युद्ध काण्ड अध्याय 76

राम द्वारा देवताओं से वरदान प्राप्त करना

रावण वध के पश्चात ब्रह्मा, इंद्र, शिव सहित सभी देवता राम के समक्ष प्रकट होते हैं और उनकी स्तुति करते हैं। वे राम को उनके वास्तविक स्वरूप (विष्णु) का स्मरण कराते हैं और वरदान माँगने को कहते हैं। राम युद्ध में मारे गए वानरों के पुनर्जीवन और अपने भक्तों के कल्याण का वरदान माँगते हैं।

विवरण

रावण के वध के बाद सम्पूर्ण त्रिलोक में हर्ष छा जाता है। देवराज इंद्र, ब्रह्मा, शिव, अन्य देवता तथा ऋषिगण अपने-अपने विमानों पर सवार होकर राम के सम्मुख उपस्थित होते हैं। वे राम की अद्वितीय वीरता की प्रशंसा करते हैं और उनके दिव्य स्वरूप को प्रकट करते हैं। ब्रह्मा जी राम से कहते हैं कि आप स्वयं भगवान विष्णु हैं, जिन्होंने मानव रूप में रावण का वध किया है। अब आपको अपने लोक (वैकुंठ) लौट जाना चाहिए। किन्तु राम अपने पिता के वचन का पालन करने और अयोध्या लौटकर राज्य करने की इच्छा व्यक्त करते हैं। देवता राम के इस निश्चय से संतुष्ट होकर उन्हें वरदान देते हैं। राम युद्ध में मारे गए सभी वानरों के पुनर्जीवन का वरदान चाहते हैं, ताकि उनके परिजन शोक न करें। देवता यह वरदान देते हैं कि जो भी इस रामायण कथा का श्रवण करेगा, उसे सभी प्रकार के सुख और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होगी। यह सर्ग भक्ति और आशीर्वाद से परिपूर्ण है।

(राम द्वारा देवताओं से वरदान प्राप्त करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्सप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण वध के पश्चात् समस्त देवता राम के दर्शन को आते हैं। वे राम की स्तुति करते हैं और उनके वास्तविक स्वरूप को प्रकट करते हैं। यह सर्ग राम के प्रति देवताओं की श्रद्धा और राम की भक्तवात्सल्यता का सुन्दर वर्णन करता है।

