युद्ध काण्ड अध्याय 78

विमान से लंका का अवलोकन

पुष्पक विमान से राम, सीता, लक्ष्मण और वानर लंका नगरी का अवलोकन करते हैं। राम सीता को लंका के विभिन्न स्थानों का वर्णन करते हैं, जहाँ युद्ध हुआ था, जहाँ रावण रहता था, आदि। सीता भी उत्सुकता से सब कुछ देखती हैं।

विवरण

पुष्पक विमान आकाश में स्थित है, और राम उसे धीरे-धीरे लंका के ऊपर घुमाते हैं। वे सीता को लंका के विभिन्न स्थलों का परिचय देते हैं: अशोक वाटिका, जहाँ सीता को रखा गया था; रावण का महल; युद्धभूमि; वह स्थान जहाँ कुम्भकर्ण, इन्द्रजित और अन्य राक्षस मारे गए; समुद्र तट; सेतु आदि। सीता अत्यन्त प्रसन्न होती हैं और राम की वीरता की प्रशंसा करती हैं। वानर भी उत्सुकता से लंका को देखते हैं। यह सर्ग लंका के सौन्दर्य और युद्ध की स्मृतियों का सजीव चित्रण करता है।

(विमान से लंका का अवलोकन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर राम, सीता और वानर लंका नगरी का अवलोकन कर रहे हैं। राम सीता को उन स्थानों का परिचय देते हैं, जहाँ युद्ध हुआ था और जहाँ सीता ने कष्ट सहे थे। यह सर्ग विजय के बाद की संतुष्टि और स्मृतियों का वर्णन करता है।

🗺️ राम द्वारा सीता को लंका दिखाना (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततस्तु राघवः सीतां गृहीत्वा पुष्पके स्थितः ।
दर्शयामास तां लङ्कां रम्यां रावणपालिताम् ॥
इयं सीते पुरी लङ्का रावणेन सुरक्षिता ।
यस्यां त्वमहमासीनां रक्षितां राक्षसीगणैः ॥
एषा सीते शुभा वाटी यत्र त्वं राक्षसीवृता ।
अशोकवनिका नाम राक्षसाधिपरक्षिता ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; तु = तो; राघवः = राम; सीताम् = सीता को; गृहीत्वा = पकड़कर; पुष्पके = पुष्पक विमान में; स्थितः = स्थित; दर्शयामास = दिखाने लगे; ताम् = उसे; लङ्काम् = लंका; रम्याम् = रमणीय; रावणपालिताम् = रावण द्वारा पालित; इयम् = यह; सीते = हे सीता; पुरी = नगरी; लङ्का = लंका; रावणेन = रावण ने; सुरक्षिता = सुरक्षित की हुई; यस्याम् = जिसमें; त्वम् = तुम; अहम् = मैं; आसीनाम् = बैठी हुई; रक्षिताम् = रक्षित; राक्षसीगणैः = राक्षसियों के समूह द्वारा; एषा = यह; सीते = हे सीता; शुभा = शुभ; वाटी = बगीचा; यत्र = जहाँ; त्वम् = तुम; राक्षसीवृता = राक्षसियों से घिरी; अशोकवनिका = अशोक वाटिका; नाम = नाम से; राक्षसाधिपरक्षिता = राक्षसराज द्वारा रक्षित।
📖 भावार्थ : तब राघव ने सीता को विमान में बैठाकर उस रमणीय, रावण द्वारा पालित लंका नगरी को दिखाया। बोले: "हे सीता, यह वह लंका नगरी है जो रावण द्वारा सुरक्षित थी। इसमें तुम राक्षसियों से घिरी रखी गई थीं। और हे सीता, यह वह शुभ वाटिका है, जिसे अशोक वन कहते हैं, राक्षसराज द्वारा रक्षित, जहाँ तुम राक्षसियों से घिरी रही थीं।"
॥ श्लोक ६-१० ॥
एष रावण का राज्ञो भवनं दिव्यसंमितम् ।
यत्र त्वं राक्षसेन्द्रेण रुदती परिरक्षिता ॥
अत्र युद्धं महच्चासीद्राक्षसानां मया सह ।
हतो रावण एवात्र सानुबन्धः सबान्धवः ॥
📖 भावार्थ : "यह रावण राजा का महल है, जो दिव्य समान है, जहाँ तुम्हें राक्षसेन्द्र द्वारा रोते हुए रखा गया था। और यहाँ राक्षसों का मेरे साथ महान युद्ध हुआ। यहीं रावण अपने सब बान्धवों और अनुयायियों सहित मारा गया।"
॥ श्लोक ११-१५ ॥
तच्छ्रुत्वा सीता रामस्य वचनं प्रीतमानसा ।
उवाच परमोदारा रामं सर्वत्र दर्शिनम् ॥
तव प्रसादाद् रामाहं द्रष्टुं लङ्कामिमां शुभाम् ।
प्राप्ता सुग्रीवसहितां वानरांश्च महाबलान् ॥
धन्यस्त्वं रघुशार्दूल यस्य ते कीर्तिरुत्तमा ।
लोकेषु विदिता राम सर्वलोकनमस्कृता ॥
📖 भावार्थ : राम के उन वचनों को सुनकर सीता अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उस सर्वदर्शी राम से बोलीं: "हे राम, आपके प्रसाद से ही मैं इस शुभ लंका को, सुग्रीव और महाबली वानरों को देख पाई हूँ। हे रघुशार्दूल, आप धन्य हैं, जिनकी उत्तम कीर्ति समस्त लोकों में विदित है और सभी लोकों द्वारा नमस्कृत है।"

