम सदा मेरे हृदय में रहोगे। अन्त में विभीषण राम की परिक्रमा करते हैं और भावुक होकर विदा लेते हैं। यह सर्ग मित्रता और कर्तव्य का अद्भुत उदाहरण है।

(राम का विभीषण से विदा लेना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ नवसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अयोध्या लौटने से पूर्व राम विभीषण को बुलाते हैं और उन्हें लंका का राज्य सौंपते हैं। विभीषण राम के साथ अयोध्या चलने की इच्छा व्यक्त करते हैं, पर राम उन्हें उनके कर्तव्य का स्मरण कराते हैं। यह सर्ग मित्रता, कर्तव्य और स्नेह का अद्भुत समन्वय है।

👑 राम द्वारा विभीषण को राज्य सौंपना (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामः सुधर्मात्मा विभीषणमथाब्रवीत् ।
इमां त्वं नगरीं रम्यां लङ्कां युक्तो विभीषण ॥
राज्यं प्रशाधि धर्मेण मा च किञ्चिद्विचारय ।
त्वं हि धर्मे स्थितो नित्यं सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥
तव राज्यं मया दत्तं सराक्षसगणस्य च ।
प्रतिपालय धर्मेण सर्वलोकहिते रतः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; सुधर्मात्मा = उत्तम धर्म वाले; विभीषणम् = विभीषण से; अथ = अब; अब्रवीत् = बोले; इमाम् = इस; त्वम् = तुम; नगरीम् = नगरी; रम्याम् = रमणीय; लङ्काम् = लंका; युक्तः = युक्त (ध्यान देकर); विभीषण = हे विभीषण; राज्यम् = राज्य; प्रशाधि = शासन करो; धर्मेण = धर्म के अनुसार; मा = मत; च = और; किञ्चित् = कुछ भी; विचारय = विचार करो; त्वम् = तुम; हि = निश्चय ही; धर्मे = धर्म में; स्थितः = स्थित; नित्यम् = नित्य; सत्यसन्धः = सत्य का पालन करने वाले; जितेन्द्रियः = जितेन्द्रिय; तव = तुम्हारा; राज्यम् = राज्य; मया = मेरे द्वारा; दत्तम् = दिया गया; सराक्षसगणस्य = राक्षस समुदाय सहित; च = और; प्रतिपालय = पालन करो; धर्मेण = धर्म से; सर्वलोकहिते = सब लोकों के हित में; रतः = लगे रहो।
📖 भावार्थ : तब उत्तम धर्म वाले राम ने विभीषण से कहा: "हे विभीषण, इस रमणीय लंका नगरी का तुम ध्यानपूर्वक राज्य करो। इसमें किसी प्रकार का संकोच मत करो। तुम नित्य धर्म में स्थित, सत्य का पालन करने वाले, जितेन्द्रिय हो। मैंने तुम्हें यह राज्य राक्षसगण सहित दिया है। तुम धर्मपूर्वक इसका पालन करो, सब लोकों के हित में रत रहो।"
॥ श्लोक ६-१० ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राम विभीषणमुखाच्च्युतम् ।
प्रहर्षमतुलं लेभे रामं चेदमुवाच ह ॥
यदि राम प्रसन्नस्त्वं मयि दास्यसि मे वरम् ।
अहमिच्छामि भक्त्या त्वां सेवितुं सुखमास्थितः ॥
त्वयि याते पुरीं रम्यामयोध्यां रघुनन्दन ।
ममापि त्वयि सन्तापो भविष्यति न संशयः ॥
📖 भावार्थ : राम के मुख से निकले हुए उन वचनों को सुनकर विभीषण अत्यन्त हर्षित हुए और राम से बोले: "हे राम! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे वरदान देना चाहते हैं, तो मैं भक्तिपूर्वक आपकी सेवा करना चाहता हूँ, सुखपूर्वक रहते हुए। हे रघुनन्दन! जब आप रम्य अयोध्या नगरी को चले जाएँगे, तो मुझे भी आपके वियोग में सन्ताप होगा, इसमें संशय नहीं।"