🌟 देवताओं का आगमन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा समेतास्तत्र राघवम् ॥
ऋषयश्च महाभागाः सह देवैस्तपोधनाः ।
द्रष्टुकामा महात्मानं रामं दशरथात्मजम् ॥
ते समेत्य महात्मानो देवर्षिपितृदानवाः ।
प्रशशंसुर्महात्मानं रामं दशरथात्मजम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; देवाः = देवता; सगन्धर्वाः = गन्धर्वों सहित; सिद्धाश्च = और सिद्ध; परमर्षयः = श्रेष्ठ ऋषि; ब्रह्माणम् = ब्रह्मा जी को; अग्रतः = आगे; कृत्वा = करके; समेताः = एकत्रित होकर; तत्र = वहाँ; राघवम् = राघव (राम) के पास; ऋषयः = ऋषिगण; च = और; महाभागाः = महाभाग; सह = साथ; देवैः = देवताओं के; तपोधनाः = तपस्वी; द्रष्टुकामाः = देखने की इच्छा वाले; महात्मानम् = महात्मा; रामम् = राम को; दशरथात्मजम् = दशरथ के पुत्र; ते = वे; समेत्य = एकत्र होकर; महात्मानः = महात्मा लोग; देवर्षिपितृदानवाः = देवता, ऋषि, पितर और दानव; प्रशशंसुः = प्रशंसा करने लगे; महात्मानम् = महात्मा; रामम् = राम की; दशरथात्मजम् = दशरथ के पुत्र की।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् देवता, गन्धर्व, सिद्ध, श्रेष्ठ ऋषिगण, ब्रह्मा जी को आगे करके वहाँ राम के पास एकत्रित हुए। ऋषिगण, देवता, सभी तपस्वी महात्मा दशरथनन्दन राम के दर्शन की इच्छा से वहाँ आए। इस प्रकार एकत्रित होकर देवता, ऋषि, पितर और दानव सभी ने राम की प्रशंसा की।
॥ श्लोक ६-१० ॥
जय राम जयाऽनन्त जय विष्णो जयाऽव्यय ।
जय लोकाभिराम त्वं जय पुण्यजनप्रिय ॥
सर्वदेवमयो ब्रह्मा सर्वदेवमयो हरिः ।
सर्वदेवमयः शम्भुः सर्वदेवमयो भवान् ॥
एवं स्तुतो महातेजा रामो दशरथात्मजः ।
उवाच देवताः सर्वाः प्राञ्जलिः प्रणतो भृशम् ॥
📖 भावार्थ : देवताओं ने राम की स्तुति की: "हे राम, आपकी जय हो! हे अनन्त, आपकी जय हो! हे विष्णो, जय हो! हे अव्यय, जय हो! हे लोकाभिराम, आपकी जय हो! हे पुण्यजनप्रिय, जय हो! ब्रह्मा सर्वदेवमय हैं, हरि सर्वदेवमय हैं, शम्भु सर्वदेवमय हैं, और आप भी सर्वदेवमय हैं।" इस प्रकार स्तुति किए जाने पर महातेजस्वी दशरथनन्दन राम हाथ जोड़कर, भृश प्रणत होकर सभी देवताओं से बोले।

🙏 राम की विनय और वरदान याचना (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
अहो देवाः कृतार्थोऽहं यदहं द्रष्टुमागताः ।
स्वागतं वो महात्मानः किं करोमि प्रियं वद ॥
एतच्छ्रुत्वा वचो राम ब्रह्मा लोकपितामहः ।
प्रत्युवाच महातेजा रामं दशरथात्मजम् ॥
वरं वृणीष्व भद्रं ते सर्वलोकमहेश्वर ।
त्वया तुष्टाः स्म राम त्वां द्रष्टुं सर्वे वयं गताः ॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा: "अहो देवताओ! मैं कृतार्थ हो गया कि आप मुझसे मिलने आए। आप सब महात्माओं का स्वागत है। बताइए, मैं आपकी क्या प्रिय सेवा कर सकता हूँ?" राम का यह वचन सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा जी ने महातेजस्वी दशरथनन्दन राम को उत्तर दिया: "हे सर्वलोकमहेश्वर राम! आपका कल्याण हो। आप हमसे वरदान माँग लीजिए। आपसे हम सब अत्यन्त प्रसन्न हैं, और आपके दर्शन के लिए ही हम यहाँ आए हैं।"
॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः प्रोवाच रामो वै प्राञ्जलिर्विनयान्वितः ।
यदि प्रसन्ना देवा मे यदि दास्यन्ति मे वरम् ॥
मम प्रियं च कर्तुकामा इमे सर्वे समागताः ।
ततो मे म्रियमाणा ये वानरा राक्षसैः सह ॥
जीवन्तु पुनरेवेह सम्प्रहृष्टा निरामयाः ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा: "यदि आप देवता मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे वरदान देना चाहते हैं, तथा मेरा प्रिय करने की इच्छा से सब यहाँ एकत्रित हुए हैं, तो युद्ध में राक्षसों द्वारा जो वानर मारे गए हैं, वे सब पुनः जीवित हो जाएँ, स्वस्थ और प्रसन्नचित्त होकर।"
॥ श्लोक २१-२५ ॥
एवमस्त्विति देवास्तं प्रत्यूचुः प्रीतमानसाः ।
भविष्यन्ति न सन्देहो वानरा जीविताः पुनः ॥
ये च केचिन्मृताः संख्ये राक्षसाश्च महाबलाः ।
ते सर्वे विगतश्रमाः ॥
यश्च रामायणं पुण्यं पठेद्भक्त्या समन्वितः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नुयात् परमां गतिम् ॥
📖 भावार्थ : देवताओं ने प्रसन्नचित्त होकर कहा: "ऐसा ही होगा। इसमें सन्देह नहीं कि वे सब वानर पुनः जीवित हो जाएँगे। और जो भी राक्षस युद्ध में मारे गए हैं, वे भी श्रमरहित होकर (स्वर्ग को) प्राप्त होंगे। साथ ही, जो कोई भी इस पवित्र रामायण का भक्तिपूर्वक पाठ करेगा, वह सब पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होगा।"