⚔️ युद्धभूमि और अन्य स्थलों का अवलोकन (श्लोक १६-२५)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ततो रामो महातेजा दर्शयामास सीतया ।
युद्धभूमिं महाघोरां राक्षसैर्वानरैर्वृताम् ॥
इन्द्रजित् कुम्भकर्णश्च रावणश्च महासुरः ।
यत्र ते निहताः सर्वे राक्षसा रामबाणतः ॥
सीता दृष्ट्वा तु तां भूमिं रुधिरौघसमुक्षिताम् ।
बभूव विस्मयाविष्टा रामं चेदमुवाच ह ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने सीता को अत्यन्त भयंकर युद्धभूमि दिखाई, जो राक्षसों और वानरों से व्याप्त थी, जहाँ इन्द्रजित, कुम्भकर्ण और महान राक्षस रावण आदि सभी राम के बाणों द्वारा मारे गए थे। उस भूमि को रुधिर की धाराओं से सिक्त देखकर सीता विस्मय से भर गईं और राम से यह कहा।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
कथं राम त्वयैकेन रावणः ससुतः सह ।
निहतो वानरैः सार्धं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥
एवमुक्तस्तु रामेण सीतया प्रियया तदा ।
प्रत्युवाच ततः सीतां विस्तरेण कथानकम् ॥
एवं विमानमारूढा सीता रामेण भाषिता ।
ददर्श लङ्कां रम्यां च समुद्रं च महोदधिम् ॥
📖 भावार्थ : सीता ने पूछा: "हे राम, आपने अकेले ही वानरों के साथ मिलकर रावण को उसके पुत्रों सहित कैसे मारा? यह मुझे विस्तार से बताइए।" प्रिया सीता के ऐसे पूछने पर राम ने सीता को उत्तर दिया और पूरा वृत्तान्त विस्तार से सुनाया। इस प्रकार विमान पर आरूढ़ सीता, राम से बातें करती हुई, लंका और महासागर को देख रही थीं।

🌊 समुद्र और सेतु का दर्शन (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-३० ॥
ततस्तु रामः सीतायै दर्शयामास वीर्यवान् ।
सेतुं च नलिना बद्धं समुद्रे मकरालये ॥
अनेन सेतुना सीते वानरा मां समन्विताः ।
तीर्णाः सागरमक्षोभ्यं रावणस्य वधेप्सया ॥
एतच्च विस्तरं सर्वं कथयामास राघवः ।
सीतायै धर्मशीलायै यथावृत्तं यथाक्रमम् ॥
📖 भावार्थ : तब वीर्यवान् राम ने सीता को नल द्वारा निर्मित सेतु दिखाया, जो मकरों के आलय समुद्र पर बना था। बोले: "हे सीता, इसी सेतु द्वारा मेरे साथ वानर इस अक्षोभ्य सागर को पार करके रावण के वध की इच्छा से गए थे।" फिर राघव ने धर्मशीला सीता को सब कुछ विस्तार से, यथावृत्त और यथाक्रम कथा सुनाई।
॥ श्लोक ३१-३८ ॥
सीता तु रामवचनात् प्रीतिसंहृष्टमानसा ।
विस्मयं परमं गत्वा रामं पुनरुवाच ह ॥
धन्या त्वं रघुशार्दूल यत्त्वया राक्षसेश्वरः ।
निहतः सगणः सर्वो धर्मेण विजयस्तव ॥
इत्युक्त्वा सीता रामेण सहिता वानरैः सह ।
रेमे विमानवर्ये सा प्रफुल्ला मुदिता सती ॥
इत्येष सर्गो दिव्याख्यो रामायणस्य कीर्तितः ।
श्रवणात्पापनाशश्च भक्त्या च धनसंपदः ॥
📖 भावार्थ : राम के वचनों से सीता का मन प्रीति और हर्ष से भर गया। वे अत्यन्त विस्मित होकर राम से फिर बोलीं: "हे रघुशार्दूल, आप धन्य हैं, जिन्होंने धर्मपूर्वक राक्षसेश्वर को उसकी सम्पूर्ण सेना सहित मार गिराया। आपकी विजय धर्ममयी है।" ऐसा कहकर सीता राम और वानरों के साथ उस श्रेष्ठ विमान में प्रफुल्लित और मुदित होकर आनन्दित रहीं। इस प्रकार यह दिव्याख्यान युक्त सर्ग रामायण में वर्णित है, जिसके श्रवण से पापों का नाश होता है और भक्ति से धन की प्राप्ति होती है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💞 राम-सीता संवाद

इस सर्ग में राम और सीता के मधुर संवाद हैं, जो उनके प्रेम और परस्पर सम्मान को दर्शाते हैं।

🏝️ लंका का भौगोलिक वर्णन

राम द्वारा लंका के विभिन्न स्थानों का वर्णन पाठकों को उस समय की भौगोलिक स्थिति से परिचित कराता है।

🛡️ युद्ध की स्मृतियाँ

युद्धभूमि का दर्शन और राम द्वारा युद्ध का वर्णन पिछली घटनाओं को पुनः सजीव करता है।

🌉 सेतु का महत्त्व

सेतु (रामसेतु) का दर्शन और उसकी कथा सीता को समुद्र पार करने के चमत्कार का साक्षात्कार कराती है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि विजय के बाद भी विनम्रता और प्रियजनों के साथ स्मृतियों को साझा करना महत्वपूर्ण है। राम सीता को सब कुछ दिखाकर उनकी जिज्ञासा को शांत करते हैं और उन्हें गौरवान्वित करते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे अष्टसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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