राम का विभीषण से विदा लेना
अयोध्या प्रस्थान से पूर्व राम विभीषण से विदा लेते हैं। वे विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हैं, और उसे धर्मपूर्वक शासन करने का निर्देश देते हैं। विभीषण राम को अयोध्या तक चलने की इच्छा व्यक्त करते हैं, परन्तु राम उन्हें लंका में ही रहने को कहते हैं। दोनों का भावपूर्ण मिलन और विदाई।
विवरण
राम अब अयोध्या के लिए प्रस्थान करने वाले हैं। वे विभीषण को बुलाते हैं और उन्हें लंका के राज्य का दायित्व सौंपते हैं। राम कहते हैं कि तुम धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करो। विभीषण राम से प्रार्थना करते हैं कि वे भी उनके साथ अयोध्या चलना चाहते हैं, परन्तु राम समझाते हैं कि तुम्हें यहाँ रहकर लंका की प्रजा की रक्षा करनी है। तुम मेरे मित्र हो, और तुम्हारा कर्तव्य अब यहीं है। विभीषण राम के आदेश को शिरोधार्य करते हैं। वे राम से मिलने का समय-समय पर आग्रह करते हैं। राम उन्हें आश्वासन देते हैं कि तुम सदा मेरे हृदय में रहोगे। अन्त में विभीषण राम की परिक्रमा करते हैं और भावुक होकर विदा लेते हैं। यह सर्ग मित्रता और कर्तव्य का अद्भुत उदाहरण है।
(राम का विभीषण से विदा लेना)
🔆 प्रस्तावना : अयोध्या लौटने से पूर्व राम विभीषण को बुलाते हैं और उन्हें लंका का राज्य सौंपते हैं। विभीषण राम के साथ अयोध्या चलने की इच्छा व्यक्त करते हैं, पर राम उन्हें उनके कर्तव्य का स्मरण कराते हैं। यह सर्ग मित्रता, कर्तव्य और स्नेह का अद्भुत समन्वय है।
👑 राम द्वारा विभीषण को राज्य सौंपना (श्लोक १-१०)
इमां त्वं नगरीं रम्यां लङ्कां युक्तो विभीषण ॥
राज्यं प्रशाधि धर्मेण मा च किञ्चिद्विचारय ।
त्वं हि धर्मे स्थितो नित्यं सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥
तव राज्यं मया दत्तं सराक्षसगणस्य च ।
प्रतिपालय धर्मेण सर्वलोकहिते रतः ॥
प्रहर्षमतुलं लेभे रामं चेदमुवाच ह ॥
यदि राम प्रसन्नस्त्वं मयि दास्यसि मे वरम् ।
अहमिच्छामि भक्त्या त्वां सेवितुं सुखमास्थितः ॥
त्वयि याते पुरीं रम्यामयोध्यां रघुनन्दन ।
ममापि त्वयि सन्तापो भविष्यति न संशयः ॥
🗣️ राम का विभीषण को कर्तव्य समझाना (श्लोक ११-२०)
श्रूयतां राक्षसश्रेष्ठ यदर्थं वार्यते भवान् ॥
त्वया राज्यमिदं रक्ष्यं राक्षसानां महात्मनाम् ।
मत्सकाशं समागच्छ यदा स्मरसि राक्षस ॥
अहं च त्वां सदा प्रीत्या स्मरिष्यामि न संशयः ।
मैत्री चैव हि मे त्वया सदा समरवर्जिता ॥
प्रत्युवाच ततः रामं वचनं प्रीतिपूर्वकम् ॥
यदाज्ञापयसे राम तत्करिष्याम्यसंशयम् ।
राज्यं च प्रतिपत्स्यामि त्वत्प्रसादान्न संशयः ॥
यदा तु स्मरसे राम तदा द्रक्ष्यसि मां ध्रुवम् ।
इत्युक्त्वा प्रणतो रामं विभीषणपतिस्तदा ॥
🙏 विदाई और आशीर्वाद (श्लोक २१-३२)
गच्छ त्वं नगरीं लङ्कां मा च शोकमथाकृथाः ॥
सुग्रीवो वानरैः सार्धं यथेष्टं गन्तुमर्हति ।
अहं चापि यथान्यायं गमिष्यामि पुरीं प्रियाम् ॥
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा रामं सीतां च लक्ष्मणम् ।
विभीषणः सुग्रीवं च वानरांश्च महाबलान् ॥
लङ्कां प्रविश्य धर्मात्मा चकार राज्यमुत्तमम् ॥
रामोऽपि सीतया सार्धं लक्ष्मणेन च धीमता ।
सुग्रीववानरैः सार्धं प्रायात् स्वनिलयं प्रति ॥
एवं विभीषणो राजा लब्ध्वा राज्यमकण्टकम् ।
रामप्रसादाद्धर्मात्मा रराज सह बान्धवैः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🤝 मित्रता का आदर्श
राम और विभीषण की मित्रता निःस्वार्थ और धर्म पर आधारित है। राम विभीषण को उनके कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा देते हैं।
⚖️ कर्तव्य और स्नेह में संतुलन
राम ने विभीषण के स्नेह को समझा, पर कर्तव्य की प्रधानता बताई। यह हमें सिखाता है कि व्यक्तिगत इच्छाओं से अधिक कर्तव्य महत्वपूर्ण है।
🌅 नई शुरुआत
विभीषण के लिए यह नए राज्य और नई जिम्मेदारी की शुरुआत है, जो राम की कृपा से मिला है।
🚀 अयोध्या की ओर
राम का अयोध्या के लिए प्रस्थान उनके वनवास की समाप्ति और नए युग की शुरुआत का प्रतीक है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि सच्चा मित्र वही है जो हमें हमारे कर्तव्य का बोध कराए, और हमें हमारे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करे। राम ने विभीषण के प्रति यही किया।