युद्ध काण्ड अध्याय 75

राम का सीता को स्वीकार करना

अग्निदेव और देवताओं के आशीर्वाद के पश्चात राम सीता को भावभीनी स्वीकार करते हैं और सबके समक्ष उनका सम्मान करते हैं। इसके बाद राम विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हैं।

विवरण

देवताओं द्वारा सीता की पवित्रता प्रमाणित होने के बाद राम सीता को हार्दिक भाव से स्वीकार करते हैं। वे सीता से कहते हैं कि उन्हें कभी संदेह नहीं था, किन्तु लोकमर्यादा की रक्षा हेतु ऐसा करना पड़ा। सीता राम के चरणों में बैठ जाती हैं। तत्पश्चात् राम विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हैं और सभी वानरों एवं राक्षसों का अभिनंदन करते हैं। यह सर्ग राम-सीता के मिलन और युद्धकाण्ड के समापन की ओर अग्रसर होने का सूचक है।

(राम का सीता को स्वीकार करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : देवताओं के आशीर्वाद और अग्निदेव के साक्ष्य से राम ने सीता को पुनः स्वीकार किया। उन्होंने सीता के समक्ष अपने हृदय का भाव प्रकट किया और फिर विभीषण को लंका का राज्य सौंपा।

💞 राम द्वारा सीता का स्वीकार (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
रामः सीतां समाश्वास्य प्रियां वचनमब्रवीत् ।
न त्वां संदिहते बुद्धिर्मम देवि कदाचन ॥
लोकापवादभीतेन त्यक्ता त्वं जनकात्मजे ।
इदानीं तु प्रसन्नोऽस्मि देवतानां वचः श्रुत्वा ॥
🔹 पदच्छेद : रामः = राम; सीताम् = सीता को; समाश्वास्य = आश्वस्त करके; प्रियाम् = प्रिया से; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; न = नहीं; त्वाम् = तुम्हारे प्रति; संदिहते = संदेह था; बुद्धिः = बुद्धि; मम = मेरी; देवि = देवि; कदाचन = कभी; लोकापवादभीतेन = लोकापवाद के भय से; त्यक्ता = त्यागी गई; त्वम् = तुम; जनकात्मजे = जनक-पुत्री; इदानीम् = अब; तु = तो; प्रसन्नः = प्रसन्न; अस्मि = हूँ; देवतानाम् = देवताओं के; वचः = वचन; श्रुत्वा = सुनकर।
📖 भावार्थ : राम ने प्रिया सीता को आश्वस्त करते हुए कहा: "हे देवि! मेरी बुद्धि ने कभी तुम पर संदेह नहीं किया। हे जनक-पुत्री! लोकापवाद के भय से तुम्हें त्यागा गया था। अब देवताओं के वचन सुनकर मैं पूर्णतः प्रसन्न हूँ।"
॥ श्लोक ७-१० ॥
सीता रामस्य वचनं श्रुत्वा प्रीतिसमन्विता ।
रामं प्राञ्जलिरामन्त्र्य स्थिता तस्य पुरः सती ॥
📖 भावार्थ : सीता राम के वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं और हाथ जोड़कर राम के सामने सती-भाव से खड़ी रहीं।

👑 विभीषण को लंका-राज्य प्रदान (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो रामो महाप्राज्ञो विभीषणमथाब्रवीत् ।
इदं राज्यं महाबाहो लङ्कायाः प्रतिपद्यताम् ॥
त्वमेव राजा लङ्कायाः सुग्रीवसहितोऽनघ ।
न हि मत्सकाशादन्यस्त्वत्तो धर्मपरो भुवि ॥
📖 भावार्थ : तब महाप्राज्ञ राम ने विभीषण से कहा: "हे महाबाहो! लंका का यह राज्य आप स्वीकार करें। हे अनघ! सुग्रीव के सहित आप ही लंका के राजा हैं। पृथ्वी पर आपसे बढ़कर धर्मपरायण मुझसे दूसरा कोई नहीं।"
॥ श्लोक १६-२० ॥
विभीषणः प्रतिजग्राह राज्यं लङ्केश्वरस्तदा ।
रामं प्रदक्षिणं कृत्वा जगाम सह राक्षसैः ॥
📖 भावार्थ : तब लंकेश्वर विभीषण ने उस राज्य को स्वीकार किया और राम की प्रदक्षिणा करके राक्षसों के साथ चले गए।

🙌 सभी का सम्मान (श्लोक २१-२९)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
रामः सुग्रीवमासीनं हनूमन्तं च वानरान् ।
उवाच परमप्रीतो यूयं सर्वे कृतश्रमाः ॥
प्रीतोऽहं वानरश्रेष्ठाः सर्वेषां च विशेषतः ।
गृह्यतां वांजलिः कार्यं किं करोमि हितं वद ॥
📖 भावार्थ : राम ने सुग्रीव, हनुमान और अन्य वानरों से अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा: "हे वानरश्रेष्ठों! तुम सबने बहुत परिश्रम किया है। मैं तुम सब पर विशेष रूप से प्रसन्न हूँ। अब मैं तुम्हारा क्या हित कर सकता हूँ, बताओ।"
॥ श्लोक २६-२९ ॥
वानरा ऊचुः
न किंचिदिच्छामो राजन् द्रष्टुं त्वां सीतया सह ।
एतावदेव नः प्रीतं यत्त्वं दृष्टो महाबल ॥
📖 भावार्थ : वानरों ने कहा: "हे राजन्! हम कुछ नहीं चाहते। हमने आपको सीता सहित देख लिया, यही हमारे लिए परम संतोष है। हे महाबल! आपके दर्शन ही हमारे लिए सब कुछ हैं।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💖 प्रेम और मर्यादा

राम का सीता के प्रति प्रेम अगाध है, फिर भी उन्होंने लोकमर्यादा का पालन किया। यह आदर्श राजा का लक्षण है।

🎁 कृतज्ञता

राम ने विभीषण को राज्य देकर और वानरों का सम्मान करके अपनी कृतज्ञता प्रकट की। यह राजनीति का सिद्धान्त है।

🎯 शिक्षा : कृतज्ञता और मर्यादा का पालन करने वाला व्यक्ति सदा सफल होता है। राम ने दोनों का पालन किया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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