🗣️ राम का विभीषण को कर्तव्य समझाना (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः प्रोवाच रामस्तु विभीषणमिदं वचः ।
श्रूयतां राक्षसश्रेष्ठ यदर्थं वार्यते भवान् ॥
त्वया राज्यमिदं रक्ष्यं राक्षसानां महात्मनाम् ।
मत्सकाशं समागच्छ यदा स्मरसि राक्षस ॥
अहं च त्वां सदा प्रीत्या स्मरिष्यामि न संशयः ।
मैत्री चैव हि मे त्वया सदा समरवर्जिता ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने विभीषण से यह वचन कहा: "हे राक्षसश्रेष्ठ! सुनिए, किस कारण से आपको रोका जा रहा है। आपको इस राज्य की रक्षा करनी है, महात्मा राक्षसों की। जब भी आप मुझे स्मरण करें, आप मेरे पास आ सकते हैं। और मैं भी सदा प्रीतिपूर्वक आपको स्मरण करूँगा, इसमें संशय नहीं। मेरी आपके साथ मैत्री सदा बनी रहेगी, जो युद्ध रहित (शुद्ध) है।"
॥ श्लोक १६-२० ॥
एवमुक्तस्तु रामेण विभीषणमहाबलः ।
प्रत्युवाच ततः रामं वचनं प्रीतिपूर्वकम् ॥
यदाज्ञापयसे राम तत्करिष्याम्यसंशयम् ।
राज्यं च प्रतिपत्स्यामि त्वत्प्रसादान्न संशयः ॥
यदा तु स्मरसे राम तदा द्रक्ष्यसि मां ध्रुवम् ।
इत्युक्त्वा प्रणतो रामं विभीषणपतिस्तदा ॥
📖 भावार्थ : राम के इस प्रकार कहने पर महाबली विभीषण ने प्रीतिपूर्वक राम से कहा: "हे राम! आप जैसी आज्ञा करें, मैं वैसा ही करूँगा, इसमें संशय नहीं। और आपके प्रसाद से मैं राज्य का पालन करूँगा। हे राम! जब आप मुझे स्मरण करेंगे, तब आप निश्चय ही मुझे देखेंगे।" ऐसा कहकर विभीषण ने राम को प्रणाम किया।

🙏 विदाई और आशीर्वाद (श्लोक २१-३२)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
तमुवाच ततो रामः प्रीयमाणः पुनः पुनः ।
गच्छ त्वं नगरीं लङ्कां मा च शोकमथाकृथाः ॥
सुग्रीवो वानरैः सार्धं यथेष्टं गन्तुमर्हति ।
अहं चापि यथान्यायं गमिष्यामि पुरीं प्रियाम् ॥
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा रामं सीतां च लक्ष्मणम् ।
विभीषणः सुग्रीवं च वानरांश्च महाबलान् ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने बार-बार प्रेमपूर्वक कहा: "तुम लंका नगरी को जाओ और शोक मत करो। सुग्रीव वानरों के साथ यथेष्ट जा सकते हैं। और मैं भी यथायोग्य प्रिय नगरी अयोध्या को जाऊँगा।" तब विभीषण ने राम, सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव और महाबली वानरों की प्रदक्षिणा की।
॥ श्लोक २६-३२ ॥
आमन्त्र्य रामं धर्मज्ञं जगाम सह राक्षसैः ।
लङ्कां प्रविश्य धर्मात्मा चकार राज्यमुत्तमम् ॥
रामोऽपि सीतया सार्धं लक्ष्मणेन च धीमता ।
सुग्रीववानरैः सार्धं प्रायात् स्वनिलयं प्रति ॥
एवं विभीषणो राजा लब्ध्वा राज्यमकण्टकम् ।
रामप्रसादाद्धर्मात्मा रराज सह बान्धवैः ॥
📖 भावार्थ : धर्मज्ञ राम से आज्ञा लेकर विभीषण अपने राक्षसों के साथ लंका को चले गए। धर्मात्मा विभीषण ने लंका में प्रवेश करके उत्तम राज्य किया। राम भी सीता, बुद्धिमान लक्ष्मण, सुग्रीव और वानरों के साथ अपने धाम (अयोध्या) की ओर प्रस्थित हुए। इस प्रकार धर्मात्मा विभीषण ने राम के प्रसाद से निष्कण्टक राज्य प्राप्त करके बान्धवों के साथ शोभा पाई।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤝 मित्रता का आदर्श

राम और विभीषण की मित्रता निःस्वार्थ और धर्म पर आधारित है। राम विभीषण को उनके कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा देते हैं।

⚖️ कर्तव्य और स्नेह में संतुलन

राम ने विभीषण के स्नेह को समझा, पर कर्तव्य की प्रधानता बताई। यह हमें सिखाता है कि व्यक्तिगत इच्छाओं से अधिक कर्तव्य महत्वपूर्ण है।

🌅 नई शुरुआत

विभीषण के लिए यह नए राज्य और नई जिम्मेदारी की शुरुआत है, जो राम की कृपा से मिला है।

🚀 अयोध्या की ओर

राम का अयोध्या के लिए प्रस्थान उनके वनवास की समाप्ति और नए युग की शुरुआत का प्रतीक है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि सच्चा मित्र वही है जो हमें हमारे कर्तव्य का बोध कराए, और हमें हमारे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करे। राम ने विभीषण के प्रति यही किया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे नवसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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