✨ वरदान की स्वीकृति और देवताओं का प्रस्थान (श्लोक २६-३५)

॥ श्लोक २६-३० ॥
ततः सर्वे विनष्टा ये वानरास्तत्र राघव ।
उत्तस्थुस्ते महावीर्या यथाकालं सुखोचिताः ॥
हर्षेण महता युक्ताः सर्वे ते वानरर्षभाः ।
प्रणेमुः शिरसा रामं लक्ष्मणं च महाबलम् ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः प्रययुः स्वानि धामनि ।
राममामन्त्र्य काकुत्स्थं प्रदक्षिणमथाक्रमुः ॥
📖 भावार्थ : हे राघव! तब वहाँ जितने भी वानर युद्ध में मारे गए थे, वे सब महावीर्य, सुख के योग्य, समयानुसार (तुरन्त) उठ खड़े हुए। सभी वानरर्षभ महान हर्ष से युक्त होकर श्रीराम और महाबली लक्ष्मण को सिर झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् देवता और गन्धर्वगण राम से आज्ञा लेकर, प्रदक्षिणा करके अपने-अपने धाम को चले गए।
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
ततः सुग्रीवमादाय लक्ष्मणेन समन्वितः ।
रामः सौमित्रिणा वीरो विभीषणमथाब्रवीत् ॥
गच्छ त्वं नगरीं रम्यां लङ्कां युक्तो विभीषण ।
राज्यं प्रशाधि धर्मेण मा च किञ्चिद्विचारय ॥
इति रामस्य वचनं श्रुत्वा धर्मार्थकोविदः ।
प्रत्युवाच महातेजा विभीषण इदं वचः ॥
📖 भावार्थ : तदनन्तर राम ने सुग्रीव और लक्ष्मण के साथ रहते हुए विभीषण से कहा: "हे विभीषण! तुम इस रम्य लंका नगरी में चले जाओ और धर्मपूर्वक राज्य का पालन करो। इसमें किसी प्रकार का विचार मत करो।" धर्म-अर्थ के कोविद महातेजस्वी विभीषण ने राम का यह वचन सुनकर इस प्रकार उत्तर दिया। (आगे के सर्ग में वर्णन है)

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राम की दिव्यता

इस सर्ग में देवता स्वयं राम को विष्णु का अवतार घोषित करते हैं, जिससे राम के चरित्र की दिव्यता स्पष्ट होती है।

💡 भक्तवात्सल्य

राम का वरदान माँगना कि उनके सहयोगी वानर पुनर्जीवित हों, उनकी भक्तवात्सल्यता और कृतज्ञता को दर्शाता है।

📜 रामायण का महिमा

देवताओं द्वारा रामायण के श्रवण-पाठ का जो फल बताया गया है, वह इस ग्रन्थ की पवित्रता को प्रतिपादित करता है।

🌊 आगामी प्रसंग

इस सर्ग के अन्त में राम विभीषण से राज्य ग्रहण करने को कहते हैं, जो आगामी सर्गों की भूमिका है।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि ईश्वर अपने भक्तों की सदा रक्षा करते हैं और उनके कल्याण की कामना करते हैं। राम का वरदान माँगना उनकी दयालुता का प्रतीक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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