युद्ध काण्ड अध्याय 77

राम का पुष्पक विमान पर आरूढ़ होना

राम, सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव, विभीषण और वानर सेना के साथ पुष्पक विमान पर आरोहण करते हैं। विमान कुबेर का है, परन्तु रावण द्वारा हरण किए जाने के बाद अब विभीषण के अधिकार में है। सभी लोग विमान में बैठकर अयोध्या लौटने की तैयारी करते हैं।

विवरण

रावण वध और देवताओं से वरदान प्राप्त करने के बाद राम अब अयोध्या लौटने की तैयारी करते हैं। विभीषण राम के पास आकर कहते हैं कि यह पुष्पक विमान कुबेर का है, जिसे रावण ने बलपूर्वक छीन लिया था। अब वह आपके अधिकार में है। आप इस पर आरूढ़ होकर अयोध्या जा सकते हैं। राम सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव, विभीषण और मुख्य वानरों के साथ विमान पर चढ़ते हैं। विमान आकाश में ऊपर उठता है और सभी लोग लंका को नीचे देखते हैं। यह सर्ग पुष्पक विमान के वैभव और राम की वापसी की प्रसन्नता का वर्णन करता है।

(राम का पुष्पक विमान पर आरूढ़ होना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने रावण का वध कर दिया, देवताओं से वरदान प्राप्त किये, और अब अयोध्या लौटने की तैयारी है। विभीषण उनके पास दिव्य पुष्पक विमान लेकर आते हैं। यह सर्ग राम की विजय यात्रा के शुभारम्भ का वर्णन करता है।

🚁 पुष्पक विमान का आगमन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः स विभीषणो राजा रामं सुग्रीवमेव च ।
उवाच परमप्रीतः प्राञ्जलिः प्रणतो भृशम् ॥
इदं विमानं दिव्यं यत् पुष्पकं नाम नामतः ।
कुबेरस्य प्रियं भ्रातुर्वैश्रवणस्य धीमतः ॥
तेन दत्तं मया चैतद्रक्षितं रावणान्तिके ।
तदिदं राघवेन्द्र त्वं गृहाण सह सीतया ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सः = वह; विभीषणः = विभीषण; राजा = राजा; रामम् = राम को; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; एव = ही; च = और; उवाच = बोला; परमप्रीतः = अत्यन्त प्रसन्न; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़े; प्रणतः = झुका हुआ; भृशम् = अत्यधिक; इदम् = यह; विमानम् = विमान; दिव्यम् = दिव्य; यत् = जो; पुष्पकम् = पुष्पक; नाम = नाम से; नामतः = नाम से; कुबेरस्य = कुबेर का; प्रियम् = प्रिय; भ्रातुः = भाई का; वैश्रवणस्य = वैश्रवण का; धीमतः = बुद्धिमान; तेन = उसके द्वारा; दत्तम् = दिया गया; मया = मेरे द्वारा; च = और; एतत् = यह; रक्षितम् = रक्षित किया गया; रावणान्तिके = रावण के पास; तत् = वह; इदम् = यह; राघवेन्द्र = राघवश्रेष्ठ; त्वम् = आप; गृहाण = ग्रहण कीजिए; सह = साथ; सीतया = सीता के।
📖 भावार्थ : तब राजा विभीषण अत्यन्त प्रसन्न होकर, हाथ जोड़कर, झुककर राम और सुग्रीव से बोले: "यह दिव्य विमान है, जो पुष्पक के नाम से विख्यात है। यह मेरे बुद्धिमान भाई कुबेर वैश्रवण का प्रिय विमान था, जो उन्होंने (ब्रह्मा से) प्राप्त किया था। रावण ने उसे बलपूर्वक छीन लिया था, और मैंने उसकी रक्षा की थी। अब हे राघवेन्द्र! आप सीता सहित इस विमान को ग्रहण कीजिए।"
॥ श्लोक ६-१० ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं विभीषणकृतं तदा ।
प्रहर्षमतुलं लेभे सुग्रीवसहितस्तदा ॥
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा विमानं पुष्पकं शुभम् ।
आरुरोह ततः श्रीमान् सीतया सह राघवः ॥
लक्ष्मणश्च सुग्रीवश्च विभीषणमुखास्तथा ।
वानराश्च महात्मानस्तमारुरुहुरञ्जसा ॥
📖 भावार्थ : विभीषण के उस वचन को सुनकर राघव सुग्रीव के साथ अत्यन्त हर्षित हुए। फिर उन्होंने उस शुभ पुष्पक विमान की प्रदक्षिणा करके, उस पर आरोहण किया – श्रीमान् राम सीता के साथ। लक्ष्मण, सुग्रीव, विभीषण और अन्य महात्मा वानर भी उस पर शीघ्र ही चढ़ गए।

✨ विमान का स्वरूप और आकाश में गमन (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततस्तद्विमनं दिव्यं राघवेणाभिचोदितम् ।
उत्पपात नभो गत्वा वानरैः समलंकृतम् ॥
हंसयुक्तं यथा मेघं वैदूर्यविमलैः शुभैः ।
व्यरोचत तदा राजन् रामस्याद्भुतदर्शनम् ॥
सर्वे ते वानरा हृष्टा रामं सुग्रीवमेव च ।
ददृशुः पुष्पकस्थास्ते लङ्कां रम्यामधो गताम् ॥
📖 भावार्थ : तब राघव द्वारा प्रेरित वह दिव्य विमान वानरों से सुसज्जित होकर आकाश में ऊपर उठा। हे राजन्! वैदूर्यमणियों के समान निर्मल, हंसों से युक्त मेघ के समान वह विमान राम की आज्ञा से अद्भुत दिखाई दे रहा था। विमान पर स्थित वे सभी वानर हर्षित होकर राम और सुग्रीव के साथ नीचे स्थित रम्य लंका को देख रहे थे।
॥ श्लोक १६-२० ॥
ततस्ते मुदिताः सर्वे वानरा रामसेविनः ।
अपश्यन्त पुरीं लङ्कां समुद्रं च महोदधिम् ॥
रामस्तु सीतया सार्धं दर्शयन् सागरं तदा ।
उवाच मधुरं वाक्यं लक्ष्मणं परवीरहा ॥
पश्य लक्ष्मण लङ्कां तां रावणेन सुरक्षिताम् ।
मया विनिहतश्चैव रावणः ससुतः सचः ॥
📖 भावार्थ : तब राम की सेवा में रत सभी वानर प्रसन्न होकर लंका नगरी और महासागर को देख रहे थे। राम ने सीता के साथ सागर दिखाते हुए लक्ष्मण से मधुर वचन कहे: "हे लक्ष्मण, देखो उस लंका को, जो रावण द्वारा सुरक्षित थी, और जिसके रावण को पुत्र-बान्धवों सहित मैंने मार गिराया।"

🙌 विमान में प्रसन्नता और स्तुति (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततः सुग्रीवो वचनं प्रत्यूचे रघुनन्दनम् ।
प्रसादात्तव रामाऽहं प्राप्तो राज्यं विभीषणः ॥
लङ्कां प्राप्तश्च धर्मेण वानराश्च सुखं स्थिताः ।
सीता च जनकात्मजा त्वया प्राप्ता यशस्विना ॥
एवं वदति सुग्रीवे वानराः सर्व एव तु ।
प्रणेमुः शिरसा रामं लक्ष्मणं च महाबलम् ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव ने रघुनन्दन से कहा: "हे राम, आपके प्रसाद से ही मैंने राज्य प्राप्त किया, विभीषण ने लंका प्राप्त की, और सब वानर सुखपूर्वक रह रहे हैं। तथा यशस्वी आपने जनकनन्दिनी सीता को प्राप्त किया है।" सुग्रीव के ऐसा कहने पर सभी वानरों ने श्रीराम और महाबली लक्ष्मण को सिर झुकाकर प्रणाम किया।
॥ श्लोक २६-३० ॥
ततो रामो महातेजाः सीतया सह भार्यया ।
आशीर्भिर्वर्धयामासुर्देवर्षिपितृदानवाः ॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव ननृतुर्जगुश्च ह ।
पुष्पवृष्टिश्च महती पपात रघुनन्दने ॥
एवं विमानमारूढो रामः सीतापुरस्कृतः ।
शुशुभे सह सुग्रीवैः शचीव सह वासवः ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम अपनी भार्या सीता के साथ विमान में विराजमान थे। देवता, ऋषि, पितर और दानव उन्हें आशीर्वाद दे रहे थे। गन्धर्व और अप्सराएँ नृत्य-गान कर रहे थे। रघुनन्दन राम पर पुष्पों की महती वर्षा हुई। इस प्रकार सीता के साथ विमान पर आरूढ़ राम, सुग्रीव आदि के साथ वैसे ही शोभायमान हुए जैसे वासव (इन्द्र) शची के साथ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌟 विजय यात्रा

यह सर्ग राम की विजय यात्रा का प्रारम्भ है। पुष्पक विमान पर आरोहण उनकी विजय और गौरव का प्रतीक है।

💎 पुष्पक विमान का महत्त्व

पुष्पक विमान केवल एक वाहन नहीं, अपितु दिव्य सम्पत्ति है, जो अब राम के अधिकार में आ गई। यह राम के परम वैभव को दर्शाता है।

🤝 कृतज्ञता

सुग्रीव द्वारा राम की प्रशंसा और सभी वानरों द्वारा प्रणाम करना उनकी कृतज्ञता और राम के प्रति अनन्य प्रेम को दर्शाता है।

🌺 सीता का स्थान

राम के साथ सीता का विमान पर होना उनके पुनर्मिलन की सार्थकता को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि सदा धर्म के मार्ग पर चलने से अंततः विजय और वैभव की प्राप्ति होती है। राम का विमान पर आरोहण उनके धर्म की विजय का प्रतीक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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